आज पंजाब की खेती एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां गेहूं-धान का पारंपरिक फ़सल चक्र ज़मीन की सेहत और किसानों की आमदनी, दोनों पर असर डाल रहा है। ऐसे समय में फ़ाज़िल्का ज़िला के जंडवाला खरता गांव के किसान सुखचैन सिंह भुल्लर एक नई राह दिखा रहे हैं।
सुखचैन सिंह ने साल 2014 में शौक के तौर पर फूलों की खेती (फ्लोरीकल्चर) शुरू की थी, लेकिन आज यही शौक उनके लिए कमाई का मजबूत ज़रिया बन चुका है। वे न सिर्फ़ खुद मुनाफ़ा कमा रहे हैं, बल्कि दूसरे किसानों को भी ट्रेनिंग देकर आत्मनिर्भर बना रहे हैं।
शौक से व्यवसाय तक का सफ़र
सुखचैन सिंह बताते हैं कि शुरुआत बहुत छोटे स्तर से हुई थी। साल 2012-13 में उन्होंने खेत की मेड़ों पर सजावट के लिए फूल लगाए थे। जब इन फूलों को बाज़ार में अच्छी क़ीमत मिली, तो उनका उत्साह बढ़ा।
साल 2014 में उन्होंने डेढ़ कनाल ज़मीन पर व्यवस्थित खेती शुरू की। परिवार के सहयोग और शुरुआती मुनाफ़े ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 2016 के बाद उन्होंने धीरे-धीरे रकबा बढ़ाया और आज वे कई एकड़ में 6-7 तरह के फूल उगा रहे हैं।
सही योजना से मिलता है ज़्यादा मुनाफ़ा
उनके अनुसार फूलों की खेती में सबसे अहम चीज़ “समय की सही योजना” है। अगर फूलों को शादी के सीज़न, दिवाली, नवरात्रि और दशहरा जैसे त्योहारों के समय तैयार किया जाए, तो उनकी क़ीमत सामान्य दिनों से कई गुना बढ़ जाती है। त्योहारों के दौरान मांग इतनी ज़्यादा होती है कि फूल तीन गुना तक महंगे बिकते हैं।
कौन-कौन से फूल और कैसे खेती?
सुखचैन सिंह मुख्य रूप से जाफ़री और लड्डू गेंदा (मैरीगोल्ड) की खेती करते हैं:
जाफ़री (सर्दियों की फसल):
- प्रति फोर्ट लगभग 14,000 पौधे
- एक पौधे की क़ीमत करीब 50 पैसे
- कुल लागत 30-35 हज़ार रुपये
- एक लाइन में क्यारियों पर बुवाई से देखभाल आसान
लड्डू गेंदा (हाइब्रिड, गर्मियों की फसल):
- प्रति फोर्ट लगभग 8,000 पौधे
- पौधों के बीच 2 फ़ीट दूरी
- नर्सरी लागत 30-35 हज़ार रुपये
- 45 दिन में फूल तैयार
- जाफ़री से लगभग दोगुना मुनाफ़ा
वे हर दो महीने में बुवाई करते हैं, जिससे साल के 8-9 महीने लगातार फूलों का उत्पादन बना रहता है।
लागत और कमाई का गणित
फूलों की खेती में आमदनी बाज़ार की मांग पर निर्भर करती है।
- जाफ़री में लागत 30-35 हज़ार रुपये
- हाइब्रिड गेंदा महंगा, लेकिन मुनाफ़ा ज़्यादा
कभी-कभी भाव 10 रुपये प्रति किलो तक गिर जाते हैं, लेकिन सीज़न में इतनी मांग होती है कि खेत से ही ट्रॉलियों में फूल बिक जाते हैं। अच्छी स्थिति में लाखों रुपये तक की कमाई संभव है।
ट्रेनिंग से बना रहे हैं नए किसान
सुखचैन सिंह सिर्फ़ किसान ही नहीं, बल्कि एक ट्रेनर भी हैं। वे साल में चार बैच चलाते हैं और खेत में प्रैक्टिकल ट्रेनिंग देते हैं।
- ट्रेनिंग फीस: 5,000 रुपये (पूरी राशि लुधियाना की “मनुखता दी सेवा” संस्था को दान)
- दो साल तक किसानों को फ्री मार्गदर्शन
- बीमारियों, स्प्रे और मार्केटिंग पर लगातार मदद
उनका दावा है कि सही तरीके से सीखकर कोई भी किसान इस खेती में सफ़ल हो सकता है।
बीज उत्पादन में भी महारत
उन्होंने फूलों के साथ-साथ बीज उत्पादन में भी अच्छी पकड़ बना ली है। वे पौधे तैयार करके राजस्थान, जम्मू, पठानकोट और सिरसा तक सप्लाई करते हैं। इसके अलावा वे गेहूं और जौ की प्रमाणित किस्मों के बीज भी तैयार करते हैं। उनका मानना है कि किसानों को अपने बीज खुद तैयार करने चाहिए, इससे लागत कम होती है और गुणवत्ता बनी रहती है।
मार्केटिंग में अपनाया नया तरीका
सुखचैन सिंह का मानना है कि सिर्फ़ उत्पादन काफी नहीं, सही दाम मिलना भी ज़रूरी है। इसलिए उन्होंने बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे दुकानदारों और ग्राहकों से संपर्क बनाया। वे रिटेल में बिक्री करते हैं, जिससे ज़्यादा मुनाफ़ा सीधे किसान को मिलता है।
किसानों के लिए संदेश
सुखचैन सिंह भुल्लर का कहना है कि खेती में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन अगर काम सही जानकारी और योजना के साथ किया जाए, तो सफलता तय है। उनके अनुसार फूलों की खेती कम ज़मीन वाले किसानों के लिए भी एक बेहतरीन विकल्प है, जो सही ट्रेनिंग और मार्केटिंग के साथ उन्हें आत्मनिर्भर बना सकती है।

