प्राकृतिक खेती की राह पर चल रहे मेहर सिंह चौहान, जानें कैसे उन्होंने सेब की खेती को बनाया सफल मॉडल

प्राकृतिक खेती अपनाकर मेहर सिंह चौहान ने सेब की खेती में घटाई लागत, सुधारी मिट्टी की सेहत और बढ़ाई आमदनी।

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के जुब्बल क्षेत्र के किसान मेहर सिंह चौहान की कहानी खेती की दुनिया में एक अलग ही संदेश देती है। कभी वे किसानों को रासायनिक खाद और दवाइयां बेचते थे, लेकिन आज वही किसान दूसरों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। चार दशक से बागवानी से जुड़े मेहर सिंह चौहान ने अपने अनुभव से समझा कि खेती में असली ताकत मिट्टी की सेहत और प्रकृति के संतुलन में छिपी होती है।

रासायनिक खेती से शुरू हुआ सफ़र

मेहर सिंह चौहान लंबे समय तक अपने बागान में सामान्य तरीके से खेती करते रहे। वे खुलकर रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करते थे, क्योंकि उस समय ज़्यादातर किसान यही तरीक़ा अपनाते थे। उनका मुख्य काम सेब की खेती था और वे लगातार उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करते रहते थे।

लेकिन हर साल उन्हें महसूस होने लगा कि रसायनों का असर मिट्टी और पौधों पर दिखने लगा है। पौधों की सेहत कमज़ोर होने लगी और उत्पादन में भी उतार-चढ़ाव आने लगा।

जब दिखने लगा रसायनों का असर

एक समय ऐसा आया जब उन्हें साफ महसूस हुआ कि रासायनिक खेती से मिट्टी की उर्वरता कम होती जा रही है। उन्होंने देखा कि फ़सल पर कीटनाशकों का असर बढ़ता जा रहा है और हर साल नई दवाइयों की ज़रूरत पड़ रही है।

तभी उनके मन में सवाल उठा कि क्या खेती का कोई ऐसा तरीक़ा हो सकता है जिसमें मिट्टी की ताकत भी बनी रहे और खेती भी सुरक्षित हो। यहीं से उन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया।

प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण से मिली नई दिशा

साल 2018 में उन्हें जुब्बल क्षेत्र में आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होने का मौक़ा मिला। यह प्रशिक्षण सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती पद्धति से जुड़ा था। प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों और तकनीकों को विस्तार से समझा।

उन्होंने सबसे पहले अपने खेत के एक हिस्से में जीवामृत और घनजीवामृत जैसे प्राकृतिक इनपुट्स का प्रयोग शुरू किया। इस प्रयोग ने उन्हें सकारात्मक परिणाम दिखाने शुरू कर दिए।

प्राकृतिक खेती की राह पर चल रहे मेहर सिंह चौहान, जानें कैसे उन्होंने सेब की खेती को बनाया सफल मॉडल

पूरे बागान में अपनाया प्राकृतिक तरीक़ा

प्रयोग सफल होने के बाद मेहर सिंह चौहान ने धीरे-धीरे अपने पूरे बागान में प्राकृतिक खेती अपनाने का फैसला किया। आज वे लगभग 25 बीघा ज़मीन में खेती करते हैं, जिसमें से 12 बीघा क्षेत्र पूरी तरह प्राकृतिक खेती के तहत है।उनका मानना है कि जब खेत में रसायनों का इस्तेमाल बंद हो जाता है, तो मिट्टी की सेहत धीरे-धीरे खुद बेहतर होने लगती है।

सेब के साथ विविध फ़सलों की खेती

मेहर सिंह चौहान के बागान में कई तरह की फ़सलें उगाई जाती हैं। वे रॉयल, रेड चीफ, रॉयल डिलीशियस, ओरेगन स्पर और स्कारलेट जैसी किस्मों के साथ सेब की खेती करते हैं।

इसके अलावा नाशपाती, आड़ू, मक्का, राजमा और कोदा जैसी फ़सलें भी खेत में लगाई जाती हैं। इस तरह की मिश्रित व्यवस्था प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है क्योंकि इससे मिट्टी को प्राकृतिक पोषण मिलता है और खेत का संतुलन बना रहता है।

