किशोर पंवार ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती का रास्ता चुना, जीरो टिलेज मशीन से बदली खेती की तस्वीर

जीरो टिलेज मशीन अपनाकर किशोर पंवार ने बिना जुताई के खेती में घटाई लागत, बचाया समय और बढ़ाई पैदावार।

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ ब्लॉक के कामठी गांव के किसान किशोर पंवार की कहानी उन युवाओं के लिए ख़ास है जो खेती को नए नजरिए से देखना चाहते हैं। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती को अपनाया और सिर्फ़ डेढ़ साल के भीतर अपने खेतों में ऐसे बदलाव किए कि आसपास के किसान भी हैरान रह गए।

आज किशोर पंवार लगभग 8 एकड़ ज़मीन में खेती कर रहे हैं और आधुनिक तकनीक अपनाकर खेती को ज़्यादा टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। इस बदलाव में सबसे बड़ी भूमिका जीरो टिलेज मशीन की रही, जिसने उनकी खेती का तरीका ही बदल दिया।

बदलते मौसम ने सोच बदलने पर किया मजबूर

पिछले कुछ वर्षों में मौसम के मिजाज में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी अचानक बारिश, कभी लंबे समय तक सूखा और कभी ओलावृष्टि जैसी घटनाएं किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं।

छिंदवाड़ा जिले के किसान भी इन समस्याओं से जूझ रहे थे। इसी दौरान बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया और कृषि विभाग द्वारा जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसका उद्देश्य किसानों को नई तकनीकों से जोड़ना और खेती को मौसम के अनुसार ढालना था।

जब किशोर पंवार इस कार्यक्रम से जुड़े तो उन्हें कई नई तकनीकों के बारे में जानकारी मिली। इन्हीं तकनीकों में से एक थी जीरो टिलेज मशीन, जिसने उनके खेती करने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया।

बिना जुताई के शुरू की गेहूं की खेती

धान की कटाई के बाद आमतौर पर किसान खेत की जुताई करते हैं या पराली जला देते हैं। लेकिन किशोर पंवार ने इस बार अलग रास्ता चुना। उन्होंने न तो खेत की जुताई की और न ही पराली को जलाया। इसके बजाय उन्होंने सीधे जीरो टिलेज मशीन की मदद से गेहूं की बुवाई कर दी।

खेत में बची पराली धीरे-धीरे सड़कर मिट्टी में मिल गई, जिससे खेत की उर्वरता बढ़ी और मिट्टी में नमी भी बनी रही। इस तरीके से खेती करने से पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हुआ और खेती की लागत भी कम हो गई।

किशोर पंवार ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती का रास्ता चुना, जीरो टिलेज मशीन से बदली खेती की तस्वीर

पराली न जलाने से हुई सीधी बचत

इस तरीके का सबसे बड़ा फ़ायदा यह हुआ कि खेत में कई तरह के ख़र्च बच गए। ट्रैक्टर से जुताई करने की ज़रूरत नहीं पड़ी, डीजल का ख़र्च भी नहीं हुआ और बार-बार खेत तैयार करने की मेहनत भी कम हो गई।

किशोर पंवार बताते हैं कि इस तरीके से उन्हें प्रति एकड़ लगभग दो से तीन हज़ार रुपये तक की बचत हुई। यह सब संभव हुआ क्योंकि उन्होंने खेती में जीरो टिलेज मशीन का इस्तेमाल किया और पारंपरिक तरीके की बजाय नई तकनीक पर भरोसा किया।

बारिश ने रोकी खेती, लेकिन तकनीक बनी सहारा

खेती के मौसम में एक और चुनौती सामने आई। अचानक हुई बारिश की वजह से खेत काफ़ी समय तक गीले रहे। पुराने तरीके में किसान को खेत सूखने का इंतजार करना पड़ता है, जिससे बुवाई में देरी हो जाती है और उत्पादन पर असर पड़ता है।

