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दशकों से ऊर्जा भारतीय खेती की सबसे कमज़ोर कड़ी रही है। किसान सिंचाई के लिए कभी अनियमित ग्रिड बिजली, कभी महंगे डीज़ल पंप, तो कभी भरोसेमंद न होने वाली बिजली आपूर्ति पर निर्भर रहे हैं। इस निर्भरता ने फसल चयन को प्रभावित किया, लागत बढ़ाई और अनिश्चितता पैदा की, खासकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए। आज यह स्थिति धीरे-धीरे बदल रही है। सौर ऊर्जा, जिसे कभी दूर या केवल शहरी माना जाता था, अब खेतों तक पहुंच रही है और गांवों में पानी, बिजली और आय के प्रवाह को नया रूप दे रही है।
इस बदलाव के केंद्र में विकेन्द्रित नवीकरणीय ऊर्जा की ओर भारत का प्रयास है, जिसे पीएम-कुसुम जैसे कार्यक्रम आगे बढ़ा रहे हैं और जिसे नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, नीति आयोग और विश्व बैंक जैसे वैश्विक संस्थानों का समर्थन मिल रहा है। मिलकर ये पहलें खेतों में एक शांत लेकिन शक्तिशाली ऊर्जा क्रांति का संकेत देती हैं।
खेती में ऊर्जा इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
सिंचाई भारतीय कृषि की रीढ़ है, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी लागत भी है। डीज़ल पंप किसानों को ईंधन कीमतों के झटकों के सामने असहाय बनाते हैं, जबकि ग्रिड से चलने वाले पंपों में कम वोल्टेज, रात की सप्लाई या बार-बार कटौती जैसी समस्याएं रहती हैं। ये बाधाएं केवल उत्पादन नहीं, बल्कि यह भी तय करती हैं कि कौन-सी फसल कब बोई जाए और कब सिंचाई की जाए।
ऊर्जा की अनिश्चितता के पर्यावरणीय नुकसान भी हुए हैं। सब्सिडी वाली बिजली के कारण कई राज्यों में भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ है। डीज़ल पंप वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं और खेती की लागत भी बढ़ाते हैं। इसलिए स्वच्छ और भरोसेमंद ऊर्जा की जरूरत आर्थिक और पर्यावरणीय – दोनों कारणों से रही है।
पीएम-कुसुम: ऊर्जा–पानी के समीकरण में बदलाव
प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान, जिसे पीएम-कुसुम कहा जाता है, इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए बनाया गया है। यह योजना तीन मुख्य हिस्सों के जरिए खेती का सौरकरण करती है: स्टैंडअलोन सोलर पंप, ग्रिड से जुड़े मौजूदा पंपों का सौरकरण और बंजर या परती भूमि पर विकेन्द्रित सौर संयंत्र।
पीएम-कुसुम के तहत किसानों को सोलर पंप लगाने के लिए भारी पूंजी सब्सिडी मिलती है, जिससे शुरुआती लागत कम होती है। एमएनआरई के आंकड़े बताते हैं कि ये पंप दिन के समय भरोसेमंद बिजली देते हैं, जिससे किसान फसल की जरूरत के अनुसार सिंचाई कर पाते हैं, न कि बिजली मिलने के समय के अनुसार।
किसानों के लिए इसका तुरंत फ़ायदा है तय समय पर सिंचाई और कम चलने वाली लागत। एक बार लग जाने के बाद सोलर पंप बिना ईंधन खर्च और कम रखरखाव के चलते हैं। समय के साथ यह खेती की अर्थव्यवस्था को स्थिर करता है, खासकर पानी ज्यादा मांगने वाली लेकिन अधिक मूल्य वाली फसलों के लिए।
सोलर पंप से सबसे ज्यादा फ़ायदा किसे होता है?
