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हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के जुब्बल क्षेत्र के बर्थाटा गांव के किसान गोवर्धन क्लांटा की कहानी उन युवाओं के लिए खास है जो खेती को छोड़कर शहर या विदेश में करियर बनाने का सोचते हैं। गोवर्धन भी कभी होटल मैनेजमेंट के बाद विदेश जाने की तैयारी में थे, लेकिन उन्होंने अचानक फैसला बदला और अपने पुश्तैनी काम बागवानी को आगे बढ़ाने के लिए गांव लौट आए। यही फैसला आगे चलकर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़ बन गया।
रासायनिक खेती से बढ़ती लागत और घटता भरोसा
शुरुआत में गोवर्धन अपने बागान में सामान्य तरीके से खेती करते थे। जैसे बाकी किसान करते हैं, वैसे ही वे भी बाजार से रासायनिक खाद और दवाइयां खरीदकर इस्तेमाल करते थे। लेकिन समय के साथ उन्हें महसूस हुआ कि लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन में वैसी बढ़ोतरी नहीं हो रही।
उनका मुख्य ध्यान सेब की खेती पर था, पर मिट्टी की सेहत कमजोर होने लगी थी और खेती पहले जितनी भरोसेमंद नहीं रही। यह स्थिति उन्हें परेशान करने लगी। उन्हें लगा कि अगर इसी तरह खेती करते रहे तो भविष्य में नुक़सान और बढ़ सकता है।
समाधान की तलाश में पहुंचे कृषि विभाग
इसी चिंता के बीच उन्होंने स्थानीय कृषि विभाग के अधिकारियों से संपर्क किया। वहां उन्हें प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी मिली और “प्राकृतिक खेती खुशहाल योजना” के तहत प्रशिक्षण लेने की सलाह दी गई। साल 2019 में उन्होंने सोलन जिले के नौणी स्थित प्रशिक्षण केंद्र में 6 दिन का प्रशिक्षण लिया। यहीं से उनकी खेती की दिशा पूरी तरह बदल गई।
गोवर्धन बताते हैं कि उन्होंने पहले रासायनिक और जैविक दोनों तरह की खेती की थी, लेकिन प्राकृतिक खेती के परिणाम उन्हें सबसे बेहतर लगे।
बिना देसी गाय के भी शुरू किया प्रयोग
गोवर्धन के पास अपनी देसी गाय नहीं थी, इसलिए उन्होंने पड़ोस से गोबर और गौमूत्र लेकर प्राकृतिक घोल तैयार किए। उन्होंने शुरुआत में कुछ सेब के पौधों पर प्रयोग किया ताकि परिणाम समझ सकें।
जब उन्होंने देखा कि पौधों की बढ़वार बेहतर हो रही है और मिट्टी पहले से ज्यादा जीवंत लग रही है, तो उनका आत्मविश्वास बढ़ गया। यहीं से उन्होंने धीरे-धीरे अपने खेत में प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ाना शुरू किया।
सेब के साथ मिश्रित फ़सलें, मिट्टी को मिला नया जीवन
गोवर्धन ने केवल सेब की खेती तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बागान में मटर और सेम जैसी फ़सलें लगाईं। इससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ी और जमीन की उर्वरता सुधरी।
उन्होंने महसूस किया कि जब खेत में विविधता होती है, तो मिट्टी खुद मज़बूत बनने लगती है और बाहरी खाद की जरूरत कम हो जाती है।
यह बदलाव प्राकृतिक खेती का एक अहम हिस्सा है, जहां खेत को एक जीवित प्रणाली की तरह देखा जाता है।
12.5 बीघा में से 5.2 बीघा पर प्राकृतिक मॉडल
आज गोवर्धन क्लांटा 12.5 बीघा जमीन में खेती करते हैं, जिसमें से 5.2 बीघा क्षेत्र पूरी तरह प्राकृतिक खेती के तहत है। उनका कहना है कि आने वाले समय में वे पूरे खेत को इसी पद्धति में बदलना चाहते हैं।
उनके बागान में रॉयल, गोल्डन, रेड गोल्डन और काइंड रूट जैसी सेब की क़िस्में हैं। इसके अलावा नाशपाती, प्लम, मक्का, राजमा, फूलगोभी, शिमला मिर्च और अन्य सब्ज़ियां भी उगाई जाती हैं। इस तरह सेब की खेती के साथ बहुफ़सली मॉडल अपनाकर उन्होंने आय के कई रास्ते बनाए हैं।
बीमारी से बचा बागान, बढ़ा भरोसा
एक समय क्षेत्र में सेब स्कैब बीमारी का असर कई बागानों में देखा गया। जिन किसानों ने रासायनिक या पारंपरिक तरीके अपनाए थे, उनके बागानों को नुक़सान हुआ। लेकिन गोवर्धन का कहना है कि उनके प्राकृतिक खेती वाले बागान में इस बीमारी का असर नहीं के बराबर रहा।
इस अनुभव ने उन्हें और मज़बूत विश्वास दिया कि सेब की खेती को टिकाऊ बनाना है तो प्रकृति आधारित तरीके अपनाने होंगे।
हाई डेंसिटी बागान में भी अपनाया प्राकृतिक तरीका
गोवर्धन ने अपने बागान में लगभग 300 पौधों का हाई डेंसिटी सेब बागान भी लगाया है। इसमें भी वे प्राकृतिक खेती के इनपुट्स का ही उपयोग कर रहे हैं और कृषि विभाग तथा एटीएमए परियोजना के मार्गदर्शन में काम कर रहे हैं।
यह प्रयोग दिखाता है कि आधुनिक बागवानी मॉडल के साथ भी प्राकृतिक खेती को सफलतापूर्वक जोड़ा जा सकता है।
किसान से किसान तक पहुंचा संदेश
गोवर्धन अब केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं। वे आसपास के किसानों को भी इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका मानना है कि किसानों को कम से कम एक हिस्से में प्रयोग के तौर पर प्राकृतिक खेती जरूर शुरू करनी चाहिए। जब किसान खुद परिणाम देखेंगे, तो धीरे-धीरे रासायनिक खेती से दूरी बना लेंगे।
नई पीढ़ी के लिए खेती का बदला नज़रिया
गोवर्धन की यात्रा यह साबित करती है कि खेती केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक आधुनिक और टिकाऊ व्यवसाय भी बन सकती है। उन्होंने दिखाया कि अगर सही तरीके अपनाए जाएं, तो सेब की खेती में लागत घटाकर अच्छा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है और मिट्टी को भी बचाया जा सकता है।
आज उनका बागान केवल उत्पादन का स्थान नहीं, बल्कि सीखने का एक मॉडल बन चुका है। गांव लौटकर शुरू की गई यह पहल अब कई किसानों को नई दिशा दे रही है, जहां प्राकृतिक खेती सिर्फ़ एक विकल्प नहीं बल्कि भविष्य की जरूरत बनती जा रही है।
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