लेकिन किशोर पंवार के खेत में जीरो टिलेज मशीन ने इस समस्या को भी आसान बना दिया। गीली ज़मीन में भी मशीन ने सही तरीके से काम किया और समय पर बुवाई हो गई। इसका सीधा फ़ायदा यह हुआ कि फ़सल सही समय पर तैयार हुई और उत्पादन पर मौसम का असर नहीं पड़ा।

जब गांव वालों ने उड़ाया मजाक

जब खेत में जीरो टिलेज मशीन से बुवाई हुई तो शुरू में बीज ज़मीन की सतह पर दिखाई दे रहे थे। यह देखकर गांव के कई लोगों को लगा कि यह तरीका गलत है। कुछ किसानों ने तो यहां तक कह दिया कि बीज ऊपर पड़ा है और पक्षी खा जाएंगे। कई लोगों ने उन्हें सलाह दी कि रोटावेटर चलाकर खेत को फिर से तैयार कर लें।

लेकिन किशोर पंवार ने किसी की बात नहीं मानी। उन्हें भरोसा था कि प्रशिक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने जो बताया है वह सही है। कुछ ही दिनों में जब खेत में पौधे निकलने लगे और पूरा खेत हरा हो गया, तब लोगों की सोच भी बदलने लगी।

बीज की बचत और मज़बूत पौधे

पहले जब वे पारंपरिक तरीके से बुवाई करते थे तो बीज की मात्रा ज़्यादा लगती थी। बीज बिखरकर गिरते थे और पौधे भी समान दूरी पर नहीं उगते थे। लेकिन जीरो टिलेज मशीन से कतार में बुवाई होने लगी। इससे बीज सही गहराई और दूरी पर गिरते हैं।

इसका फ़ायदा यह हुआ कि पौधों की जड़ें मज़बूत बनीं और फ़सल का विकास बेहतर हुआ। साथ ही सिंचाई के पानी की ज़रूरत भी पहले से कम हो गई।

किशोर पंवार ने सरकारी नौकरी छोड़कर खेती का रास्ता चुना, जीरो टिलेज मशीन से बदली खेती की तस्वीर

खेत में दिखा शानदार परिणाम

जब फ़सल तैयार हुई तो खेत की हालत देखकर गांव के किसान भी चकित रह गए। लंबी बालियां और मोटे दाने देखकर सभी को समझ आ गया कि नई तकनीक का सही उपयोग खेती को बेहतर बना सकता है।

जो किसान पहले मजाक उड़ा रहे थे, वही अब किशोर पंवार से पूछने लगे कि जीरो टिलेज मशीन कहां मिलती है और इसे कैसे इस्तेमाल किया जाता है।

गांव के किसानों के लिए बने प्रेरणा

आज किशोर पंवार का खेत आसपास के किसानों के लिए एक सीखने का केंद्र बन गया है। कई किसान उनके खेत पर आकर इस तकनीक को देखते हैं और समझते हैं कि जीरो टिलेज मशीन कैसे काम करती है।

उनकी पहल से गांव में धीरे-धीरे नई तकनीकों के प्रति भरोसा बढ़ने लगा है।

खेती में बदलाव से बदलती सोच

किशोर पंवार का मानना है कि खेती में बदलाव करना शुरू में थोड़ा कठिन लगता है। लोग सवाल भी उठाते हैं और कई बार मजाक भी बनाते हैं। लेकिन अगर किसान सही जानकारी और तकनीक के साथ आगे बढ़े तो खेती में अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।

आज उनकी 8 एकड़ की खेती में जीरो टिलेज मशीन ने लागत कम करने, समय बचाने और उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। किशोर पंवार की कहानी यह दिखाती है कि अगर किसान नई तकनीक को समझकर अपनाएं, तो खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है।

उनका अनुभव यह भी बताता है कि जीरो टिलेज मशीन केवल एक मशीन नहीं, बल्कि खेती के तरीके को बदलने वाली तकनीक है, जो आने वाले समय में किसानों के लिए और भी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

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