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भारत की खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आजीविका को मजबूत बनाने में आनुवंशिक संसाधनों की अहम भूमिका है। इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए NABMGR यानी National Advisory Board on Management of Genetic Resources की पुनर्गठित समिति की पहली बैठक 29 जुलाई 2026 को नई दिल्ली स्थित ICAR के राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (ICAR-NBPGR) में आयोजित की गई।
बैठक में कृषि जैव विविधता के संरक्षण और उसके सतत उपयोग को लेकर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए। साथ ही पौधों, पशुओं, मछलियों, सूक्ष्मजीवों और कीटों के आनुवंशिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए एकीकृत रणनीति पर ज़ोर दिया गया। NABMGR ने माना कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच ये पहल विकसित भारत और जलवायु अनुकूल कृषि के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी।
NABMGR का उद्देश्य क्या है?
NABMGR का गठन सबसे पहले वर्ष 2011 में ICAR के अध्यक्ष द्वारा किया गया था। वर्ष 2026 में इसे दोबारा गठित किया गया। इस बोर्ड की अध्यक्षता पद्म भूषण डॉ. आर.एस. परोदा कर रहे हैं, जबकि सह-अध्यक्ष के रूप में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
इस पुनर्गठित NABMGR में विभिन्न मंत्रालयों, राष्ट्रीय संस्थानों, वैज्ञानिकों, किसानों और अन्य विशेषज्ञों को शामिल किया गया है। इसका उद्देश्य कृषि जैव विविधता से जुड़े राष्ट्रीय स्तर के नीति सुझाव देना और आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण व उपयोग को बेहतर बनाना है।
कई प्रमुख संस्थानों के प्रतिनिधियों ने लिया हिस्सा
NABMGR की बैठक में National Biodiversity Authority (NBA), Department of Biotechnology (DBT), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, Botanical Survey of India (BSI), National Medicinal Plants Board (NMPB), National Seed Association of India (NSAI), Bioversity International तथा ICAR के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया।
इसके अलावा ICAR के छह राष्ट्रीय आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के निदेशक, किसान प्रतिनिधि और कई विशेषज्ञ भी बैठक में मौजूद रहे।
आनुवंशिक संसाधन देश की रणनीतिक संपत्ति
बैठक की शुरुआत में डॉ. आर.एस. परोदा ने कहा कि भारत के पौधों, पशुओं, मछलियों, सूक्ष्मजीवों और कीटों के आनुवंशिक संसाधन देश की रणनीतिक संपत्ति हैं। उन्होंने कहा कि यही संसाधन भविष्य की खाद्य और पोषण सुरक्षा, जलवायु अनुकूल कृषि और सतत विकास की मजबूत नींव हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि NABMGR के अंतर्गत आने वाले सभी राष्ट्रीय ब्यूरो अपनी प्राथमिकताओं को देश की भविष्य की ज़रूरतों के अनुसार तय करें। साथ ही संरक्षित जर्मप्लाज्म और जंगली प्रजातियों का अधिक उपयोग फ़सल, पशुधन और मत्स्य सुधार कार्यक्रमों में किया जाए, ताकि बेहतर और जलवायु सहनशील क़िस्में विकसित की जा सकें।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने पर ज़ोर
डॉ. परोदा ने वर्ष 2016 में आयोजित पहले International Agrobiodiversity Congress का उल्लेख करते हुए दिल्ली घोषणा की सिफारिशों को प्रभावी तरीके से लागू करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि NABMGR को मध्य एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के साथ सहयोग मजबूत करना चाहिए। इसके तहत कपास, रैम्बूटान, एवोकाडो, मैंगोस्टीन जैसी फ़सलों और भेड़ जैसी पशुधन प्रजातियों के आनुवंशिक संसाधनों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
उन्होंने पशु और मत्स्य आनुवंशिक संसाधनों के लिए भी पौध क़िस्म एवं किसान अधिकार संरक्षण अधिनियम (PPV&FRA) की तर्ज पर कानूनी ढांचा तैयार करने का सुझाव दिया, जिससे नवाचार को बढ़ावा मिले और पशुपालकों तथा मत्स्य किसानों के अधिकार सुरक्षित रह सकें।
ICAR ने तकनीक आधारित प्रबंधन पर दिया ज़ोर
सह-अध्यक्ष डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि आनुवंशिक संसाधनों का प्रभावी प्रबंधन मृदा विज्ञान, डिजिटल एग्रीकल्चर और फ़सल सुधार तकनीकों से जुड़ा होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि ICAR के नेतृत्व में देश का National Agricultural Research, Education and Extension System (NAREES) आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण, पहचान और सतत उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने विश्वास जताया कि पुनर्गठित NABMGR विभिन्न मंत्रालयों और ICAR संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करेगा।
2026 से 2031 तक का रोडमैप हुआ प्रस्तुत
बैठक के दौरान ICAR के छह राष्ट्रीय ब्यूरो के निदेशकों ने वर्ष 2021 से 2026 के बीच की उपलब्धियां प्रस्तुत कीं। साथ ही वर्ष 2026 से 2031 तक के लिए अपनी कार्ययोजना भी साझा की।
NABMGR ने सुझाव दिया कि प्री-ब्रीडिंग कार्यक्रमों को मजबूत किया जाए ताकि संरक्षित जर्मप्लाज्म का अधिक उपयोग नई फ़सल क़िस्मों के विकास में किया जा सके। इसके अलावा वर्ष 2026 से 2031 के दौरान ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने की भी सिफारिश की गई जहां अब तक व्यवस्थित रूप से जर्मप्लाज्म संग्रह नहीं किया गया है।
पारंपरिक क़िस्मों और राष्ट्रीय सेफ्टी जीनबैंक पर विशेष चर्चा
बैठक में पौधों, पशुओं, मछलियों, सूक्ष्मजीवों और कीटों की पारंपरिक तथा कम उपयोग होने वाली क़िस्मों को मुख्यधारा में लाने के लिए अंतर संस्थागत कार्यक्रम शुरू करने का सुझाव दिया गया। इस प्रस्ताव का समर्थन पद्मश्री सम्मानित प्रगतिशील किसान सुंदरा राम वर्मा ने भी किया।
इसके अलावा National Safety Genebank (NSG) की प्रगति की भी समीक्षा की गई। NABMGR के अध्यक्ष ने सुझाव दिया कि इस परियोजना को समय पर पूरा किया जाए ताकि वर्ष 2028-29 में ICAR के शताब्दी समारोह के दौरान इसे राष्ट्र को समर्पित किया जा सके।
आगे की दिशा
बैठक के अंत में NABMGR ने दोहराया कि वैज्ञानिक सहयोग, विभिन्न संस्थानों के बेहतर समन्वय और प्रमाण आधारित निर्णयों के माध्यम से भारत के अमूल्य आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित किया जाएगा। बोर्ड का मानना है कि इन सिफारिशों से कृषि जैव विविधता का बेहतर प्रबंधन होगा, कृषि क्षेत्र अधिक जलवायु अनुकूल बनेगा और विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण सहायता मिलेगी।
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