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भारत के बड़े कृषि मेलों और किसान आयोजनों में अब ड्रोन केवल देखने की चीज नहीं रहे। अब वे भविष्य की खेती की चर्चा के बीच में आ रहे हैं। पुसा कृषि विज्ञान मेला 2026 में ICAR-IARI ने डिजिटल खेती, रोबोटिक्स, AI से जुड़ी खेती के औजार और प्रिसिजन तकनीकों को “विकसित कृषि – आत्मनिर्भर भारत” के बड़े लक्ष्य के हिस्से के रूप में पेश किया।लेकिन किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि ड्रोन कितने आधुनिक दिखते हैं। असली सवाल कहीं ज्यादा सीधा है:
क्या ड्रोन सच में पैसा बचाएंगे, बर्बादी घटाएंगे और फसल की सेहत सुधारेंगे?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की खेती की चुनौती अब केवल पैदावार बढ़ाने की नहीं है। अब बात यह भी है कि खाद, खरपतवारनाशी, कीटनाशक, मजदूरी, डीज़ल और पानी जैसे इनपुट का उपयोग कितनी समझदारी से किया जाए। पूरे खेत में एक जैसा छिड़काव करना आसान लगता है, लेकिन इससे कई बार दवा की बर्बादी होती है, समस्या वाले हिस्से छूट जाते हैं, दवा उड़कर दूसरी जगह पहुंचती है, अवशेष बढ़ते हैं और बेकार खर्च बढ़ता है। भारत में हाल के शोध और खेत पर किए गए प्रदर्शन दिखाते हैं कि ड्रोन से छिड़काव करने पर स्प्रे की मात्रा काफी कम हो सकती है और दवा सही जगह पर पहुंच सकती है। साथ ही, प्रिसिजन खेती की बड़ी प्रणालियाँ ड्रोन इमेजिंग के ज़रिए इंसानी आंख से साफ़ दिखने से पहले ही फसल के तनाव की पहचान कर सकती हैं।
यहीं से प्रिसिजन पोषण और प्रिसिजन स्प्रेइंग की शुरुआत होती है। पूरे खेत को एक जैसा मानकर चलने की बजाय, ड्रोन किसानों और सेवा देने वालों को यह समझने में मदद करते हैं कि फसल कहां तनाव में है और इनपुट केवल वहीं लगाया जाए जहां उसकी जरूरत है।
प्रिसिजन खेती एक सरल सच्चाई से शुरू होती है: हर पौधे को एक जैसी चीज़ नहीं चाहिए
भारत के अधिकतर खेत एक जैसे नहीं होते। एक ही एकड़ में कुछ हिस्से ज्यादा उपजाऊ होते हैं, कुछ में नमी ज्यादा टिकती है, कुछ हिस्से पोषक तत्वों की कमी से जूझते हैं, और कुछ जगहों पर खरपतवार या रोग जल्दी लगते हैं। फिर भी बहुत से किसान पूरे खेत में यूरिया, सूक्ष्म पोषक तत्व, खरपतवारनाशी और कीटनाशक एक ही मात्रा में डालते हैं।
इस असमानता से तीन समस्याएं पैदा होती हैं।
- पहली, स्वस्थ पौधों पर भी दवा या पोषक तत्व चला जाता है, जबकि उन्हें उसकी जरूरत नहीं होती।
- दूसरी, कमजोर हिस्सों को सही इनपुट मिल भी जाए तो वह गलत मात्रा या गलत समय पर मिल सकता है।
- तीसरी, बेकार छिड़काव से खर्च बढ़ता है और पर्यावरण पर बोझ पड़ता है।
प्रिसिजन खेती इस समस्या को इनपुट को जरूरत से जोड़कर हल करने की कोशिश करती है। इस काम में ड्रोन महत्वपूर्ण बन रहे हैं क्योंकि वे दो काम साथ कर सकते हैं: खेत को विस्तार से देखना और इनपुट को ज्यादा नियंत्रण के साथ लगाना। ICAR के हाल के डिजिटल खेती कार्यों में ड्रोन का उपयोग फसल निगरानी, सेहत जांच, छिड़काव, बीज डालने और खेत के अलग-अलग हिस्सों के हिसाब से प्रबंधन के लिए बताया गया है।
खेती में इस्तेमाल होने वाले ड्रोन आखिर करते क्या हैं?
