Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर सेब की खेती में लागत घटा रहे हैं सुरेंद्र पीरता

प्राकृतिक खेती (Natural Farming) अपनाकर सुरेंद्र पीरता ने सेब की खेती में ख़र्च घटाया, गुणवत्ता सुधारी और रसायन मुक्त फल उत्पादन की दिशा पकड़ी।

प्राकृतिक खेती Natural Farming

हिमाचल प्रदेश के शिमला ज़िले के जुब्बल क्षेत्र के चामसु गांव में रहने वाले सुरेंद्र पीरता लंबे समय से सेब की खेती कर रहे हैं। वे छोटे किसान नहीं, बल्कि बड़े बागवान हैं, जिनके बाग का दायरा सैकड़ों बीघा में फैला है। कई सालों तक उन्होंने रासायनिक तरीकों से खेती की, लेकिन धीरे-धीरे एक बात साफ़ होने लगी—ख़र्च हर साल बढ़ रहा था, जबकि उत्पादन और फलों की गुणवत्ता वहीं की वहीं थी।

रसायनिक स्प्रे, खाद और कीटनाशकों पर बढ़ता ख़र्च उनकी कमाई को लगातार दबाव में डाल रहा था। साथ ही, उन्हें यह भी महसूस होने लगा कि ज़्यादा केमिकल इस्तेमाल से फल सेहत के लिहाज से भी ठीक नहीं रह जाते। यहीं से उनके मन में किसी वैकल्पिक रास्ते की तलाश शुरू हुई।

प्राकृतिक खेती का चुना रास्ता 

करीब 2018 के आसपास सुरेंद्र पीरता ने प्राकृतिक खेती(Natural Farming) के बारे में पहली बार गंभीरता से सुना। एक वीडियो इंटरव्यू के ज़रिये उन्हें इस खेती पद्धति की जानकारी मिली, जिसने उनकी जिज्ञासा बढ़ा दी। उन्होंने इसके बाद इस विषय पर पढ़ना शुरू किया और कृषि विभाग के अधिकारियों से भी बातचीत की।

लगभग 7–8 सालों से वे अलग-अलग खेती तरीकों को देख-परख रहे थे, लेकिन प्राकृतिक खेती (Natural Farming) उन्हें इसलिए अलग लगी क्योंकि इसमें लागत कम करने और मिट्टी की सेहत सुधारने की साफ़ बात थी।

प्रशिक्षण से बढ़ा भरोसा

सुरेंद्र पीरता को कुफरी में सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती (Natural Farming) (SPNF) पर आधारित 6 दिन के प्रशिक्षण शिविर में जाने का मौक़ा मिला। इस प्रशिक्षण ने उनके कई संदेह दूर कर दिए।

वे बताते हैं कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें यह समझ आया कि अगर स्थानीय संसाधनों का सही इस्तेमाल किया जाए, तो रसायनों पर निर्भरता ख़त्म की जा सकती है। यही वह मोड़ था, जहां उन्होंने अपने बड़े बाग में प्राकृतिक खेती (Natural Farming) अपनाने का फ़ैसला कर लिया—वह भी बिना किसी हिचक के।

Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर सेब की खेती में लागत घटा रहे हैं सुरेंद्र पीरता

55 बीघा में प्राकृतिक खेती का बड़ा प्रयोग

अक्सर यह माना जाता है कि प्राकृतिक खेती (Natural Farming) छोटे किसानों के लिए ज़्यादा आसान होती है, लेकिन सुरेंद्र पीरता ने इस सोच को बदल दिया। उन्होंने अपने लगभग 55 बीघा सेब के बाग में प्राकृतिक तरीके अपनाए। यह कदम इसलिए भी अहम था क्योंकि इतने बड़े क्षेत्र में बदलाव करना आसान नहीं होता।

आज वे शिमला ज़िले के उन गिने-चुने बागवानों में हैं, जिन्होंने इतनी बड़ी ज़मीन पर प्राकृतिक खेती (Natural Farming) को अपनाया है।

ख़र्च में भारी गिरावट, संतोष में बढ़ोतरी

रासायनिक खेती के दौर में सुरेंद्र पीरता को हर साल करीब 3–4 लाख रुपये सिर्फ़ खाद और कीटनाशकों पर ख़र्च करने पड़ते थे। लेकिन प्राकृतिक खेती (Natural Farming) अपनाने के बाद यह ख़र्च घटकर करीब 50 हज़ार रुपये रह गया।

