असम के कई गांवों में रेशम पालन कभी घर के पीछे तक सीमित एक गतिविधि हुआ करती थी। महिलाएं दिनभर मेहनत करतीं, रेशम के कीड़ों को पालतीं, धागे काततीं, लेकिन उनकी आय इतनी नहीं होती थी कि परिवार की आर्थिक परेशानियां दूर हो सकें। मौसम खराब हो जाए, पत्तियां कम पड़ जाएं या उत्पादन घट जाए तो पूरा चक्र टूट जाता था। डॉ. जोगेश देउरी (Dr. Jogesh Deuri) इन्हीं हालातों को बचपन से देखते हुए बड़े हुए।
उन्होंने अपनी मां को एरी रेशम के कीड़े पालते देखा था। ये सिर्फ़ एक घरेलू काम नहीं था, बल्कि परिवार की आजीविका का सहारा था। लेकिन उन्होंने ये भी देखा कि प्रकृति की छोटी-सी मार किसानों की महीनों की मेहनत पर भारी पड़ जाती है। तभी उनके मन में एक सवाल पैदा हुआ, क्या रेशम पालन को इतना मज़बूत बनाया जा सकता है कि ये लोगों को स्थायी आय दे सके? यहीं से शुरू हुई एक ऐसी यात्रा, जिसने असम के रेशम उद्योग की दिशा बदल दी।
जब पत्तियों की कमी छीन लेती थी रोज़गार
डॉ. देउरी ने एरी रेशम को अपना केंद्र बनाया। एरी रेशम को Ahimsa भी कहा जाता है क्योंकि इसमें रेशम निकालने के लिए कीड़ों को मारा नहीं जाता। ये पर्यावरण के अनुकूल भी है और इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती थी चारे की उपलब्धता। एरी रेशम के कीड़े मुख्य रूप से केसेरू और अरंडी की पत्तियों पर निर्भर रहते हैं। साल के कुछ महीनों में ये पत्तियां आसानी से मिल जाती थीं, लेकिन बाकी समय किसानों के सामने संकट खड़ा हो जाता था। चारा नहीं तो उत्पादन नहीं और उत्पादन नहीं तो आय नहीं।
एक छोटा प्रयोग जिसने बदल दी तस्वीर
डॉ. देउरी ने इस समस्या का समाधान खेतों में खोजा। उन्होंने टैपिओका की पत्तियों को वैकल्पिक चारे के रूप में बढ़ावा दिया। ये बदलाव साधारण लग सकता है, लेकिन इसके परिणाम असाधारण थे।
किसानों को अब पूरे साल रेशम उत्पादन का अवसर मिलने लगा। जो काम कभी मौसम पर निर्भर था, वो धीरे-धीरे नियमित आय का स्रोत बन गया। एक छोटे से वैज्ञानिक प्रयोग ने हज़ारों परिवारों की आर्थिक अनिश्चितता को कम करने में मदद की।
चरखे से मशीन तक का सफ़र
डॉ. देउरी की सोच सिर्फ़ उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महसूस किया कि मेहनत का बड़ा हिस्सा आज भी पुराने और कठिन तरीकों में फंसा हुआ है। हाथ से चलने वाली चरखियों पर घंटों काम करना पड़ता था। उन्होंने आधुनिक और यांत्रिक मशीनों को बढ़ावा दिया, ताकि काम आसान हो, उत्पादन बढ़े और युवाओं की भी इस क्षेत्र में रुचि पैदा हो।
इसी सोच के साथ कोकराझार में बोडोलैंड सिल्क पार्क (Bodoland Silk Park) की स्थापना हुई। ये सिर्फ़ एक उत्पादन केंद्र नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, तकनीक और उद्यमिता का केंद्र बन गया। यहां किसानों और युवाओं को आधुनिक रेशम उद्योग की पूरी प्रक्रिया सीखने का मौका मिला।
जब मुनाफ़ा कारीगरों तक पहुंचा
रेशम उद्योग की एक बड़ी समस्या ये थी कि उत्पादन करने वालों और बाज़ार के बीच कई बिचौलिए मौजूद थे। मेहनत किसानों और कारीगरों की होती थी लेकिन सबसे बड़ा लाभ अक्सर कहीं और चला जाता था।
डॉ. देउरी ने कोकून से लेकर तैयार और प्रिंटेड कपड़े तक की पूरी प्रक्रिया को एकीकृत करने का प्रयास किया। इससे मूल्य श्रृंखला मज़बूत हुई और कारीगरों को उनके श्रम का बेहतर लाभ मिला।
रेशम ने बदली महिलाओं की भूमिका
इस बदलाव का असर सिर्फ़ उद्योग पर नहीं पड़ा, समाज पर भी पड़ा। करीब 1600 गांवों में महिलाओं की भूमिका मज़बूत हुई। जो महिलाएं पहले केवल श्रमिक के रूप में देखी जाती थीं, वो अब आय अर्जित करने वाली, निर्णय लेने वाली और परिवार की आर्थिक रीढ़ बन रही हैं। रेशम उनके लिए केवल रोज़गार का साधन नहीं रहा, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता का माध्यम भी बन गया।
मूगा रेशम: सिर्फ कारोबार नहीं, पहचान भी
डॉ. देउरी की चिंता केवल आय तक सीमित नहीं थी। उनके लिए मूगा रेशम असम की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। असम के त्योहारों, पारंपरिक परिधानों और सामाजिक जीवन में मूगा रेशम की खास जगह है। उनका मानना है कि अगर ये विरासत खत्म होती है, तो नुकसान केवल आर्थिक नहीं होगा, बल्कि सांस्कृतिक भी होगा।
इसी सोच के साथ उन्होंने मानस राष्ट्रीय उद्यान के आसपास दुनिया के पहले जंगली मूगा अभयारण्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये प्रयास दिखाता है कि संरक्षण और विकास एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।
गांवों के भविष्य को नए धागों से जोड़ना
आज जब देश ग्रामीण उद्यमिता और आत्मनिर्भरता की बात कर रहा है, तब डॉ. जोगेश देउरी का काम एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आता है। उन्होंने दिखाया कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान साथ मिलकर न केवल एक उद्योग को मजबूत कर सकते हैं, बल्कि हजारों परिवारों की जिंदगी भी बदल सकते हैं। उन्होंने रेशम को केवल बचाया नहीं, बल्कि उसे नई पीढ़ी के लिए एक अवसर में बदल दिया।
एक व्यक्ति, एक विचार और हज़ारों बदली हुई ज़िंदगियां
पद्मश्री 2026 से सम्मानित डॉ. जोगेश देउरी की कहानी हमें ये बताती है कि बदलाव हमेशा बड़े शहरों या विशाल उद्योगों से नहीं आता। कभी-कभी वो किसी गांव से निकलता है, एक मां की मेहनत को देखकर जन्म लेता है और फिर हज़ारों लोगों के जीवन में उम्मीद के धागे बुन देता है। उनके शब्द आज भी असम के रेशम उद्योग के भविष्य की दिशा बताते हैं-
“एरी हमारा भविष्य है, मूगा हमारी उम्मीद है और मलबेरी हमारी संभावनाएं हैं।”
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