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पराली जलाने की समस्या (The problem of stubble burning) से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान (Union Agriculture Minister Shivraj Singh Chouhan) और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव (Union Environment Minister Bhupender Yadav) ने कृषि भवन में एक हाई लेवल मीटिंग (Centre’s strategy for stubble management) की। इस बैठक में पराली प्रबंधन (Stubble Management) के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार की गई है।
क्यों है पराली जलाना चिंता का विषय?
पराली जलाना सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण का कारण नहीं है, बल्कि ये मिट्टी की सेहत के लिए भी बेहद हानिकारक है। जब किसान पराली जलाते हैं, तो इससे:
- मिट्टी के मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं
- मिट्टी की उर्वरता कम होती है
- लोगों की सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है
- वायु प्रदूषण बढ़ता है
सरकार की बड़ी स्कीम
केंद्र सरकार ने साल 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना (Crop Residue Management Plan) शुरू की थी। तब से अब तक पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश को 4,266 करोड़ रुपये की मदद दी गई है। इससे:
- 3.54 लाख से ज्यादा मशीनें बांटी गईं
- 43,500 से अधिक कस्टम हायरिंग सेंटर खुले
- किसानों को आधुनिक उपकरण मिले
2026-27 की तैयारी
आने वाले साल के लिए सरकार ने 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। पहली किस्त के तौर पर 272.07 करोड़ रुपये राज्यों को दे दिए गए हैं। इस साल के टारगेट बेहद महत्वाकांक्षी हैं:
- 46,000 से ज़्यादा मशीनें बांटी जाएंगी
- 910 कस्टम हायरिंग सेंटर खुलेंगे
- 141 Crop Residue Supply Chain Project डेवलप किए जाएंगे
पराली सुरक्षा बल की होगी तैनाती
सबसे ख़ास बात ये है कि एनसीआर के 14 जिलों की 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ (‘Stubble Protection Force’) एक्टिव रहेगा। ये टीमें लगातार निगरानी करेंगी और पराली जलाने की घटनाओं पर लगाम लगाएंगी।
पराली से कमाई का नया रास्ता
सरकार अब पराली को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देख रही है। इसके लिए कई रास्ते अपनाए जा रहे हैं:
- बायोमास पावर प्लांट में पराली का उपयोग
- कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) यूनिट्स की स्थापना
- इथेनॉल उत्पादन संयंत्रों को बढ़ावा
- पेलेट निर्माण इकाइयों का विकास
इससे किसानों को पराली बेचकर अतिरिक्त आय होगी और प्रदूषण भी कम होगा।
कम वक्त में पकने वाली धान की किस्मों पर ज़ोर
बैठक में खासतौर पर कम समय में पकने वाली और कम पानी वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया। इससे धान कटाई और गेहूं बुवाई के बीच ज्यादा समय मिलेगा, जिससे किसान पराली प्रबंधन के लिए बेहतर तरीके अपना सकेंगे।
डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR) तकनीक को बढ़ावा
सरकार ने प्रत्यक्ष धान बुवाई (डीएसआर) तकनीक को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया है। इस तकनीक में धान की सीधी बुवाई की जाती है, जिससे पानी की बचत होती है और पराली की समस्या भी कम होती है।
किसानों को जागरूक करना ज़रूरी
केंद्रीय मंत्रियों ने कहा कि किसानों को यह समझाना होगा कि जिन खेतों में पराली को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाया गया, वहां धान की पैदावार बढ़ी है। इसके लिए व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
निगरानी का मज़बूत सिस्टम
पराली प्रबंधन के लिए एक अंतर-मंत्रालयी समिति लगातार निगरानी कर रही है। राज्यों को अगस्त 2026 से पहले मशीनें बांटने, कस्टम हायरिंग सेंटर मजबूत करने और पूरी मशीनरी का इस्तेमाल सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
दोनों मंत्रियों की अपील
केंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, “हम पराली को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन बनाने की दिशा में काम करेंगे।” वहीं, पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया।
एक अच्छी शुरुआत
पिछले कुछ सालों में पराली जलाने की घटनाओं में कमी आई है। सरकार, राज्य सरकारों, ICAR संस्थानों, कृषि विज्ञान केंद्रों और किसानों के मिले-जुले प्रयासों से यह संभव हुआ है। अब नई रणनीति से यह कमी और बढ़ेगी।
केंद्र सरकार की ये पहल सराहनीय है। पराली प्रबंधन के लिए मशीनीकरण, टेक्निकल इनोवेशन, Industrial use और जन-जागरूकता पर जोर दिया जा रहा है। ये प्रयास न सिर्फ पर्यावरण बचाएगा, बल्कि किसानों की आमदनी भी बढ़ाएगा और मिट्टी की सेहत सुधारेगा। अगर ये योजना सफल रही, तो यह देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।
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