Rural Economy Slows Down: गांवों में सिमटती कमाई, बढ़ता खर्च और निवेश में भारी गिरावट, NABARD सर्वे में खुलासा

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की तरह ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy Slows Down) पर नज़र रखने वाली संस्था नाबार्ड (NABARD) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में ये साफ कर दिया है कि गांवों की आर्थिक सेहत में गिरावट आई है।

देश की अर्थव्यवस्था (The country’s economy) की असली तस्वीर गांवों में दिखती है, और वो तस्वीर इन दिनों बेहद सुस्त नज़र आ रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की तरह ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था (Rural Economy Slows Down) पर नज़र रखने वाली संस्था नाबार्ड (NABARD) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में ये साफ कर दिया है कि गांवों की आर्थिक सेहत में गिरावट आई है। ये रिपोर्ट ऐसे वक्त में आई है जब वेस्ट एशिया में संघर्ष और खेती-किसानी में मंदी ने मिलकर ग्रामीण भावनाओं को बुरी तरह प्रभावित किया है।

आमदनी की रफ़्तार पर लगा ब्रेक

सर्वे के मुताबिक, पिछले एक साल में केवल 32 फीसदी ग्रामीण परिवारों की आमदनी में इज़ाफा हुआ है। ये आंकड़ा अब तक का सबसे निचला स्तर है। यानी तीन में से दो परिवारों की आय या तो स्थिर है या घट गई है। ये गिरावट महज़ आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसकी वजह सरकारी आंकड़ों में भी साफ दिखती है।

कृषि क्षेत्र, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, उसकी वास्तविक (Real) विकास दर 2024-25 के 4.9 फीसदी से घटकर 2025-26 में सिर्फ 2.4 फीसदी रह गई। इससे भी बड़ा झटका नॉमिनल जीवीए (Nominal GVA) में देखने को मिला, जो 9 प्रतिशत से सीधे 0.6 प्रतिशत पर आ गिरा। इसका सीधा मतलब है, किसानों की आय पर भारी संकट। जिन परिवारों की आय बढ़ी भी, उनकी औसत बढ़ोतरी भी पहले के 13.9 प्रतिशत से घटकर 10.9 फीसदी रह गई। नीलसन की रिपोर्ट (Nielsen’s Report) भी बताती है कि एफएमसीजी (FMCG) की ग्रामीण बिक्री की रफ्तार कमजोर पड़ गई है, यानी गांव वालों के हाथ में खर्च करने के लिए पैसे कम बच रहे हैं।

खर्च बढ़ा, बचत घटी, खाने पर खर्चा बढ़ा

अजीबोगरीब स्थिति ये है कि जहां कमाई कम हुई, वहीं खर्च बढ़ गया। करीब 76.7 फीसदी परिवारों का खर्च बढ़ा है। परिवारों की मासिक आमदनी का 67.3 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ खर्च में निकल रहा है। सबसे टेंशनवाली बात ये है कि खाने-पीने पर खर्च का हिस्सा बढ़कर 56.7 प्रतिशत हो गया है।

ये स्थिति ‘Food Inflation’ घटने के संकेतों के बीच आई है। इसका मतलब यह हुआ कि महंगाई भले ही कम हुई हो, लेकिन लोगों की कमाई इतनी कमजोर है कि उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा अब भी रोजी-रोटी पर ही खर्च हो रहा है। इसका असर बचत पर भी पड़ा है। सर्वे में बचत का नेट रिस्पॉन्स -9.3 फीसदी रहा, यानी बचत बढ़ाने वालों की तुलना में बचत घटाने वाले कहीं ज़्यादा हैं।

निवेश ठप, भविष्य को लेकर घबराहट

सर्वे की सबसे चौंकाने वाली बात है निवेश में आई भारी गिरावट। निवेश बढ़ाने वाले परिवारों का प्रतिशत 28 से घटकर 24.8 रह गया। वहीं, निवेश घटाने वालों की संख्या बढ़कर 17.1 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। ये साफ इशारा है कि अनिश्चितता के माहौल में ग्रामीण परिवार जोखिम लेने से कतरा रहे हैं।

भविष्य की उम्मीदें भी धूमिल होती जा रही हैं। अगले तीन महीनों में रोजगार में सुधार की उम्मीद रखने वाले परिवार घटकर 41.7 प्रतिशत रह गए। सबसे चिंताजनक ये कि 53.3 प्रतिशत परिवारों को लगता है कि आने वाले समय में हालात में कोई बदलाव नहीं होगा, जो अब तक का सबसे ऊंचा आंकड़ा है। हालांकि, एक साल की अवधि में लोगों को थोड़ी उम्मीद है, लेकिन निकट भविष्य को लेकर स्थिति गंभीर है।

महंगाई से राहत, पर कर्ज महंगा

राहत की एक खबर यह है कि महंगाई के मोर्चे पर कुछ सुधार दिखा। मौजूदा महंगाई का अनुमान घटकर 2.1 प्रतिशत रह गया, जो सर्वे का सबसे निचला स्तर है। लेकिन कर्ज का मामला अब भी ग्रामीणों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। केवल 51.2 प्रतिशत परिवार ही औपचारिक स्रोतों (बैंक) से उधार ले रहे हैं। गांवों में साहूकारों का दबदबा बना हुआ है, जहां ब्याज दर 17-18 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।

इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार, पर आमदनी का संकट बरकरार

सर्वे में एक पॉजिटिव साइड ये भी सामने आया कि करीब 75.5 फीसदी परिवारों ने ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार महसूस किया। सड़कों को 45.5 प्रतिशत परिवारों ने सबसे बेहतर बताया, जबकि शिक्षा और बिजली भी टॉप पर रहे।

लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर का सुधार तब तक अधूरा है, जब तक गांवों की आय नहीं बढ़ती। सर्वे साफ संकेत देता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था गंभीर दौर से गुजर रही है। कृषि क्षेत्र में मंदी, वैश्विक संकट और घटती आय ने ग्रामीण परिवारों की जेब खाली कर दी है। अगर समय रहते किसानों की आय और रोजगार पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह सुस्ती शहरी अर्थव्यवस्था को भी अपनी चपेट में ले सकती है।

 

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