सोलर पंप सभी किसानों को एक जैसा लाभ नहीं देते। यह समझना जरूरी है कि वे कहां सबसे बेहतर बैठते हैं, ताकि गलत निवेश से बचा जा सके। जिन क्षेत्रों में डीज़ल पर निर्भरता ज्यादा है, ग्रिड सप्लाई अनिश्चित है और धूप अच्छी मिलती है, वहां किसानों को सबसे ज्यादा लाभ होता है। इसमें राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड शामिल है।
छोटे और सीमांत किसान जिनके बोरवेल उथले से मध्यम गहराई के हैं, उन्हें जल्दी लाभ दिखता है क्योंकि पंप का आकार छोटा रहता है और लागत भी कम होती है। सब्जियां, दलहन, तिलहन और बागवानी फसलें उगाने वाले किसानों को केवल पानी ज्यादा लेने वाली फसलों की तुलना में अधिक फ़ायदा मिलता है। वर्षा आधारित किसानों के लिए सोलर पंप लगातार सिंचाई की बजाय सुरक्षा सिंचाई के रूप में ज्यादा उपयोगी हैं।
महिला किसान और एफपीओ जो साझा कुओं या सामुदायिक सिंचाई प्रणालियों का प्रबंधन करते हैं, उन्हें व्यक्तिगत डीज़ल पंपों की तुलना में सोलर पंप ज्यादा किफ़ायती और संभालने में आसान लगते हैं।
सोलर पंप से स्मार्ट ग्रिड तक
भारत के ऊर्जा परिवर्तन का अगला चरण केवल स्टैंडअलोन सोलर पंपों तक सीमित नहीं है। ग्रिड से जुड़े सोलर पंप किसानों को सिंचाई के लिए सौर ऊर्जा इस्तेमाल करने के साथ-साथ अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचने का मौका भी देते हैं। इससे पानी बचाने का एक मजबूत प्रोत्साहन मिलता है।
जब किसान बची हुई सौर बिजली बेचकर कमाते हैं, तो कम पानी पंप करना लाभदायक हो जाता है। नीति आयोग और विश्व बैंक के अध्ययन इसे लंबे समय के फायदे वाला व्यवहारिक बदलाव बताते हैं। जहां पहले मुफ़्त या फ्लैट रेट बिजली भूजल के अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देती थी, वहीं सोलर से जुड़े ग्रिड संरक्षण को इनाम देते हैं।
कुछ राज्यों में फीडर स्तर पर सौरकरण के प्रयोग हो रहे हैं, जहां पूरे ग्रामीण फीडर सौर संयंत्रों से चलाए जाते हैं। इससे खेतों और घरों, दोनों के लिए बिजली की गुणवत्ता सुधरती है और वितरण कंपनियों का नुकसान कम होता है। खेती ग्रिड पर बोझ बनने की बजाय योगदान देने लगती है।
सोलर पंप और फसल योजना
सौर सिंचाई का एक कम चर्चित लाभ यह है कि यह फसल योजना को कैसे बदलती है। जब सिंचाई भरोसेमंद हो जाती है, तो किसान आपातकालीन पानी देने की बजाय योजनाबद्ध सिंचाई कर पाते हैं। इससे जड़ों का विकास बेहतर होता है, फसल पर तनाव कम होता है और उर्वरक का उपयोग अधिक प्रभावी बनता है।
सोलर पंप इस्तेमाल करने वाले किसान अक्सर इनकी ओर बढ़ते हैं:
• ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणाली।
• सब्जियां और कम अवधि वाली फसलें।
• एकल फसल की बजाय मिश्रित फसल।
• उर्वरक देने का बेहतर समय निर्धारण।
एमएनआरई के क्षेत्रीय अवलोकन बताते हैं कि माइक्रो-सिंचाई के साथ सोलर पंप इस्तेमाल करने वाले किसान 30–50 प्रतिशत तक पानी की बचत करते हैं। इससे सीधे बिजली उपयोग, भूजल दोहन और लागत तीनों घटते हैं।
खेती की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
