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झारखंड के रामगढ़ जिले में किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है नाबार्ड की “जीवा परियोजना”। इस पहल के जरिए किसान न सिर्फ प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे हैं, बल्कि “जीवामृत” जैसे जैविक खाद का निर्माण कर अपनी जमीन की उर्वरा क्षमता भी बढ़ा रहे हैं। पतरातू प्रखंड के खेत आज इसी बदलाव की कहानी कह रहे हैं।
NABARD और ग्रामीण सेवा संघ की संयुक्त पहल
National Bank for Agriculture and Rural Development (नाबार्ड) जनजातीय विकास कार्यक्रम के तहत “जीवा परियोजना” का संचालन कर रहा है। ग्रामीण सेवा संघ के सहयोग से चल रही इस परियोजना से राज्यभर में लगभग 39 हजार परिवार लाभान्वित हो रहे हैं और करीब 35 हजार एकड़ भूमि पर बागवानी की जा रही है।

पतरातू के किसानों को मिला सीधा लाभ
रामगढ़ के पतरातू प्रखंड के कोड़ी गांव के किसान देवलाल मुंडा इस परियोजना से जुड़े हैं। उन्होंने बायोडायजेस्टर के माध्यम से प्राकृतिक खाद का निर्माण शुरू किया है, जिससे उनकी जमीन की उर्वरा क्षमता में वृद्धि हुई है।

“जीवामृत” बना खेती का आधार
देवलाल मुंडा के अनुसार, “जीवामृत” बनाने के लिए पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है। इसमें शामिल हैं:
- 250 लीटर गोमूत्र
- 300 किलो गोबर
- 30 किलो गुड़
- 30 लीटर छाछ
- 10 किलो सब्जी-फल का अपशिष्ट
- 1 लीटर पंचगव्य
यह मिश्रण लगभग 42 दिनों में तैयार होता है और पूरी तरह जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
उर्वरा शक्ति बढ़ी, पैदावार में सुधार
प्राकृतिक खेती के तहत एक एकड़ खेत में करीब 100 लीटर जीवामृत का उपयोग किया जाता है। इससे न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनी रहती है, बल्कि फसल की पैदावार में भी सुधार देखने को मिल रहा है।

किसानों के जीवन स्तर में बदलाव
“जीवा परियोजना” के माध्यम से नाबार्ड किसानों को वैज्ञानिक और प्राकृतिक खेती की दिशा में आगे बढ़ा रहा है। इससे न सिर्फ कृषि पद्धति में सुधार हो रहा है, बल्कि किसानों की आर्थिक स्थिति और जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।रामगढ़ के पतरातू के खेत आज इस बात के गवाह हैं कि अगर सही मार्गदर्शन और संसाधन मिलें, तो किसान प्राकृतिक खेती के जरिए बेहतर उत्पादन और समृद्ध जीवन की ओर बढ़ सकते हैं। “जीवा परियोजना” इसी परिवर्तन की मजबूत कड़ी बनकर उभरी है।
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