Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर संजीव नेगी ने सेब की खेती को बनाया लाभकारी और टिकाऊ

प्राकृतिक खेती अपनाकर संजीव नेगी ने सेब की खेती में घटाई लागत, बढ़ाई गुणवत्ता और बनाई टिकाऊ खेती का सफल मॉडल।

प्राकृतिक खेती Natural farming

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले किसान संजीव नेगी की कहानी उन किसानों के लिए मिसाल है, जो बढ़ती लागत, घटती उपज और मिट्टी की खराब होती सेहत से परेशान हैं। एक समय ऐसा था जब उनकी बागवानी भी बाकी किसानों की तरह चुनौतियों से घिरी हुई थी, लेकिन आज वही खेत उनकी नई सोच और बदलाव की ताकत का उदाहरण बन चुके हैं। उन्होंने खेती का रास्ता बदला और प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी किस्मत भी बदल दी।

जब सेब के बागान में आने लगी समस्याएं

साल 2020 के आसपास इलाके के कई किसानों को सेब की गुणवत्ता और रंगत से जुड़ी समस्या का सामना करना पड़ा। बाज़ार में सही दाम नहीं मिल रहे थे और उत्पादन पर भी असर दिखने लगा। उस समय संजीव नेगी भी इसी चिंता से गुजर रहे थे।

वे लंबे समय से सेब की खेती कर रहे थे, लेकिन रासायनिक खेती पर बढ़ती निर्भरता से मिट्टी की ताकत कम हो रही थी। कीट और बीमारियां बढ़ रही थीं, जिससे लागत भी लगातार बढ़ती जा रही थी। उन्हें महसूस हुआ कि अगर खेती का तरीका नहीं बदला, तो आगे चलकर नुक़सान और बढ़ सकता है।

सीखने की शुरुआत, इंटरनेट से प्रशिक्षण तक

संजीव ने शुरुआत में इंटरनेट और वीडियो के जरिए प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। धीरे-धीरे उनकी रुचि बढ़ती गई। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2019 में सोलन में आयोजित एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लिया, जहां उन्होंने इस पद्धति को व्यवहारिक रूप से समझा। इस प्रशिक्षण ने उनकी सोच को पूरी तरह बदल दिया।

उन्हें यह समझ आया कि खेती केवल उत्पादन का काम नहीं है, बल्कि मिट्टी, सूक्ष्मजीव और प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया है।

Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर संजीव नेगी ने सेब की खेती को बनाया लाभकारी और टिकाऊ

छोटे स्तर से किया प्रयोग

नई जानकारी मिलने के बाद उन्होंने पूरे खेत में बदलाव करने के बजाय पहले 7 बीघा ज़मीन पर प्राकृतिक खेती का प्रयोग शुरू किया। शुरुआत में परिवार के लोगों को भी थोड़ा संदेह था, लेकिन संजीव ने धैर्य रखा और धीरे-धीरे परिणाम सामने आने लगे। आज वे 30 बीघा ज़मीन में बागवानी संभालते हैं, जिसमें से 7 बीघा क्षेत्र पूरी तरह प्राकृतिक खेती के तहत है और बाकी खेतों में भी इसी दिशा में बदलाव किया जा रहा है।

सेब के साथ अन्य फ़सलों का संतुलन

संजीव नेगी का बागान केवल सेब की खेती तक सीमित नहीं है। उन्होंने बहुफ़सली प्रणाली अपनाई है। उनके खेत में सेब के अलावा अनार, आड़ू, राजमा, बीन्स और मटर जैसी फ़सलें भी उगाई जाती हैं। इससे खेत में जैव विविधता बनी रहती है और मिट्टी की सेहत बेहतर होती है।

इस तरह की मिश्रित व्यवस्था प्राकृतिक खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो ज़ोखिम को कम करती है और आय के कई स्रोत तैयार करती है।

देसी संसाधनों से तैयार किए जैविक घोल

संजीव अपने खेत में गाय के गोबर और गौमूत्र से तैयार किए गए घोलों का उपयोग करते हैं। इन प्राकृतिक इनपुट्स के इस्तेमाल से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ी है और केंचुए भी पहले से ज़्यादा दिखाई देने लगे हैं। इससे मिट्टी की संरचना सुधरी और पौधों की जड़ों को बेहतर पोषण मिलने लगा।