सौर ऊर्जा खेती की अर्थव्यवस्था को कई तरीकों से बदलती है। पहला, यह बार-बार होने वाले खर्च को कम करती है। डीज़ल खर्च खत्म हो जाता है और बिजली बिल काफ़ी घट जाता है। दूसरा, यह जोखिम कम करती है। सिंचाई अब ईंधन की उपलब्धता या ग्रिड समय पर निर्भर नहीं रहती।
तीसरा, सोलर पंप विविधता को बढ़ावा देते हैं। किसान सब्जियों, दलहनों और बागवानी जैसी फसलों की ओर बढ़ सकते हैं, जिन्हें समय पर और नियंत्रित सिंचाई चाहिए। भरोसेमंद ऊर्जा से डेयरी, छोटे स्तर का कोल्ड स्टोरेज और खेत पर प्रसंस्करण जैसी सहायक गतिविधियां भी संभव होती हैं।
भारत में सोलर वाटर पंपिंग पर विश्व बैंक के आकलन दिखाते हैं कि सब्सिडी और बिजली खरीद तंत्र साथ होने पर लागत वसूली का समय काफ़ी घट जाता है। कई किसानों के लिए सौर ऊर्जा केवल खर्च बचाने का साधन नहीं, बल्कि अतिरिक्त आय का स्रोत बन जाती है।
भूजल: जोखिम और जिम्मेदारी
सोलर पंप शक्तिशाली साधन हैं, लेकिन भूजल को नजरअंदाज किया गया तो ये जोखिम भरे भी हो सकते हैं। ग्रिड बिजली की तरह सौर ऊर्जा “बंद” नहीं होती, जिससे अत्यधिक पंपिंग को बढ़ावा मिल सकता है। पानी की कमी वाले इलाकों में यह भूजल संकट को और गहरा कर सकता है।
इसीलिए एमएनआरई और नीति आयोग के विशेषज्ञ सोलर पंपों को इनसे जोड़ने पर जोर देते हैं:
• गांव स्तर पर जल बजट।
• स्थानीय जल उपलब्धता के अनुसार फसल चयन।
• तय सिंचाई घंटे।
• पानी पंप करने की बजाय अतिरिक्त बिजली बेचने के प्रोत्साहन।
जो किसान सौर ऊर्जा को इस्तेमाल की वस्तु नहीं, बल्कि प्रबंधन की संसाधन मानते हैं, उन्हें लंबे समय की सुरक्षा मिलती है।
सामूहिक मॉडल: एफपीओ और सोलर सिंचाई
सोलर सिंचाई तब सबसे अच्छा काम करती है जब किसान मिलकर आगे बढ़ते हैं। नाबार्ड समर्थित एफपीओ और सहकारी संस्थाएं साझा सोलर पंप प्रणालियों का प्रबंधन तेजी से कर रही हैं। इससे व्यक्तिगत निवेश घटता है, उपयोग बेहतर होता है और रखरखाव सुनिश्चित होता है।
सामूहिक मॉडलों में:
• पंप ज्यादा कुशलता से चलते हैं।
• पानी का उपयोग मिलकर तय होता है।
• बिजली बिक्री संभव हो पाती है।
• मरम्मत और सेवा लागत घटती है।
छोटे किसानों के लिए सोलर आधारित एफपीओ से जुड़ना अक्सर व्यक्तिगत सिस्टम रखने से ज्यादा सुरक्षित होता है।
रखरखाव और दीर्घकालीन देखभाल
सोलर पंपों को डीज़ल इंजन से कम रखरखाव चाहिए, लेकिन ये “लगाओ और भूल जाओ” वाली प्रणाली नहीं हैं। किसानों को पैनल की सफाई, वायरिंग की जांच और चोरी या नुकसान से सुरक्षा करनी होती है। बुनियादी रखरखाव का प्रशिक्षण बहुत जरूरी है। कई राज्य अब पीएम-कुसुम के तहत रखरखाव सहायता और सेवा अनुबंध भी शामिल कर रहे हैं। किसानों को हमेशा यह जांचना चाहिए:
• पैनल और मोटर की वारंटी।
• स्थानीय सेवा केंद्र की उपलब्धता।
• बीमा विकल्प।
अच्छी तरह रखरखाव किया गया सोलर पंप 15–20 साल तक कुशलता से चल सकता है।
सिंचाई से आगे: सौर ऊर्जा के अन्य उपयोग
एक बार सौर ढांचा तैयार हो जाए, तो किसान इसे सिंचाई से आगे भी इस्तेमाल कर सकते हैं। सौर ऊर्जा से संभव हैं:
• शेड और घरों की रोशनी।
• दूध ठंडा करने की इकाइयां।
• अनाज सुखाना।
• छोटे कोल्ड स्टोरेज।
• बाड़ और सुरक्षा प्रणाली।
यह विविधता खेती को ज्यादा मजबूत बनाती है और नई आय के अवसर पैदा करती है।
सोलर पंप अपनाने से पहले किसान क्या पूछें?
