भूपेंद्र यादव ने अलवर में राष्ट्रीय वर्कशॉप का किया उद्घाटन, बाघ संरक्षण को बताया जैव विविधता बचाने का मज़बूत आधार

भूपेंद्र यादव ने अलवर में बाघ संरक्षण पर राष्ट्रीय वर्कशॉप का उद्घाटन किया और प्रोजेक्ट चीता सहित तीन अहम प्रकाशन जारी किए।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के अलवर में “Tiger Re-introduction: Opportunities & Challenges” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय वर्कशॉप का उद्घाटन किया। इस अवसर पर भूपेंद्र यादव ने बाघ संरक्षण और प्रोजेक्ट चीता से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों का भी विमोचन किया। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), पर्यावरण मंत्रालय और राजस्थान सरकार के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस वर्कशॉप में देशभर के टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर, मुख्य वन्यजीव संरक्षक और वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल हुए।

इस वर्कशॉप का उद्देश्य वैज्ञानिक आधार पर बाघों के पुनर्स्थापन और उनके सक्रिय प्रबंधन को लेकर रणनीति तैयार करना था।

सरिस्का बना दुनिया के लिए प्रेरणा

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का टाइगर रिजर्व में बाघों का पुनर्स्थापन वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि यह दुनिया का पहला सफल वैज्ञानिक प्रयास है, जहां किसी ऐसे क्षेत्र में बाघों को फिर से बसाया गया, जहां वे पूरी तरह समाप्त हो चुके थे।

भूपेंद्र यादव ने कहा कि वर्ष 2005 में स्थानीय स्तर पर बाघों के खत्म होने के बाद सरिस्का में शुरू किया गया यह अभियान आज पूरी दुनिया के लिए एक उदाहरण बन चुका है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में सरिस्का में 56 बाघ मौजूद हैं, जो वैज्ञानिक प्रबंधन, निरंतर संरक्षण प्रयासों और स्थानीय समुदायों के सहयोग का परिणाम है।

भूपेंद्र यादव ने अलवर में राष्ट्रीय वर्कशॉप का किया उद्घाटन, बाघ संरक्षण को बताया जैव विविधता बचाने का मज़बूत आधार

बाघ संरक्षण से सुरक्षित रहेंगे जंगल और जैव विविधता

भूपेंद्र यादव ने कहा कि बाघों का संरक्षण केवल एक वन्यजीव की रक्षा तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से जंगल, जल स्रोत और समृद्ध जैव विविधता भी सुरक्षित रहती है। उन्होंने कहा कि बाघ किसी भी वन पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनके संरक्षण से पूरे पर्यावरण को लाभ मिलता है।

उन्होंने कहा कि भारत में पिछले दस वर्षों के दौरान टाइगर रिजर्व की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है। साथ ही भारत ने वर्ष 2022 तक जंगली बाघों की संख्या दोगुनी करने का सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा का लक्ष्य भी सफलतापूर्वक हासिल किया है।

स्थानीय समुदायों की भागीदारी सबसे ज़रूरी

भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरिस्का और पन्ना में बाघों की सफल वापसी स्थानीय लोगों के सहयोग के बिना संभव नहीं थी। उन्होंने बताया कि ओडिशा के सतकोसिया टाइगर रिजर्व में इसी प्रकार की सफलता नहीं मिल सकी क्योंकि वहां स्थानीय समुदायों का अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रोजेक्ट चीता की सफलता में भी स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसलिए वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के हितों और उनके विकास पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है।

वैज्ञानिक प्रबंधन पर रहेगा विशेष ज़ोर

वर्कशॉप में भूपेंद्र यादव ने कहा कि जिन क्षेत्रों में बाघ और हाथियों का आवास एक-दूसरे से जुड़ता है, वहां वन क्षेत्रों की आपसी कनेक्टिविटी बनाए रखना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि संभावित स्रोत और गंतव्य क्षेत्रों की पहचान कर वैज्ञानिक आधार पर बाघों के पुनर्स्थापन की योजना बनाई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि वर्कशॉप में उन सभी कारणों का विश्लेषण किया जाना चाहिए, जिनकी वजह से सरिस्का और पन्ना जैसे क्षेत्रों में बाघों के पुनर्स्थापन कार्यक्रम सफल रहे। इससे भविष्य की संरक्षण योजनाओं को और प्रभावी बनाया जा सकेगा।

तीन महत्वपूर्ण प्रकाशनों का हुआ विमोचन

इस अवसर पर भूपेंद्र यादव ने तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज जारी किए। इनमें “Road Map on Active Management of Tigers in India”, “Booklet on Reintroduction and Recovery of Tigers in India” और “Annual Report of Project Cheetah” शामिल हैं।

इन प्रकाशनों में बाघों के सक्रिय प्रबंधन, पुनर्स्थापन कार्यक्रमों के अनुभव, सरिस्का और पन्ना टाइगर रिजर्व से मिले सबक तथा प्रोजेक्ट चीता की प्रगति का विस्तृत विवरण दिया गया है। साथ ही भविष्य की प्राथमिकताओं और संरक्षण रणनीतियों को भी शामिल किया गया है।

भूपेंद्र यादव ने अलवर में राष्ट्रीय वर्कशॉप का किया उद्घाटन, बाघ संरक्षण को बताया जैव विविधता बचाने का मज़बूत आधार

तकनीकी सत्रों में हुई विस्तृत चर्चा

वर्कशॉप के दौरान कई तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। इनमें आवास सुधार, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना, वन्यजीवों का स्थानांतरण, लैंडस्केप कनेक्टिविटी, निगरानी प्रणाली और सक्रिय प्रबंधन रणनीतियों जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए।

इसके अलावा प्रोजेक्ट चीता पर विशेष सत्र भी आयोजित किया गया। साथ ही गौर और बारहसिंगा जैसी प्रजातियों के स्थानांतरण के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत बनाने और बाघों की संख्या बढ़ाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई।

आगे की रणनीति को मिलेगी नई दिशा

भूपेंद्र यादव ने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल बाघों का संरक्षण करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई भी वन्यजीव प्रजाति विलुप्त न हो। उन्होंने कहा कि संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीय संवेदनाओं के साथ लगातार प्रयास किए जाने चाहिए।

उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय वर्कशॉप से निकलने वाले सुझाव भविष्य में बाघों की कम संख्या वाले क्षेत्रों के लिए नई संरक्षण रणनीति तैयार करने में मदद करेंगे। साथ ही राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, राज्य वन विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय भी स्थापित होगा। भूपेंद्र यादव ने विश्वास जताया कि वैज्ञानिक योजना, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और मज़बूत संरक्षण प्रयासों के माध्यम से भारत वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर अपनी अग्रणी भूमिका को और मज़बूत करेगा।

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