कृषि ड्रोन छोटे बिना पायलट वाले उड़ने वाले यंत्र होते हैं जिनमें टैंक, नोज़ल, GPS आधारित दिशा-निर्देशन और कई बार कैमरा या सेंसर लगे होते हैं। भारतीय खेती में अभी इनका सबसे दिखाई देने वाला उपयोग छिड़काव है। लेकिन ड्रोन की कहानी केवल छिड़काव तक सीमित नहीं है।
ड्रोन का उपयोग इन कामों में हो सकता है:
• खेत की मैपिंग।
• फसल की निगरानी।
• पोषक तत्वों के तनाव की पहचान।
• खरपतवार वाले हिस्सों की पहचान।
• कीटनाशक या तरल खाद का छिड़काव।
• पौधों की गिनती और फसल घनत्व की जांच।
जब किसी ड्रोन में कैमरा सिस्टम होता है, खासकर मल्टीस्पेक्ट्रल सेंसर, तो वह खेत के अलग-अलग हिस्सों में फसल की स्थिति का फर्क पकड़ सकता है। और जब उसी ड्रोन में स्प्रे सिस्टम भी हो, तो वह साधारण एक जैसे छिड़काव की तुलना में दवा या तरल पोषक तत्व को ज्यादा नियंत्रित तरीके से सही हिस्से तक पहुंचा जा सकता है। इसीलिए ड्रोन वाली खेती को अब केवल मशीन से छिड़काव नहीं, बल्कि डेटा आधारित खेती से भी जोड़ा जा रहा है।
2026 की चर्चा: दिखावे से खेत में उपयोग तक
पुसा कृषि विज्ञान मेला 2026 की आधिकारिक सामग्री में मुझे “खरपतवारनाशी की 90% बर्बादी कम” होने का कोई साफ़ प्रमाणित दावा नहीं मिला। लेकिन आधिकारिक जानकारी में डिजिटल खेती, रोबोटिक्स, AI और किसान-केंद्रित तकनीकों पर काफी ज़ोर जरूर दिखा।
भारत के खेत संबंधी शोध से जो बात अच्छी तरह सामने आई, वह इससे जुड़ी हुई है। बेंगलुरु के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में बताया गया कि ड्रोन आधारित एग्रोकेमिकल स्प्रे से स्प्रे के पानी का उपयोग लगभग 90% तक घट गया। पारंपरिक छिड़काव में जहां लगभग 500 लीटर प्रति हेक्टेयर पानी लगता था, वहीं ड्रोन स्प्रे में यह लगभग 55 लीटर प्रति हेक्टेयर तक रहा। साथ ही, रागी और अरहर जैसी फसलों में काम की गति और कार्यकुशलता भी बेहतर हुई।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कम स्प्रे मात्रा का मतलब अक्सर ज्यादा सटीक, ज्यादा नियंत्रित और कम भटकने वाला छिड़काव होता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर खेत में 90% रसायन बच ही जाएगा, लेकिन इससे साफ़ समझ आता है कि ड्रोन क्यों ध्यान खींच रहे हैं: वे पूरे छिड़काव तंत्र में बर्बादी घटा सकते हैं।
मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग क्या है, और किसान को इसकी परवाह क्यों करनी चाहिए?
साधारण कैमरा वही दिखाता है जो हमारी आंख देखती है: लाल, हरा और नीला रंग। लेकिन मल्टीस्पेक्ट्रल कैमरा उससे आगे की रोशनी भी पकड़ता है, जिसमें ऐसी तरंगें शामिल होती हैं जिन्हें पौधे अपनी सेहत के अनुसार अलग-अलग तरह से लौटाते हैं। स्वस्थ पत्तियां, जिनमें क्लोरोफिल अधिक होता है, तनावग्रस्त पत्तियों से अलग तरह से रोशनी पर प्रतिक्रिया करती हैं। पोषक तत्वों की कमी, रोग, पानी की कमी या जड़ों के नुकसान से जूझ रही फसलें कई बार साफ़ लक्षण दिखने से पहले ही अपनी रोशनी परावर्तन की प्रकृति बदलने लगती हैं।
इसका मतलब यह है कि ड्रोन की मल्टीस्पेक्ट्रल तस्वीरें इन बातों की पहचान कर सकती हैं:
• कमजोर फसल वाले हिस्से।
• शुरुआती पोषक तत्व कमी।
• नमी तनाव वाले क्षेत्र।
• रोग लगने की संभावना वाले हिस्से।
• असमान बढ़वार।
ICAR-IARI पहले ही ड्रोन आधारित मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग का उपयोग फसल सेहत और खेत संबंधी अध्ययन में कर चुका है। आधिकारिक रिपोर्टों में इसका उपयोग तनाव निगरानी और कृषि विश्लेषण से जुड़ा दिखाया गया है।
किसानों के लिए इसका मतलब है कि ड्रोन एक बहुत महत्वपूर्ण सवाल का जवाब देने में मदद कर सकता है:
मेरे खेत का कौन-सा हिस्सा सच में तनाव में है?