पीएम-कुसुम या अन्य योजनाओं में आवेदन से पहले किसानों को पूछना चाहिए:
• मेरे जल स्रोत की गहराई कितनी है।
• मुझे वास्तव में किस आकार का पंप चाहिए।
• क्या सोलर को ड्रिप सिंचाई से जोड़ा जा सकता है।
• क्या ग्रिड कनेक्शन या बिजली बिक्री संभव है?
• क्या मुझे व्यक्तिगत या एफपीओ के जरिए आवेदन करना चाहिए।
ये सवाल पूछने से जरूरत से बड़े सिस्टम और भविष्य की समस्याओं से बचा जा सकता है।
ऊर्जा: खेती की नई संपत्ति
सौर ऊर्जा बिजली को समस्या से संपत्ति में बदल देती है। बिजली का इंतजार करने या ईंधन खरीदने की बजाय किसान नियंत्रण पाते हैं। ग्रिड से जुड़े मॉडलों में बिजली खुद एक फसल बन जाती है जिसे पानी, खाद या मजदूरी नहीं चाहिए।
यह बदलाव खेती के आर्थिक मूल्यांकन को भी बदलता है। कृषि ऊर्जा उपभोक्ता से ऊर्जा योगदानकर्ता बनती है।
किसानों के सामने अब भी चुनौतियां
प्रगति के बावजूद सोलर अपनाने में चुनौतियां हैं। सब्सिडी के बाद भी शुरुआती लागत छोटे किसानों के लिए अधिक हो सकती है। आवेदन प्रक्रिया, रखरखाव जरूरत और ग्रिड एकीकरण को लेकर जागरूकता भी समान नहीं है।
यदि सोलर पंप बिना उचित नियमों के लगाए गए तो भूजल के दुरुपयोग की आशंका भी है। एमएनआरई और नीति आयोग के विशेषज्ञ कहते हैं कि सौर सिंचाई को माइक्रो-सिंचाई, फसल योजना और स्थानीय भूजल निगरानी के साथ जोड़ना जरूरी है।
स्मार्ट और टिकाऊ खेती की ओर रास्ता
डीज़ल और अनियमित ग्रिड से सौर और स्मार्ट ऊर्जा प्रणालियों की ओर भारत का कदम केवल तकनीक बदलाव नहीं है। यह बिजली, पानी और खेती के रिश्ते का पुनर्गठन है। स्वच्छ ऊर्जा लागत घटाती है, मजबूती बढ़ाती है और खेती को जलवायु लक्ष्यों से जोड़ती है।
भविष्य एकीकृत प्रणालियों में है सोलर पंप जो स्मार्ट ग्रिड से जुड़े हों, ड्रिप सिंचाई के साथ काम करें, डिजिटल निगरानी और किसान समूहों द्वारा साझा ढांचे का प्रबंधन हो। जब ऊर्जा स्वच्छ, भरोसेमंद और किसान के नियंत्रण में होती है, तो खेती ज्यादा टिकाऊ और लाभकारी बनती है।
खेतों में धीरे-धीरे गूंजते सोलर पंपों से लेकर बिजली और पानी का संतुलन बनाने वाले स्मार्ट ग्रिड तक, भारत की खेती एक नए ऊर्जा युग में प्रवेश कर रही है। यदि इसे समझदारी से संभाला जाए, तो यह बदलाव ऊर्जा को बाधा नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि की नींव बना सकता है।
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