Fertilizer Revolution: बम बनाने की तकनीक ने कैसे बचाई लाखों लोगों की जान? Second World War के मलबे से उगी हरित क्रांति

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (First and Second World Wars) के दौरान अमेरिका में बड़े पैमाने पर अमोनिया प्लांट (Ammonia Plant) लगाए गए। इन कारखानों में अमोनियम नाइट्रेट (NH₄NO₃) का प्रोडक्शन होता था, जो विस्फोटकों का Main components है।

Fertilizer Revolution: बम बनाने की तकनीक ने कैसे बचाई लाखों लोगों की जान? Second World War के मलबे से उगी हरित क्रांति

क्या आप जानते हैं कि आज दुनिया भर के खेतों में हरियाली लाने वाली रासायनिक खाद (fertilizer) का जन्म कभी विनाश के हथियारों से हुआ था? ये सच है कि फर्टिलाइजर क्रांति (Fertilizer Revolution) की नींव उन्हीं अमेरिकी प्लांट्स में रखी गई, जहां पहले और दूसरे विश्व युद्ध (First and Second World Wars) के दौरान बम बनाए जाते थे।

युद्ध की विरासत: ज़हर से अमृत तक

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध (First and Second World Wars) के दौरान अमेरिका में बड़े पैमाने पर अमोनिया प्लांट (Ammonia Plant) लगाए गए। इन कारखानों में अमोनियम नाइट्रेट (NH₄NO₃) का प्रोडक्शन होता था, जो विस्फोटकों का Main components है। जब युद्ध ख़त्म हुआ, तो सरकार के पास इस केमिकल का विशाल भंडार बेकार पड़ा था। तभी वैज्ञानिकों ने सोचा कि क्यों न इसी केमिकल का इस्तेमाल पौधों की भूख मिटाने के लिए किया जाए, क्योंकि ये नाइट्रोजन का सबसे अच्छा सोर्स है।

यह वही नाइट्रोजन थी जिसे हवा से खींचने की तकनीक ‘Haber-Bosch method’ जर्मनी में युद्ध के दौरान ही विकसित की गई थी। युद्ध खत्म होते ही अमेरिका ने अपने सैन्य कारखानों को कृषि कारखानों में बदल दिया। बम बनाने वाली मशीनें अब खाद बनाने लगीं।

मसल शोल्स: जहां बदली दुनिया की तकदीर

अमेरिका के अलाबामा राज्य का ‘मसल शोल्स’ (Muscle Shoals) क्षेत्र इस बदलाव का सबसे बड़ा सेंटर बना। 1933 में बनी टेनेसी वैली अथॉरिटी (TVA) ने सबसे पहले बड़े पैमाने पर फर्टिलाइज़र प्रोडक्शन शुरू किया। आगे चलकर 1974 में यहीं पर इंटरनेशनल फर्टिलाइजर डेवलपमेंट सेंटर (IFDC) की स्थापना हुई।  

खाद न होती तो आधी दुनिया होती भूखी

गौर करने वाली बात है कि रासायनिक खाद का आविष्कार भले ही 1842 में सुपरफॉस्फेट के रूप में हो गया था, लेकिन असली क्रांति तो युद्ध के बाद ही आई।  हरित क्रांति में सिर्फ बीजों का ही नहीं, बल्कि 40 से 60 फीसदी तक योगदान इन्हीं रासायनिक खादों का था। ये सच में हैरान करने वाला है कि जिस तकनीक ने कभी तबाही मचाई, उसी ने बाद में दुनिया का पेट भरा।

 

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