पौधों की सेहत में आया बड़ा बदलाव

मेहर सिंह बताते हैं कि जब से उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाई है, तब से उनके सेब के पौधे पहले से ज़्यादा स्वस्थ दिखने लगे हैं। पत्तियों का रंग बेहतर हुआ है और फल की गुणवत्ता में भी सुधार आया है।

उनका कहना है कि सेब की खेती में सबसे ज़रूरी चीज पौधों की सेहत होती है और प्राकृतिक तरीके अपनाने से पौधे ज़्यादा मज़बूत बनते हैं।

मिट्टी की उर्वरता में आया सुधार

प्राकृतिक इनपुट्स के इस्तेमाल से खेत की मिट्टी पहले से ज़्यादा उपजाऊ हो गई है। मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ी हैं और पौधों की जड़ों को बेहतर पोषण मिलने लगा है।

मेहर सिंह कहते हैं कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उन्हें यह भी महसूस हुआ कि खेत सूखे और मिट्टी कटाव जैसी परिस्थितियों को भी बेहतर तरीके से सहन करने लगा है।

बीमारी और कीटों की समस्या हुई कम

पहले जहां फ़सलों में बीमारियों और कीटों की समस्या बार-बार सामने आती थी, वहीं अब स्थिति काफ़ी बदल गई है। प्राकृतिक खेती के इनपुट्स के इस्तेमाल से पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत हुई है।

इसका असर सीधे सेब की खेती पर भी दिखा है। फल की गुणवत्ता सुधरी है और पौधों की बढ़वार भी संतुलित तरीके से हो रही है।

प्राकृतिक खेती की राह पर चल रहे मेहर सिंह चौहान, जानें कैसे उन्होंने सेब की खेती को बनाया सफल मॉडल

उत्पादन और आय में भी मिला संतुलन

मेहर सिंह चौहान के अनुसार पहले रासायनिक खेती में ख़र्च काफ़ी ज़्यादा होता था। रसायनों और दवाइयों पर लगभग 55 हजार रुपये तक ख़र्च हो जाते थे, जबकि अब प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनका ख़र्च काफ़ी कम होकर क़रीब 4200 रुपये रह गया है और आमदनी भी बढ़ गई है। सेब की खेती में लागत कम करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना उत्पादन बढ़ाना।

बाज़ार में भी मिल रही अच्छी पहचान

मेहर सिंह के बागान में लगभग 600 सेब के पौधे हैं। पिछले साल उन्होंने स्थानीय बाज़ार में क़रीब 600 सेब के बॉक्स बेचे, जिनमें हर बॉक्स का वजन लगभग 20 किलो था। औसतन उन्हें प्रति बॉक्स लगभग 2500 रुपये का भाव मिला। इससे यह साबित होता है कि अगर सेब की खेती में गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए तो बाज़ार में अच्छी क़ीमत मिल सकती है।

दूसरों को भी दे रहे प्राकृतिक खेती की सलाह

दिलचस्प बात यह है कि मेहर सिंह चौहान आज भी अपनी दुकान पर कृषि से जुड़े उत्पाद बेचते हैं। लेकिन जब किसान उनकी दुकान पर रासायनिक दवाइयां खरीदने आते हैं, तो वे उन्हें प्राकृतिक खेती के फ़ायदे भी बताते हैं।

वे कहते हैं कि किसान खुद भी वही फल और सब्ज़ियां खाते हैं जो वे उगाते हैं, इसलिए खेती का तरीक़ा ऐसा होना चाहिए जो स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हो।

अनुभव से निकला एक मज़बूत संदेश

चार दशक के अनुभव के बाद मेहर सिंह चौहान का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल लागत कम करने का तरीक़ा नहीं है, बल्कि यह खेती को टिकाऊ बनाने का रास्ता भी है। उनका कहना है कि अगर किसान धीरे-धीरे इस पद्धति को अपनाना शुरू करें, तो भविष्य में खेती ज़्यादा सुरक्षित और लाभकारी बन सकती है।

आज उनकी सेब की खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि एक ऐसा उदाहरण बन चुकी है जो बताती है कि सही समय पर लिया गया फैसला पूरी खेती की दिशा बदल सकता है।

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