उत्तर प्रदेश में भारत का पहला Biopolymer Plant : गन्ने से बनेगा पर्यावरण का भविष्य!

अब तक गन्ने से चीनी, गुड़, शीरा, खोई और इथेनॉल बनाया जाता था। लेकिन अब इसी गन्ने से बायोप्लास्टिक भी तैयार किया जाएगा। ये बायोप्लास्टिक पारंपरिक प्लास्टिक का पूर्ण विकल्प होगा।

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस प्लास्टिक की वजह से हमारी नदियां, नाले और समुद्र प्रदूषित हो रहे हैं, उसका समाधान गन्ने के खेतों से निकल सकता है? जी हां, उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में कुछ ऐसा ही होने जा रहा है। यहां बन रहा भारत का पहला Biopolymer plant शुरू होने जा रहा है। ये न केवल देश के लिए एक ऐतिहासिक कदम है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल भी है।

 3,080 करोड़ का निवेश, 75 करोड़ का अनुदान

ये महत्वाकांक्षी परियोजना 3,080 करोड़ रुपये की लागत से बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड (BCML) की कुंभी चीनी इकाई में विकसित की जा रही है। केंद्र सरकार ने बायोप्लास्टिक पॉली लैक्टिक एसिड (PLA) और को-पॉलिमर प्रोडक्ट्स के लिए एक Experimental research सुविधा स्थापित करने के लिए 75 करोड़ रुपये का अनुदान जारी कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 22 फरवरी 2025 को गोला गोकर्णनाथ में इस परियोजना की आधारशिला रखी थी। उन्होंने कहा था कि ये परियोजना न केवल पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को बढ़ावा देगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगी।

गन्ने से चीनी, गुड़, इथेनॉल,अब बायोप्लास्टिक भी! 


अब तक गन्ने से चीनी, गुड़, शीरा, खोई और इथेनॉल बनाया जाता था। लेकिन अब इसी गन्ने से बायोप्लास्टिक भी तैयार किया जाएगा। ये बायोप्लास्टिक पारंपरिक प्लास्टिक का पूर्ण विकल्प होगा। इससे कप-प्लेट, पॉलीथीन, बैग और कृषि योग्य प्लास्टिक शीट जैसी चीजें बनाई जा सकेंगी। सबसे बड़ी बात ये है कि ये प्लास्टिक प्रकृति में घुलनशील होगा, जिससे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होगा।

एक ही परिसर में पूरा प्रोसेस 


जिलाधिकारी अंजनी कुमार सिंह ने निर्माणाधीन संयंत्र का निरीक्षण किया और अक्टूबर में प्रस्तावित शुरुआत से पहले प्रगति की समीक्षा की। उन्होंने बताया कि लोकल लेवल पर उगाए गए गन्ने से लेकर पॉलीलैक्टिक एसिड (PLA) आधारित बायोप्लास्टिक बनाने तक की पूरा प्रोसेस एक ही परिसर में होगा। ये परियोजना खीरी के कृषि-आधारित औद्योगिक विकास में एक नया अध्याय जोड़ेगी और क्षेत्र में सतत व पर्यावरण के अनुकूल औद्योगिक विकास को नई दिशा देगी।

जीरो लिक्विड डिस्चार्ज: नदियों में नहीं बहेगा जहरीला कचरा

इस सुविधा की सबसे बड़ी ख़ासियत इसका ‘Zero Liquid Discharge’ (ZLD) सिस्टम है। ये सुनिश्चित करेगा कि कोई भी हानिकारक तरल कचरा नदियों या नालियों में न बहाया जाए। ये पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकार की गंभीर प्रतिबद्धता को दिखाता है।

क्यों है यह परियोजना महत्वपूर्ण?   

भारत में हर साल लाखों टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जो नदियों, समुद्रों और ज़मीन को प्रदूषित करता है। बायोप्लास्टिक इस समस्या का टिकाऊ समाधान है। ये न सिर्फ प्लास्टिक प्रदूषण को कम करेगा, बल्कि गन्ना किसानों की आमदनी बढ़ाने और नई तकनीक को बढ़ावा देने में भी मदद करेगा।

लखीमपुर खीरी का ये बायोपॉलिमर प्लांट न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक मिसाल बनेगा। अक्टूबर 2026 से ये प्लांट न केवल बायोप्लास्टिक का उत्पादन शुरू करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की एक नई कहानी भी लिखेगा।

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