और जब यह पता चल जाए, तो अगला सवाल बनता है:
क्या मुझे पूरा खेत छिड़कना है, या केवल वही हिस्सा जहां तनाव है?
ड्रोन “तनावग्रस्त” पौधों को कैसे पहचानते हैं
तनाव में आए पौधों में आमतौर पर तीन बड़े बदलाव दिखाई देते हैं:
1. क्लोरोफिल में बदलाव
नाइट्रोजन की कमी, रोग और पानी की कमी क्लोरोफिल को घटाते हैं। इससे पत्ती की रोशनी लेने और लौटाने की क्षमता बदलती है।
2. पौधे की छतरी का तापमान बदलना
पानी की कमी से जूझ रहे पौधे अक्सर ज्यादा गर्म हो जाते हैं क्योंकि उनकी वाष्पोत्सर्जन क्षमता घटती है।
3. बढ़वार के पैटर्न में बदलाव
तनाव वाले पौधे छोटे, पतले या असमान हो सकते हैं।
मल्टीस्पेक्ट्रल इमेज इन बदलावों को डिजिटल नक्शों में बदलने में मदद करती हैं। इन नक्शों में फसल के ताकतवर और कमजोर हिस्से अलग-अलग रंगों या मानों में दिखते हैं। खेत के किनारे खड़े होकर जो तनाव साफ नहीं दिखता, वह इस तरह की मैपिंग में सामने आ सकता है।
यह पोषण प्रबंधन में महत्वपूर्ण है क्योंकि कई किसान ऊपर से खाद समान रूप से डालते हैं, जबकि असली जरूरत केवल कुछ हिस्सों में होती है। प्रिसिजन तरीका स्वस्थ हिस्सों पर बेकार उपयोग घटा सकता है और समस्या वाले हिस्सों पर ध्यान बढ़ा सकता है।
प्रिसिजन पोषण: सिर्फ़ ऊपर से खाद का स्प्रे नहीं
जब लोग “ड्रोन पोषण” सुनते हैं, तो वे अक्सर केवल पत्तियों पर पोषक तत्व स्प्रे करने की बात सोचते हैं। लेकिन प्रिसिजन पोषण उससे कहीं बड़ा है। इसका मतलब है कि खेत की जानकारी का उपयोग करके यह तय करना:
• पोषक तत्वों का तनाव कहां है?
• कौन-सा पोषक तत्व कमी में है?
• समस्या खाद की कमी से है, पानी के तनाव से, जड़ों के नुकसान से या रोग से।
• क्या स्प्रे करना सही समाधान है भी या नहीं?
यह बहुत जरूरी है, क्योंकि हर पीला हिस्सा नाइट्रोजन की कमी नहीं होता। कुछ जगह पानी भरा होता है। कुछ जगह जड़ों को नुकसान होता है। कुछ हिस्से बीमार होते हैं। कुछ बस सख्त मिट्टी के कारण कमजोर होते हैं। अगर ड्रोन मैप को सही तरह समझा जाए, तो किसान ऐसे हिस्सों पर तरल पोषक तत्व बर्बाद करने से बच सकते हैं, जहां असली समस्या पोषण की ही नहीं है। इसलिए प्रिसिजन पोषण केवल सही तरीके से छिड़काव करने का नाम नहीं है। यह पहले बेहतर पहचान करने का तरीका है।
पूरे खेत में एक जैसा छिड़काव बनाम निशाने पर छिड़काव
पारंपरिक छिड़काव यह मानकर चलता है कि पूरे खेत को एक जैसी जरूरत है। यह आसान है, लेकिन इसकी सीमाएं हैं।
जब पूरे खेत में एक जैसा छिड़काव होता है:
• पूरे खेत को एक ही मात्रा मिलती है।
• स्वस्थ हिस्सों पर ज्यादा छिड़काव हो सकता है।
• कमजोर हिस्से फिर भी ठीक नहीं होते अगर असली कारण कुछ और हो।
• ज्यादा मजदूरी, पानी और समय लग सकता है।
• दवा उड़ने और बहने का खतरा बढ़ सकता है।
जब ड्रोन आधारित निशाने वाला छिड़काव होता है:
• खरपतवार या तनाव वाले हिस्सों को चिन्हित किया जा सकता है।
• GPS से स्प्रे का रास्ता नियंत्रित किया जा सकता है।
• कीचड़ या पानी भरे हिस्सों तक भी पहुंचा जा सकता है।
• मजदूर का रसायन से संपर्क कम हो सकता है।
• छिड़काव का समय ज्यादा तेज और जरूरत के अनुसार हो सकता है।
यह खासकर खरपतवारनाशी और तरल पोषण के उपयोग में बहुत उपयोगी हो सकता है, जहां खेत के कुछ हिस्सों में ही उपचार जरूरी हो।
भारत में ड्रोन छिड़काव खास क्यों आकर्षित कर रहा है?
