कर्नाटक के प्रशांत सोमन्ना भसागी ने सूअर पालन के ज़रिये पिता की विरासत को आगे बढ़ाया

प्रशांत सोमन्ना भसागी सूअर पालन के जरिए पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं और कम लागत में टिकाऊ खेती का उदाहरण पेश कर रहे हैं।

सूअर पालन Pig farming

कर्नाटक के बीजापुर ज़िले के अलमेल गांव में आज प्रशांत सोमन्ना भसागी का नाम तेजी से पहचाना जा रहा है। ये पहचान उन्हें विरासत में मिली जरूर है, लेकिन उसे आगे बढ़ाने का श्रेय उनकी अपनी मेहनत, समझ और फैसलों को जाता है। उनके पिता स्वर्गीय सोमन्ना सिद्दप्पा भसागी ने जिस सूअर पालन की नींव रखी थी, आज प्रशांत उसी काम को नई सोच और ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। प्रशांत मानते हैं कि उनके पिता ने सिर्फ़ एक व्यवसाय नहीं छोड़ा, बल्कि एक रास्ता दिखाया—कि सीमित संसाधनों में भी अगर सही दिशा मिल जाए, तो किसान आत्मनिर्भर बन सकता है।

खेती से सीख लेकर सूअर पालन को समझा

पिता के जीवन से प्रशांत ने देखा कि केवल पारंपरिक खेती पर निर्भर रहना हमेशा सुरक्षित नहीं होता। फ़सलों के दाम, मौसम और लागत—सब कुछ किसान के हाथ में नहीं होता। इसी अनुभव ने परिवार को सूअर पालन की ओर मोड़ा था। आज प्रशांत बताते हैं कि वे बचपन से ही खेत और पशुपालन दोनों को साथ चलते देखते आए हैं। यही कारण है कि उनके लिए सूअर पालन कोई नया काम नहीं, बल्कि सीखा हुआ हुनर है, जिसे अब वे और बेहतर तरीके से कर रहे हैं।

प्रशिक्षण और तकनीक पर भरोसा

प्रशांत ने अपने पिता के अनुभव को आधार बनाया, लेकिन साथ ही आधुनिक जानकारी को भी महत्व दिया। वे मानते हैं कि आज के समय में सूअर पालन तभी सफल हो सकता है, जब उसमें साफ़-सफाई, सही आहार और बेसिक टेक्निकल समझ हो। वे शेड की स्वच्छता, पानी की उपलब्धता और समय-समय पर देखभाल पर खास ध्यान देते हैं। बीमारी से बचाव के लिए साफ़ वातावरण और नियमित निगरानी उनकी प्राथमिकता है।

कर्नाटक के प्रशांत सोमन्ना भसागी ने सूअर पालन के ज़रिये पिता की विरासत को आगे बढ़ाया

कम लागत में बेहतर प्रबंधन

प्रशांत ने अपने पिता की तरह बाहर से महंगा चारा खरीदने के बजाय घर पर ही संतुलित फीड तैयार करने की परंपरा को जारी रखा। इसमें मकई, चावल, गेहूं, मूंगफली और मिनरल मिक्स का सही अनुपात रखा जाता है। इस तरीके से सूअर पालन में ख़र्च कम होता है और जानवरों की ग्रोथ भी अच्छी रहती है। प्रशांत का मानना है कि अगर किसान खुद अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करे, तो मुनाफ़ा अपने आप बढ़ता है।

खेती और सूअर पालन का संतुलन

प्रशांत सोमन्ना भसागी सिर्फ़ सूअर पालन तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने खेती और पशुपालन को जोड़कर चलने का मॉडल अपनाया है। शेड से निकलने वाले जैविक अपशिष्ट को खेतों में खाद के रूप में उपयोग किया जाता है, जिससे रासायनिक खाद की जरूरत काफी कम हो जाती है। इस तरीके से मिट्टी की सेहत भी बनी रहती है और खेती की लागत भी घटती है। प्रशांत कहते हैं कि यही संतुलन सूअर पालन को लंबे समय तक टिकाऊ बनाता है।

बाज़ार से सीधा जुड़ाव

पिता की तरह ही प्रशांत ने भी बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे बाज़ार से जुड़ने पर ज़ोर दिया। इससे उन्हें सही दाम मिलता है और भुगतान में देरी नहीं होती। वे बताते हैं कि भरोसे और गुणवत्ता की वजह से आज उनके ग्राहक खुद संपर्क करते हैं। यही वजह है कि सूअर पालन अब सिर्फ़ गांव तक सीमित नहीं, बल्कि आसपास के इलाकों तक पहचान बना चुका है।

पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी

पिता के निधन के बाद यह ज़िम्मेदारी पूरी तरह प्रशांत के कंधों पर आ गई। उनके लिए यह भावनात्मक भी था और चुनौतीपूर्ण भी। लेकिन उन्होंने इसे बोझ नहीं, बल्कि अवसर की तरह लिया।

प्रशांत कहते हैं,

“पिताजी ने जो शुरू किया, उसे रोकना हमारे लिए विकल्प नहीं था। सूअर पालन हमारे लिए सिर्फ़ कमाई का ज़रिया नहीं, बल्कि उनकी याद और मेहनत से जुड़ा काम है।”

युवाओं के लिए प्रेरणा

आज प्रशांत अपने गांव के युवाओं से खुलकर बात करते हैं। वे बताते हैं कि खेती के साथ अगर सूअर पालन या कोई दूसरा पशुपालन जोड़ा जाए, तो आय के कई रास्ते खुलते हैं। उनका मानना है कि गांव के युवाओं को शहर जाने से पहले अपने गांव में मौजूद संभावनाओं को देखना चाहिए। सही जानकारी और मेहनत से गांव में ही सम्मानजनक जीवन संभव है।

कर्नाटक के प्रशांत सोमन्ना भसागी ने सूअर पालन के ज़रिये पिता की विरासत को आगे बढ़ाया

आगे की योजना और सोच

प्रशांत का लक्ष्य है कि वे आने वाले समय में सूअर पालन को और व्यवस्थित रूप दें। वे शेड की क्षमता बढ़ाने, बेहतर नस्ल और मार्केटिंग पर काम करना चाहते हैं। साथ ही बागवानी फ़सलों का दायरा भी बढ़ाने की योजना है। उनकी सोच साफ़ है, जो काम पिता ने शुरू किया, उसे समय के साथ आगे बढ़ाना और आने वाली पीढ़ी के लिए मज़बूत आधार बनाना।

निष्कर्ष

प्रशांत सोमन्ना भसागी की कहानी ये दिखाती है कि विरासत सिर्फ़ नाम की नहीं होती, बल्कि ज़िम्मेदारी की भी होती है। उन्होंने अपने पिता की सीख को अपनाकर सूअर पालन को नए दौर में आगे बढ़ाया है। ये कहानी हर उस किसान और युवा के लिए प्रेरणा है, जो यह सोचता है कि छोटे स्तर से शुरू करके कुछ बड़ा नहीं किया जा सकता। सही सोच, अनुशासन और मेहनत के साथ सूअर पालन न सिर्फ़ आमदनी बढ़ा सकता है, बल्कि गांव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी मज़बूत कदम साबित हो सकता है।

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