कीट नियंत्रण के लिए वे अग्नि अस्त्र और दशपर्णी अर्क जैसे घोलों का उपयोग करते हैं। इससे मिट्टी में रहने वाले हानिकारक कीट और इल्ली की समस्या काफी हद तक नियंत्रित हो गई। यही वजह है कि अब उन्हें रासायनिक दवाओं की जरूरत नहीं पड़ती और प्राकृतिक खेती का भरोसा लगातार मजबूत होता गया।

लागत घटी, आय में हुआ सुधार

पहले जब वे रासायनिक तरीके से खेती करते थे, तब खेती पर ख़र्च बहुत ज़्यादा आता था। खाद, दवाइयां और मजदूरी पर हजारों रुपये ख़र्च हो जाते थे। अब प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद लागत में भारी कमी आई है क्योंकि ज़्यादातर सामग्री खेत और पशुओं से ही मिल जाती है। उनके अनुसार पहले जहां ख़र्च अधिक और आय सीमित थी, वहीं अब कम ख़र्च में बेहतर उत्पादन मिल रहा है। इससे खेती फिर से लाभ का सौदा बनती दिख रही है।

गुणवत्ता में आया बदलाव, बाज़ार में बढ़ी मांग

संजीव बताते हैं कि सेब की खेती में सबसे बड़ा बदलाव गुणवत्ता को लेकर आया है। फल का रंग, स्वाद और भंडारण क्षमता पहले से बेहतर हुई है। रसायनों का उपयोग बंद होने से उत्पाद अधिक प्राकृतिक और सुरक्षित माना जा रहा है, जिससे बाज़ार में भी अच्छी पहचान मिलने लगी है। धीरे-धीरे उनका बागान आसपास के किसानों के लिए सीखने का केंद्र बन गया है।

Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर संजीव नेगी ने सेब की खेती को बनाया लाभकारी और टिकाऊ

किसानों से सवांद करने का अनुभव

संजीव नेगी पेशे से शिक्षक भी हैं। यही कारण है कि उन्होंने अपने अनुभव को केवल अपने खेत तक सीमित नहीं रखा। वे आसपास के किसानों को प्रशिक्षण देते हैं और सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर भी जागरूकता फैलाते हैं।

अब तक वे लगभग 10 गांवों के किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में समझा चुके हैं। कई किसान उनके मार्गदर्शन में रासायनिक खेती छोड़कर इस पद्धति की ओर बढ़ रहे हैं।

पहाड़ों के लिए क्यों ज़रूरी है यह मॉडल?

पहाड़ी क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव, सीमित संसाधन और ज़्यादा लागत खेती को कठिन बना देते हैं। ऐसे में प्राकृतिक खेती एक टिकाऊ विकल्प बनकर सामने आई है। कम पानी, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और मिट्टी की सेहत को सुधारने वाली यह पद्धति पहाड़ी किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो रही है। संजीव का मानना है कि अगर किसान अपनी ज़मीन को जिंदा रखना चाहते हैं, तो उन्हें प्रकृति के साथ तालमेल बैठाना ही होगा।

बदलती सोच की एक प्रेरक मिसाल

संजीव नेगी की जर्नी यह दिखाती है कि खेती में बदलाव किसी बड़े निवेश से नहीं, बल्कि सोच बदलने से शुरू होता है। आज उनका बागान केवल उत्पादन का स्थान नहीं, बल्कि सीखने की एक प्रयोगशाला बन गया है, जहां किसान आकर समझते हैं कि प्राकृतिक खेती कैसे ज़मीन, फ़सल और आय तीनों को संतुलित कर सकती है।

वे कहते हैं कि अब उन्हें गर्व है कि वे स्वस्थ फल और सब्जियां उगा रहे हैं और उनका खेत दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुका है। सेब की खेती के साथ प्रकृति आधारित यह मॉडल आने वाले समय में और किसानों के लिए नई राह दिखा सकता है।

ये भी पढ़ें : प्राकृतिक खेती से कम लागत में बेहतर उत्पादन का मॉडल पेश किया पवन शर्मा ने

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top