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गर्मी ने अभी दस्तक भी नहीं दी है और मौसम वैज्ञानिकों ने 2026 के लिए बड़ी चेतावनी दे दी है। वो प्राकृतिक घटना जो दुनिया के मौसम को उलट-पुलट कर देती है, अल नीनो (El Niño 2026), एक बार फिर एक्टिव होने की कगार पर है। अनुमान है कि 2026 के दूसरे हिस्से में ये ‘The Weather’s Devil’ अपना असर दिखाना शुरू कर देगा (El Niño poses a risk of increased drought and heat across Asia)।
क्या है अल नीनो? समझिए आसान भाषा में
अल नीनो स्पेनिश भाषा का शब्द है (El Niño is a Spanish word), जिसका मतलब है ‘बालक’ या ‘छोटा बच्चा’। दरअसल, ये प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के गर्म होने की घटना है। जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ज़्यादा बढ़ जाता है, तो हवाओं की दिशा बदल जाती है और ये पूरी दुनिया के मौसम में बड़ा बदलाव ला देता है। इसका उलटा ला नीना होता है, जहां समुद्र ठंडा हो जाता है।
2026 के लिए क्या कहते हैं दुनिया के मौसम विभाग?
सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े मौसम केंद्रों ने अल नीनो की संभावना जताई है-
- जापान: उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में गर्मियों के दौरान अल नीनो बनने की 70 फीसदी संभावना
- अमेरिका (CPC): मई से जुलाई 2026 के बीच सक्रिय होने की 61 फीसदी संभावना
- चीन: ये कंडीशन मई से शुरू होकर साल के लास्ट तक बनी रह सकती है
- भारत: इस बार मानसून सामान्य से कम रहने की आशंका,पिछले तीन साल में पहली बार ऐसा होगा
एशिया और भारत पर सबसे भारी पड़ेगा असर
अगर आप सोचते हैं कि ये सब समुद्र में दूर हो रहा है, तो गलत हैं। अल नीनो का सबसे ज्यादा शिकार एशिया बनता है।
भारत के लिए: मानसून कमजोर रहेगा। कम बारिश और ज्यादा गर्मी, यानी फसलों पर मार। चावल, दलहन, तिलहन की पैदावार घट सकती है। जब खेती प्रभावित होगी, तो महंगाई बढ़ेगी। किसानों और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी।
ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशिया: वहां सूखे का ख़तरा है। ऑस्ट्रेलिया के ईस्ट पार्ट में मई से अगस्त के बीच कम बारिश का अनुमान, जो वहां की खेती के लिए बहुत अहम वक्त होता है।
कहां पड़ेगा पॉजिटिव असर?
जहां एशिया में सूखा होगा, वहीं अमेरिका के कुछ हिस्सों में इसका उलटा असर देखने को मिल सकता है। मिडवेस्ट क्षेत्र में खेती के लिए हालात बेहतर हो सकते हैं, हालांकि कुछ जगहों पर भारी बारिश से परेशानी भी हो सकती है।
अब तक के सबसे ताकतवर अल नीनो का इतिहास
- 1997-98: सबसे शक्तिशाली अल नीनो :- एशिया में सूखा और अमेरिका में भयंकर बाढ़
- 2015-16: बहुत ताकतवर:- ऑस्ट्रेलिया और एशिया में सूखा, भारत में कमजोर मानसून, पाम ऑयल और चीनी की पैदावार चरमरा गई
- 2009-10: मध्यम स्तर:- भारत में चावल-गेहूं की पैदावार घटी
अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा असर
ये सिर्फ मौसम का मामला नहीं है। ये महंगाई, खाद्य सुरक्षा और गरीबों की जेब का सवाल है। कम पैदावार का मतलब है महंगी सब्जियां, महंगा अनाज। जिन किसानों की सारी उम्मीदें बारिश पर टिकी हैं, उनके लिए यह एक संकट हो सकता है।
क्या करने की ज़रूरत है?
वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो हर 3-5 साल में आता है, लेकिन इस बार समय और तीव्रता (Time and Intensity) दोनों अहम हैं। पहले से तैयारी जरूरी है। जल भंडारण, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा, और किसानों को सही सलाह। सरकारों को अभी से स्कीम बनानी होगी, ताकि जब अल नीनो दस्तक दे, तो हम उससे लड़ने के लिए तैयार हों।
क्या 2026 का अल नीनो 1997-98 का रिकॉर्ड तोड़ेगा? यह तो समय बताएगा, लेकिन इतना तय है। मौसम वाला ये ‘बच्चा’ इस बार कोई मामूली खेल नहीं खेलने वाला।
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