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गांव में रहने वाले गरीब किसान जिनके पास ज़मीन की कमी है, उनके लिए खेती के साथ ही सूअर पालन कमाई का एक अच्छा ज़रिया बन सकता है, यदि वो इसे एक बिज़नेस की तरह करते हैं। जैसा कि पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के रहने वाले सोनाम लामा ने किया। सोनाम ने फ़ौज से रिटायर्ड होने के बाद साल 2023 से Pig Farming का काम शुरू किया। वो ड्यूरोक प्रजाति के सुअरों का पालन करते हैं, जिसमें बीमारियां न के बराबर होती है। सैनिक से किसान बने सोनाम ने किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता अक्षय दुबे से बातचीत में अपने सफ़ल बिज़नेस मॉडल के बारे में चर्चा की।
सैनिक से किसान बनने का सफ़र
सोनाम बताते हैं कि वो 2003 में वो सेना में गोरखा रेजिमेंट में भर्ती हुए थे और 17 साल देश की सेवा करने के बाद रिटायरमेंट ले लिया। वो बताते हैं कि उस वक्त उनके पास कई सारे विकल्प मौजूद थे काम के, मगर अब वो फिर से नौकरी नहीं करना चाहते थे। वो कुछ हटकर करना चाहते थे, इसलिए पिग फ़ार्मिंग को चुना। वो कहते हैं कि इसका आइडिया उन्हें छोटी बहन ने दिया। फिर उन्होंने पिग फ़ार्म बनाने के लिए कंस्ट्रक्शन शुरू कर दिया और 2023 में लामा पिग फ़ार्म नाम से एक फ़ार्म खोलकर सुअर पालन का काम शुरू कर दिया।
ड्यूरिक नस्ल होती है बेस्ट
सोनाम बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत शून्य से की थी और आज उनके पास 19 सूअर है। जिसमें अभी 8 सूअर मादा है , 9 हीट में आने वाले हैं और दो बोर हैं। एक बड़ा और एक छोटा है। 5 मीट के लिए रखा है ट्रायल के तौर पर। मीट का रेट मार्केट के हिसाब से तय होता है।
वो कहते हैं कि शुरुआत में उन्होंने लैंडरेस प्रजाति के सूअर रखे थे। मगर उसमें थोड़ी समस्या आने लगी, वो ज़्यादा बीमार होते थे और मिसकैरेज भी ज़्यादा होता था। फिर नुकसान होने की वजह से वो बिज़नेस बंद करने की सोचने लगे। फिर उनके पास जो दो ड्यूरिक मादा सूअर थे, उन्होंने बच्चे दिए और वो भी एकदम स्वस्थ। इस तरह से इनकी संख्या बढ़ी तो हमने काम जारी रखा और अब तो उनके पिगलेट की बहुत डिमांड आ रही है।
बीमारियां और बचाव
सोनाम बताते हैं कि उन्होंने जब लैंडरेस और लार्ज व्हाइट सूअर रखे, तो उनमें फंगस और फीवर की समस्या अधिक दिखी। उसके बाद से वो ड्यूरोक प्रजाति का ही पालन कर रहे हैं जिसमें बीमारी न के बराबर होती है। ये नस्ल बहुत अच्छी मानी जाती है। इनकी दवाइयों पर खर्च करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। सोनाम बताते हैं कि सूअरों को बीमारियों से बचाने के लिए सबसे ज़रूरी है कि फ़ार्म को बिल्कुल साफ़-सुथरा रखे।
सूअरों का आहार
सोनाम बताते हैं कि पहले वो दुकान से लाकर कई चीज़ें मिक्सअप करके मीट को पकाकर सूअरों को खिलाते थे। मगर उससे इनका विकास अच्छा नहीं दिखा। जिसके बाद बाद ऊर्जा कंपनी का कमर्शियल फीड खिला रहे हैं। इसका रिजल्ट बहुत अच्छा है। इसके अलावा जब मादा सूअर प्रेग्नेंट हो जाती हैं, तो उन्हें खास आहार दिया जाता है, जिसे ब्रीडर कहते हैं। इसे खिलाने से बच्चे का विकास भी अच्छा होता है। आमतौर पर जन्म के समय 1.25 किलोग्राम वज़न तक के बच्चे को स्वस्थ माना जाता है।
कब की जाती है क्रॉसिंग?