वे कहते हैं कि यह बदलाव सिर्फ़ पैसों का नहीं है। सबसे बड़ी संतुष्टि यह है कि अब वे ज़हर नहीं, बल्कि प्राकृतिक फल उगा रहे हैं। यही वजह है कि उन्हें अपने काम से अब ज़्यादा संतोष मिलता है।

सेब की खेती में उत्पादन और गुणवत्ता

सुरेंद्र पीरता का बाग हर साल 3000 से ज़्यादा सेब की पेटियां (20 किलो प्रति पेटी) देता है। उनके बाग में सेब की कई क़िस्में हैं—डार्क बैरन गाला, एडीएम, किंग रोट, गोल्ड चीफ, रेड वेलॉक्स जैसी क़िस्में शामिल हैं।

उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती (Natural Farming) अपनाने के बाद सेब की गुणवत्ता में साफ़ फर्क दिखने लगा है। फल ज़्यादा मज़बूत होते हैं और उनकी मांग बाज़ार में अच्छी रहती है।

बीमारियों पर बेहतर नियंत्रण

पहले रासायनिक खेती के समय कई तरह की बीमारियां बड़ी चुनौती बन जाती थीं। बार-बार स्प्रे करने के बावजूद समस्या पूरी तरह ख़त्म नहीं होती थी।

लेकिन प्राकृतिक खेती (Natural Farming) अपनाने के बाद स्थिति काफी बदली है। कृषि विभाग के ब्लॉक टेक्नोलॉजी मैनेजर और प्लांट प्रोटेक्शन से जुड़े अधिकारियों के सहयोग से बीमारियों पर बेहतर नियंत्रण हो पाया है।

सुरेंद्र पीरता बताते हैं कि अब बाग में रोगों का दबाव कम है और पौधे ज़्यादा संतुलित तरीके से बढ़ रहे हैं।

सेब की खेती के साथ दूसरी फ़सलें 

उनके बाग में सिर्फ़ सेब की खेती ही नहीं होती। साथ ही नाशपाती की कुछ क़िस्में और मक्का, मटर, सेम, कोदा, चौलाई जैसी फ़सलें भी उगाई जाती हैं। इससे जोखिम बंटता है और खेत की उपयोगिता बढ़ती है। प्राकृतिक खेती (Natural Farming) में फ़सल विविधता उनके लिए एक मज़बूत सहारा साबित हुई है।

Natural Farming: प्राकृतिक खेती अपनाकर सेब की खेती में लागत घटा रहे हैं सुरेंद्र पीरता

बाज़ार में बढ़ती मांग और नई पहल

सुरेंद्र पीरता बताते हैं कि आज बाज़ार में प्राकृतिक सेब की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्राहक अब यह जानना चाहते हैं कि फल किस तरीके से उगाया गया है। इसी बढ़ती मांग को देखते हुए वे बागवानों की एक कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि बाज़ार से सीधा जुड़ाव हो और किसानों को बेहतर दाम मिल सके।

किसानों के लिए उनका संदेश

सुरेंद्र पीरता की कहानी यह दिखाती है कि प्राकृतिक खेती (Natural Farming) सिर्फ़ छोटे किसानों तक सीमित नहीं है। अगर बड़े बागवान सही समझ और धैर्य के साथ इसे अपनाएं, तो यह सेब की खेती को ज़्यादा टिकाऊ और लाभकारी बना सकती है।

वे कहते हैं,

“अब मेरी सबसे बड़ी खुशी यह है कि मैं ज़हर नहीं बना रहा। मैं ऐसा फल उगा रहा हूं, जिसे खुद भी खा सकता हूं और दूसरों को भी भरोसे के साथ दे सकता हूं।”

एक नई सोच की ओर बढ़ता बागवानी मॉडल

करीब 85 बीघा कुल ज़मीन, जिसमें से 55 बीघा में प्राकृतिक खेती (Natural Farming), 1467 मीटर की ऊंचाई पर फैला बाग—सुरेंद्र पीरता का यह मॉडल आने वाले समय के लिए एक साफ़ संदेश देता है।

कम लागत, बेहतर सेहत वाले फल और मिट्टी के साथ संतुलन—यही वह रास्ता है, जिसे अपनाकर सेब की खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाया जा सकता है। सुरेंद्र पीरता की कहानी बताती है कि जब किसान आगे बढ़कर बदलाव अपनाते हैं, तो रास्ता सिर्फ़ उनके लिए नहीं, बल्कि पूरे इलाके के लिए आसान हो जाता है।

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