भारत की खेती में कुछ ऐसी स्थितियां हैं जहां ड्रोन उपयोगी बन सकते हैं। पहली बात, कई क्षेत्रों में मजदूर की कमी बढ़ रही है। दूसरी बात, असमान जमीन और खड़ी फसल में हाथ से या मशीन से छिड़काव कठिन होता है। तीसरी बात, कई बार रोग या खरपतवार अचानक बढ़ते हैं, लेकिन उसी समय मजदूर या मशीन नहीं मिलती।
ड्रोन खेत को जल्दी कवर कर सकते हैं और फसल रौंदने से बचा सकते हैं। ये खास तौर पर तब उपयोगी हैं जब:
• फसल ऊंची हो।
• खेत में कीचड़ हो।
• कीट हमला अचानक हो।
• मौसम का सही समय बहुत छोटा हो।
कर्नाटक वाले काम में पानी की बचत के साथ-साथ तेजी से छिड़काव और मेहनत कम होने की बात भी सामने आई।
लेकिन क्या ड्रोन सच में खरपतवारनाशी की बर्बादी कम कर सकते हैं?
हां, सही व्यवस्था में कर सकते हैं, लेकिन एक जरूरी शर्त है: असली बचत तब होगी जब मैपिंग और स्प्रे एक साथ जुड़े हों।अगर ड्रोन का उपयोग केवल उड़ते हुए स्प्रेयर की तरह किया जाए और पूरा खेत वैसे ही छिड़क दिया जाए, तो फ़ायदा मुख्य रूप से कम स्प्रे मात्रा, तेज काम और कम मजदूरी के रूप में मिलेगा। लेकिन अगर ड्रोन इमेजिंग से खरपतवार वाले हिस्से पहचाने जाएं और केवल उन्हीं जगहों पर स्प्रे किया जाए, तब खरपतवारनाशी की असली बर्बादी तेज़ी से कम हो सकती है।
यही प्रिसिजन स्प्रेइंग की भविष्य दिशा है
भारतीय डिजिटल खेती संबंधी साहित्य और वैश्विक समीक्षा यह समर्थन करते हैं कि ड्रोन सही जरूरत वाली जगह पर अधिक सटीक छिड़काव करके रसायनों का उपयोग घटा सकते हैं और जमा होने की गुणवत्ता सुधार सकते हैं। फिर भी किसानों को बड़े दावों से सावधान रहना चाहिए। बचत कई बातों पर निर्भर करती है:
• फसल की अवस्था।
• खरपतवार का फैलाव।
• नोज़ल का प्रकार।
• उड़ान की ऊंचाई।
• बूंद का आकार।
• मौसम की स्थिति।
• छिड़काव केवल हिस्सों में है या पूरे खेत में।
इसलिए तकनीक में क्षमता तो है, लेकिन खेत की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है।
इसकी सीमाएं और जोखिम क्या हैं?