पिगलेट यानी सूअर के बच्चे जब बड़े होते हैं, तो उन्हें मादा बनाने की प्रक्रिया शुरू होती है। सूअर का वज़न जब 70 से 80 किलो का हो जाता है, तब मादा सूअर की क्रॉसिंग की जाती है। सोनाम बताते हैं कि उनके पहले हीट को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, फिर दूसरे हीट को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं, मगर जब तीसरा हीट आता है, तो उसे क्रॉसिंग के लिए भेज देते हैं, क्रॉसिंग कराने के 114 दिन बाद मादा की डिलीवरी हो जाती है।
प्रेग्नेंसी के दौरान देखभाल
सोनाम बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान सूअरों को ज़्यादा ढ़लान वाली जगह पर नहीं जाने दिया जाता है और फीड में ब्रीडर देते हैं, इसके अलावा बहुत ध्यान देने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। वो बताते हैं कि डिलीवरी के 45 दिन के बाद मादा से बच्चे को अलग कर दिया जाता है। इसके बाद मांग के अनुसार पिगलेट ग्राहकों को दिए जाते हैं। 12 किलोग्राम के पिगलेट 7000 रुपए में देते हैं। वज़न 12 किलो से ऊपर होने पर पिगलेट को 8 से 8.5 हजार रुपए में बेचा जाता है।
कैसे करते हैं मार्केटिंग?
सोनाम बताते हैं कि जहां तक बाज़ार बनाने का काम है तो उन्होंने अपने फ़ार्म के आगे ‘लामा एग्रो फ़ार्म’ का बोर्ड लगाया हुआ है और फ़ार्म के पास ही एक व्यू पॉइंट है, तो जो भी लोग इधर घूमने आते हैं उन्हें फ़ार्म दिख जाता है।
सूअर पालन के लिए ध्यान देने वाली बातें
जो लोग सूअर पालन की सोच रहे हैं, उन्हें सोनाम सलाह देते हैं कि सबसे पहले सूअर के रहने के की उचित व्यवस्था ज़रूरी है। इसके लिए कंस्ट्रक्शन के समय कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए जैसे कि केबिन कैसे बनाया जाए, अपशिष्ट कैसे निकालेंगे (कहां फेंकना है)। साथ ही वो कहते हैं कि किसानों को सबसे पहले छोटे लेवल पर ही शुरुआत करनी चाहिए और फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ाना चाहिए बिज़नेस को। वो कहते हैं कि उन्होंने तो खैर एक ही बार मे बड़े पैमाने पर काम शुरू किया था तो उन्हें कंस्ट्रक्शन पर 13-14 लाख का खर्च करना पड़ा। उन्हें इस बिज़नेस में कुल 15-16 लाख का निवेश किया है और उन्हें इस बात का अफ़सोस नहीं है क्योंकि उनका बिज़नेस अच्छा चल रहा है। हालांकि उनका कहना है कि अभी जो भी फ़ायदा हो रहा है उसे फ़ार्म को बढ़ाने में ही लगा रहे हैं, मगर अब उन्हें जेब से कुछ नहीं लगाना पड़ता है।
आगे वो सलाह देते हैं कि केबिन का साइज़ 5X4 और 5X6 रखना फ़ायदेमंद होता है। पिगलेट के लिए अलग से केबिन बनाना होता है। इसके अलावा जिन सूअरों को मीट के लिए रखा जाता है उन्हें अलग केबिन में रखना होता है। साथ ही केबिन की हमेशा सफ़ाई करनी भी ज़रूरी है इसके लिए पाइप के पानी से इसकी धुलाई करनी चाहिए।
सोनाम आर्मी बैकग्राउंड से हैं, मगर अब उन्हें इस काम में भी मज़ा आ रहा है और आगे उनकी योजना इसे और बड़े पैमाने पर करने की है। छोटे किसानों के लिए सूअर पालन एक अच्छा व्यवसाय साबित हो सकता है अगर वो कुछ बुनियादी बातों और नस्ल का ध्यान रखकर इसकी शुरुआत करते हैं।
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