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देश में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने के लिए गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र द्वारा दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार और प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य Natural Farming और Organic Farming को देशभर में प्रोत्साहित करना था।
इस दो दिवसीय कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं, कृषि अधिकारियों, FPO, स्टार्टअप्स, प्रगतिशील किसानों और छात्रों ने भाग लिया। सेमिनार में प्राकृतिक खेती को खेती के भविष्य के रूप में देखा गया और इसके विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
प्राकृतिक खेती से मिट्टी और पर्यावरण की सुरक्षा
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि Natural Farming केवल एक खेती का तरीक़ा नहीं बल्कि एक टिकाऊ समाधान है। इसके ज़रिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, पर्यावरण की रक्षा करने और खेती की लागत कम करने में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों ने बताया कि रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से ज़मीन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, ऐसे में Natural Farming एक बेहतर विकल्प बनकर सामने आ रही है। इस दौरान ये भी बताया गया कि प्राकृतिक संसाधनों का सही उपयोग कर किसान कम लागत में बेहतर उत्पादन हासिल कर सकते हैं।
वैज्ञानिक तकनीकों के साथ पारंपरिक ज्ञान का मेल
सेमिनार के तकनीकी सत्र में वैज्ञानिकों ने Natural Farming के पीछे के विज्ञान को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों को मिलाकर खेती को और बेहतर बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि Natural Farming को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिक तरीके अपनाना ज़रूरी है, जिससे उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार हो सके। प्रगतिशील किसानों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि Natural Farming अपनाने से उनकी लागत कम हुई है और मुनाफ़ा बढ़ा है।
प्राकृतिक खेती में मिट्टी की सेहत पर विशेष फ़ोकस
कार्यक्रम में मिट्टी की सेहत को लेकर विशेष चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि Natural Farming में जैविक खाद और बायो-इनपुट्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है।
उन्होंने कहा कि मिट्टी की सेहत मज़बूत होगी तो फ़सल भी बेहतर होगी। इस दिशा में Natural Farming एक स्थायी समाधान प्रदान करती है। इसके साथ ही जैव विविधता आधारित कीट प्रबंधन पर भी ज़ोर दिया गया, जो Natural Farming का एक अहम हिस्सा है।
प्राकृतिक खेती में बाज़ार और वैल्यू चेन की भूमिका
सेमिनार में ये भी चर्चा हुई कि केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि बाज़ार और वैल्यू चेन को मज़बूत करना भी ज़रूरी है। विशेषज्ञों ने कहा कि Natural Farming से जुड़े उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसके लिए सही मार्केटिंग और ब्रांडिंग की ज़रूरत है।
PGS-India सर्टिफिकेशन सिस्टम के ज़रिए किसानों को उनके उत्पादों के लिए बेहतर बाज़ार मिल सकता है। इससे प्राकृतिक खेती को अपनाने वाले किसानों की आय बढ़ने की संभावना है।
प्रदर्शनी में दिखे नए इनोवेशन
सेमिनार के साथ लगी प्रदर्शनी में Natural Farming से जुड़े कई नए इनोवेशन देखने को मिले। यहां बायो-इनपुट्स, जैविक उत्पाद, स्टार्टअप्स और FPO द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को प्रदर्शित किया गया।
इस प्रदर्शनी ने ये दिखाया कि प्राकृतिक खेती केवल एक विचार नहीं बल्कि तेजी से बढ़ता हुआ एक मज़बूत कृषि मॉडल है।
Natural Farming को बढ़ावा देने में संस्थानों की भूमिका
राष्ट्रीय जैविक एवं प्राकृतिक खेती केंद्र देश में Natural Farming को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभा रहा है। ये संस्थान किसानों को प्रशिक्षण देने, जैविक उर्वरकों की गुणवत्ता जांचने और सर्टिफिकेशन प्रक्रिया को आसान बनाने का काम करता है।
इसके ज़रिए देशभर में Natural Farming से जुड़ी जानकारी किसानों तक पहुंचाई जा रही है, जिससे अधिक किसान इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
प्राकृतिक खेती और विकसित भारत का लक्ष्य
सेमिनार में ये भी बताया गया कि Natural Farming विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े स्तर पर Natural Farming को अपनाया जाए तो ये न केवल किसानों की आय बढ़ाएगी बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद करेगी। इस दिशा में सरकार और संस्थान मिलकर काम कर रहे हैं ताकि ज़्यादा से ज़्यादा किसान इस पद्धति को अपनाएं।
आगे की दिशा
दो दिवसीय इस राष्ट्रीय सेमिनार और प्रदर्शनी ने ये साफ़ कर दिया कि प्राकृतिक खेती अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि भविष्य की ज़रूरत बनती जा रही है। वैज्ञानिकों, किसानों और नीति निर्माताओं के साझा प्रयास से प्राकृतिक खेती को और मज़बूत बनाया जा सकता है। आने वाले समय में ये उम्मीद की जा रही है कि प्राकृतिक खेती देश की कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण के अनुकूल बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।
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