ड्रोन कोई जादू नहीं हैं। कई व्यावहारिक समस्याएं अभी भी मौजूद हैं।
सेंसर की समझ
ड्रोन की तस्वीर तनाव दिखा सकती है, लेकिन हमेशा उसका सही कारण नहीं बताती। पीलापन नाइट्रोजन की कमी, रोग या जड़ तनाव — किसी भी वजह से हो सकता है। गलत समझ से गलत छिड़काव हो सकता है।
लागत
छोटे किसान आमतौर पर अपना खुद का ड्रोन नहीं खरीदेंगे। भारत में अधिक व्यावहारिक रास्ता है — FPO, सहकारी समितियां, कस्टम हायरिंग सेंटर या एग्री-स्टार्टअप के ज़रिए सेवा लेना।
नियम और प्रशिक्षण
सुरक्षित ड्रोन उपयोग के लिए प्रशिक्षित ऑपरेटर, सही मात्रा की समझ और उड़ान तथा रसायन दोनों से जुड़े नियमों का पालन जरूरी है।
ड्रिफ्ट और कैलिब्रेशन
गलत सेटिंग या गलत मौसम में छिड़काव खराब परिणाम दे सकता है।
छोटे-छोटे बंटे खेत
भारत में छोटे जोत वाले खेतों के कारण व्यक्तिगत ड्रोन रखना महंगा पड़ सकता है, हालांकि साझा सेवा इसका समाधान हो सकती है।
भारतीय खेती में यह कहां सबसे ज्यादा काम आ सकता है?
ड्रोन आधारित प्रिसिजन पोषण और छिड़काव इन स्थितियों में खास उपयोगी हो सकता है:
• धान के खेत जहां कुछ हिस्से कमजोर हों।
• गेहूं के खेत जहाँ तनाव की मैपिंग जरूरी हो।
• मक्का और कपास जहां पोषक तत्वों का तनाव जगह-जगह हो।
• बागवानी के ब्लॉक जहां रोग कुछ हिस्सों से शुरू हो।
• दलहनी फसलें जहां पत्तियों पर पोषण दिया जाता है।
• खरपतवार वाले हॉटस्पॉट जहां पूरे खेत में दवा बर्बादी है।
यह बीज उत्पादन वाले प्लॉट और ऊंची कीमत वाली फसलों में और भी उपयोगी हो सकता है, जहां सटीकता ज्यादा मायने रखती है।
ड्रोन सेवा लेने से पहले किसान क्या देखें?
ड्रोन आधारित पोषण या स्प्रे सेवा के लिए पैसा देने से पहले किसान को पूछना चाहिए:
• क्या यह केवल छिड़काव है या खेत की मैपिंग भी होगी?
• कौन-सा सेंसर इस्तेमाल हो रहा है?
• तनाव की पहचान कैसे की जा रही है?
• क्या ऑपरेटर प्रशिक्षित है?
• कौन-सा नोज़ल और कितनी स्प्रे मात्रा होगी?
• क्या सलाह फसल के हिसाब से है?
• क्या पूरा खेत छिड़केगा या केवल चिन्हित हिस्से?
ये सवाल किसान को केवल “तकनीक दिखाने” के लिए पैसा देने से बचाते हैं और असली प्रिसिजन काम की पहचान करते हैं।
असली वादा: किसान को बदलना नहीं, उसके फैसले को मजबूत करना
ड्रोन किसान की समझ की जगह नहीं लेते। वे उसे बेहतर बनाते हैं। अच्छा किसान पहले से जानता है कि खेत का एक कोना जल्दी सूखता है, दूसरा ज्यादा देर तक गीला रहता है, और कुछ हिस्से हमेशा कमजोर रहते हैं। ड्रोन इमेजिंग इसमें एक नई परत जोड़ती है: वह इन फर्कों को दिखाई देने योग्य, नापने योग्य और रिकॉर्ड करने योग्य बना देती है। इसलिए भविष्य किसान बनाम ड्रोन का नहीं है। भविष्य है किसान का अनुभव + बेहतर खेत जानकारी।
प्रिसिजन पोषण के लिए ड्रोन का मतलब केवल आसमान से तरल खाद का छिड़काव नहीं है। इसकी असली ताकत है फसल के तनाव को जल्दी देखना, स्वस्थ और कमजोर पौधों में फर्क समझना, और इनपुट को केवल वहीं पहुंचाना जहां सच में उसकी जरूरत है।
इसीलिए ड्रोन पर चर्चा बदल रही है। असली बदलाव उड़ने वाली मशीन नहीं है। असली बदलाव है खेत के हर हिस्से के हिसाब से अलग फैसला लेना।
भारतीय खेती में, जहां हर लीटर स्प्रे, हर किलो इनपुट और हर घंटे की मेहनत महत्वपूर्ण है, यह बदलाव बहुत असरदार हो सकता है।
आने वाले साल तय करेंगे कि यह तकनीक गां व स्तर तक कितनी जल्दी व्यावहारिक बनती है। लेकिन एक बात अब साफ़ है: खेत के हर हिस्से को एक जैसा मानकर चलने का समय धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। सटीकता अब फसल देखभाल की नई भाषा बन रही है।

