नौकरी छोड़कर सेब की प्राकृतिक खेती से सफल हुए प्रमोद देस्ता

प्राकृतिक खेती अपनाकर प्रमोद देस्ता ने सेब की खेती में लागत घटाई, गुणवत्ता बढ़ाई और टिकाऊ खेती से बेहतर आमदनी हासिल की।

प्राकृतिक खेती Natural farming

हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के रामपुर ब्लॉक के नरैन गांव में रहने वाले प्रमोद देस्ता की कहानी उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेती को भविष्य के तौर पर देखना चाहते हैं। कंप्यूटर एप्लीकेशन में ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने निजी नौकरी शुरू की थी, लेकिन मन कहीं और था। शहर की भागदौड़ से अलग, वे अपनी ज़मीन पर कुछ टिकाऊ और अर्थपूर्ण करना चाहते थे। इसी सोच के साथ साल 2018 में प्रमोद ने नौकरी छोड़ी और अपने गांव लौटकर सेब की खेती शुरू करने का फ़ैसला लिया।

रासायनिक से टिकाऊ विकल्प की खोज

शुरुआत में प्रमोद भी आम किसानों की तरह रासायनिक तरीकों से बागवानी कर रहे थे। लेकिन जल्दी ही उन्हें महसूस हुआ कि लागत बढ़ती जा रही है, बीमारी नियंत्रण में भारी ख़र्च आता है और मिट्टी की सेहत पर भी असर पड़ता है। इसी दौरान उन्हें सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती (SPNF) के बारे में जानकारी मिली। एक टीवी इंटरव्यू ने उन्हें इस दिशा में गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया।

प्रमोद ने तय किया कि वे अचानक पूरा बदलाव नहीं करेंगे। पहले सीखेंगे, समझेंगे और फिर अपनाएंगे। यही समझदारी आगे चलकर उनके लिए फ़ायदेमंद साबित हुई।

प्रशिक्षण और छोटे प्रयोग से शुरुआत

प्रमोद ने कुफरी में आयोजित 6 दिन के प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया। वहां उन्होंने प्राकृतिक खेती के बुनियादी सिद्धांत, इनपुट्स की तैयारी और फ़सलों की देखभाल के तरीके सीखे। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अपने सेब के बाग के एक हिस्से—क़रीब 3.2 बीघा—में इस पद्धति को अपनाया।

यह फ़ैसला ज़ोखिम भरा था, लेकिन प्रमोद ने धैर्य रखा। पहले साल से ही उन्हें छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव दिखने लगे—पौधों की मज़बूती, पत्तियों की सेहत और फलों की गुणवत्ता में सुधार।

नौकरी छोड़कर सेब की प्राकृतिक खेती से सफल हुए प्रमोद देस्ता

बाग की बड़ी चुनौती और समाधान

प्रमोद का सेब का बाग ऊंचाई पर और कुछ हद तक छायादार इलाके में है, जहां पहले पाउडरी मिल्ड्यू जैसी बीमारी अक्सर आ जाती थी। रासायनिक खेती के समय इस बीमारी को रोकने में हज़ारों रुपये ख़र्च हो जाते थे।

लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद स्थिति बदली। देस्ता बताते हैं कि प्राकृतिक इनपुट्स से बीमारी का दबाव कम हुआ और ख़र्च भी काफ़ी घट गया। यही नहीं, दो साल के भीतर पौधों की सेहत में साफ़ सुधार दिखा।

लागत घटी, आमदनी बढ़ी

प्रमोद देस्ता के अनुभव में प्राकृतिक खेती का सबसे बड़ा फ़ायदा लागत में कमी है। पहले जहां रासायनिक खेती में सालाना लगभग 20,000 रुपये ख़र्च होते थे, वहीं प्राकृतिक तरीकों में यह ख़र्च घटकर क़रीब 2,000 रुपये रह गया।

आमदनी की बात करें तो फर्क और भी साफ़ है। रासायनिक खेती से आय कम होती थी, वहीं प्राकृतिक तरीके अपनाने के बाद आय बढ़ गई। यानी कम ख़र्च में बेहतर नतीजे। यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रहा। प्रमोद बताते हैं कि प्राकृतिक तरीकों से उगाए गए सेब ज़्यादा ठोस होते हैं और उनकी शेल्फ लाइफ भी बेहतर रहती है।

सेब की खेती के साथ विविध फ़सलें

प्रमोद ने केवल सेब की खेती पर निर्भर रहने के बजाय विविधता भी अपनाई। उनके खेतों में अलग-अलग क़िस्मों के सेब—रॉयल, गोल्डन और रेड गोल्डन—के साथ मक्का और राजमा जैसी फ़सलें भी उगाई जाती हैं।

इस विविधता से ज़ोखिम कम होता है और साल भर खेत से कुछ न कुछ आमदनी बनी रहती है। प्रमोद का मानना है कि प्राकृतिक खेती में फ़सल विविधता बहुत मददगार साबित होती है।

युवा किसानों को आकर्षित कर रही प्राकृतिक खेती

प्रमोद देस्ता कहते हैं कि आज प्राकृतिक खेती पढ़े-लिखे और युवा किसानों को अपनी ओर खींच रही है। इसकी वजह साफ़ है—कम लागत, मिट्टी की सेहत और स्थिर आमदनी।

उनके अनुसार, “हम सिर्फ़ अपनी आय नहीं बढ़ा रहे, बल्कि प्रकृति को भी बचा रहे हैं। यही खेती का असली मक़सद होना चाहिए।”

नौकरी छोड़कर सेब की प्राकृतिक खेती से सफल हुए प्रमोद देस्ता

अन्य किसानों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन

आज प्रमोद देस्ता सिर्फ़ अपने खेत तक सीमित नहीं हैं। वे आसपास के क़रीब 10 गांवों में किसानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं। अपने संसाधनों से वे किसानों को बताते हैं कि कैसे छोटे-छोटे कदम उठाकर रासायनिक निर्भरता कम की जा सकती है।

उनका मानना है कि जब किसान खुद देखता है कि किसी के खेत में नतीजे कैसे आ रहे हैं, तब वह बदलाव के लिए तैयार होता है।

सेब की खेती में टिकाऊ भविष्य की सोच

हिमाचल जैसे पहाड़ी इलाकों में सेब की खेती लंबे समय से आय का मुख्य साधन रही है। लेकिन बढ़ती लागत और जलवायु बदलाव के बीच टिकाऊ तरीकों की ज़रूरत पहले से ज़्यादा महसूस हो रही है। प्रमोद देस्ता की कहानी बताती है कि प्राकृतिक खेती इस दिशा में एक मज़बूत विकल्प बन सकती है।

वे कहते हैं कि छोटे बदलाव जैसे मिट्टी को ज़िंदा रखना, स्थानीय इनपुट्स का इस्तेमाल और रसायनों से दूरी लंबे समय में बड़े फ़ायदे देते हैं।

निष्कर्ष

प्रमोद देस्ता की जर्नी यह दिखाती है कि प्राकृतिक खेती समझदारी भरे फैसलों का नतीजा है। नौकरी छोड़कर गांव लौटना आसान नहीं होता, लेकिन सही दिशा और धैर्य के साथ यह फ़ैसला सफल हो सकता है।

सेब की खेती में प्राकृतिक तरीकों को अपनाकर प्रमोद ने न सिर्फ़ अपनी आमदनी को स्थिर किया, बल्कि मिट्टी और पर्यावरण की रक्षा का रास्ता भी चुना। उनकी कहानी उन सभी किसानों और युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो खेती में टिकाऊ और भरोसेमंद भविष्य तलाश रहे हैं।

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