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हिंदी सिनेमा के पर्दे पर जब नाना पाटेकर (Nana Patekar) की बुलंद आवाज गूंजती थी, तो थियेटरों की दीवारें कांप उठती थीं। उनकी आंखों की कड़क और डायलाग्स की तेज़ी दर्शकों को सिहरा देती थी। लेकिन कैमरे के बंद होते ही, यही ‘महानायक’ एक साधारण किसान के वेश में ढल जाता था। नाना पाटेकर का निधन सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के लिए एक अपूरणीय क्षति नहीं है, बल्कि इस देश की मिट्टी और अन्नदाताओं ने अपना सबसे सच्चा हमदर्द खो दिया है।
कार ख़रीदने के बजाय ज़रूरतमंद किसानों को भेजे चेक
नब्बे का दशक वो समय था जब ‘अग्नि साक्षी’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म के बाद नाना पाटेकर (Nana Patekar) सफलता के शिखर पर थे। शोहरत और पैसे की कोई कमी नहीं थी। लेखक रणबीर पुष्प एक इंटरव्यू में नाना पाटेकर से जुड़ा एक किस्सा बताते हैं कि नाना पाटेकल 1.5 करोड़ रुपये की कार खरीदने वाले थे और इसकी सारी तैयारी भी हो चुकी थी। लेकिन जब वो टीवी पर ख़बरें देख रहे थे, तभी उनकी नजर किसानों की आत्महत्या से जुड़ी एक खबर पर पड़ी, जिसके बाद उन्होंने अपना कार लेने का इरादा बदल दिया और कार खरीदने के बजाय 15-15 हजार रुपये के चेक तैयार करवाकर जरूरतमंद किसानों को भेजे। ये था नाना का किसानों के प्रति वो अटूट प्रेम, जो किसी दिखावे से नहीं, बल्कि दिल की गहराई से निकला था।
मराठवाड़ा के दूर-दराज़ के गांवों में किसानों से मिले नाना पाटेकर
वे खुद चिलचिलाती धूप और धूल भरे रास्तों से होते हुए मराठवाड़ा के लातूर और उस्मानाबाद जैसे दूर-दराज के गांवों में पहुंचे। वे उन झोपड़ियों और कच्चे मकानों में गए जहां मातम पसरा हुआ था। नाना ने उन बुजुर्ग माता-पिता और विधवा महिलाओं को गले लगाया, उनके आंसू पोंछे। दुख की घड़ी में इतने बड़े स्टार को अपने बीच पाकर किसानों के परिवारों को ये अहसास हुआ कि इस दुनिया में कोई उनके साथ खड़ा है।
शुरू किया ‘नाम फाउंडेशन’
इसके बाद नाना पाटेकर ने साल 2015 में अपने बेहद करीबी दोस्त और मशहूर मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ नाम के एक गैर-सरकारी संगठन की शुरूआत की। संस्था की शुरुआत के पहले ही दिन आम जनता की तरफ से अस्सी लाख रुपये से ज्यादा का डोनेशन आया।
नाना अच्छी तरह जानते थे कि किसानों की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह पानी की कमी और लगातार पड़ने वाला सूखा है। इसलिए नाम फाउंडेशन ने जल संरक्षण को अपना सबसे मुख्य मिशन बनाया। पिछले एक दशक में नाम फाउंडेशन ने पांच सौ से अधिक नालों, छोटी धाराओं, नहरों और नदियों की गाद साफ करके उन्हें गहरा और चौड़ा करने का ऐतिहासिक काम पूरा किया।
किसानों के लिए बने ‘नाम फाउंडेशन’ ने पक्के और मजबूत मकानों का निर्माण करवाकर उनकों सौंपें। नाना ने औरंगाबाद के ‘धोंडलगांव’ और वर्धा के ‘आमला’ जैसे कई अत्यंत पिछड़े और सूखाग्रस्त गांवों को गोद लिए।
आलीशान बंगले को छोड़कर रहते थे साधारण फार्महाउस में
आज के समय में जहां लोग अपनी सुख-सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं, वहीं नाना पाटेकर अपनी जिंदगी को न्यूनतम जरूरतों के साथ जीते थे। वे मुंबई के आलीशान बंगलों को छोड़कर पुणे के पास अपने साधारण फार्महाउस पर सूती कुर्ता-पायजामा पहनकर खुद खेती करते थे, फसलों के बीच पसीना बहाते थे।
किसानों के लिए लड़ते थे,करते थे सरकार की आलोचना
आर्थिक और सामाजिक मदद करने के साथ-साथ नाना पाटेकर हमेशा किसानों के अधिकारों के लिए भी लड़ते रहे। वे देश के एकमात्र ऐसे बड़े अभिनेता थे जिन्होंने खुले मंचों से राजनेताओं और सरकारों की नीतियों की तीखी आलोचना की।
नाना ने एक बार बड़े ही कड़े शब्दों में कहा था कि ‘हमारे देश का किसान कोई भिखारी नहीं है जो सरकारों के आगे भीख मांगे। उसे कर्जमाफी या खैरात की भीख नहीं, बल्कि उसकी फसल का सही दाम, उसका हक और समाज में सम्मान चाहिए।’
नाना पाटेकर ने अपने कामों से ये साबित कर दिया कि असली नायक वह नहीं होता जो सिनेमा के पर्दे पर नकली विलेन को मारता है। असली हीरो वह होता है जो समाज के सबसे कमजोर और पीड़ित वर्ग के आंसू पोंछने के लिए खुद ज़मीन पर उतर आता है।
गंभीर कार्डियक अरेस्ट से हुई मौत
8 अक्टूबर की सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित आवास पर अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें गंभीर कार्डियक अरेस्ट आया, जिससे बाद उनको मृत घोषित कर दिया गया।
आज भले ही नाना पाटेकर अब इस दुनिया में नहीं रहे लेकिन महाराष्ट्र के हजारों किसान परिवारों के खिले हुए चेहरे हमेशा उनकी गवाही देते रहेंगे।
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