बड़ा बदलाव! 1966 के गन्ना खेती से जुड़े पुराने कानून होंगे ख़त्म, अब गन्ना किसानों को मिलेगा तगड़ा फायदा

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है (India is the world's second-largest producer of sugar), लेकिन अब तक यहां गन्ना उद्योग 1966 में बने पुराने कानूनों से चल रहा था । उस जमाने में न तो एथेनॉल का चलन था और न ही डिजिटल भुगतान। लेकिन अब सरकार ने कमर कस ली है और 20 मई 2026 तक आम जनता से सुझाव मांगकर एक नया और मजबूत ढांचा तैयार कर रही है।

60 साल के इंतजार के बाद, भारत में गन्ना खेती से जुड़े नियम अब पूरी तरह बदलने जा रहे हैं। नया ‘गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026’ (‘Sugarcane (Control) Order, 2026’) किसानों के लिए वरदान साबित हो सकता है। आइए जानते हैं वो 5 बड़े बदलाव जो आपकी जिंदगी बदल देंगे।

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है (India is the world’s second-largest producer of sugar), लेकिन अब तक यहां गन्ना उद्योग 1966 में बने पुराने कानूनों से चल रहा था । उस जमाने में न तो एथेनॉल का चलन था और न ही डिजिटल भुगतान। लेकिन अब सरकार ने कमर कस ली है और 20 मई 2026 तक आम जनता से सुझाव मांगकर एक नया और मजबूत ढांचा तैयार कर रही है।

चीनी ही नहीं, अब एथेनॉल भी है हिसाब में

पहले गन्ने से सिर्फ चीनी बनाने पर जोर था, लेकिन नए कानून में एथेनॉल को भी उतना ही अहम दर्जा दिया गया है । अब अगर कोई मिल एथेनॉल बनाती है, तो हर 600 लीटर एथेनॉल को 1 टन चीनी के बराबर माना जाएगा। यानी गन्ना अब सिर्फ मीठा नहीं, बल्कि एनर्जी का भी जरिया बन गया है। इससे किसानों को गन्ने का दाम मिलने में कोई कमी नहीं आएगी।

अब नहीं होगी भुगतान में देरी!

ये बदलाव सबसे बड़ी राहत है। पुराने कानून में भुगतान की समयसीमा थी, लेकिन नए ड्राफ्ट में सजा का प्रावधान जोड़ा गया है:

  • 14 दिन: चीनी मिलों को गन्ना खरीदने के 14 दिन के अंदर किसानों का पैसा देना होगा।
  • 15 फीसदी ब्याज: अगर देरी हुई तो मिल को 15% सालाना ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।
  • सख़्त वसूली: अगर मिल नहीं देती है, तो राजस्व विभाग बकाया राशि जमीन की तरह वसूल करेगा। किसान अब मिलों की मर्जी पर निर्भर नहीं रहेंगे।

मिलों के बीच बढ़ी दूरी 

सरकार ने नई मिलें लगाने के नियम सख्त कर दिए हैं। अब दो मिलों के बीच की दूरी 15 किमी से बढ़ाकर 25 किमी करने का प्रस्ताव है ।

क्यों जरूरी है? जब मिलें बहुत पास होती हैं, तो वे एक-दूसरे के गन्ने “छीनने” की कोशिश करती हैं, जिससे कभी दाम तो बढ़ते हैं, कभी मिलें सीजन बंद कर देती हैं। 25 किमी का नियम आता है तो हर मिल के पास निश्चित इलाका (कमांड एरिया) होगा, जिससे गन्ने की खरीद व्यवस्थित होगी ।

अब सब होगा डिजिटल, खत्म होंगे गोलमाल

कागजी कार्रवाई से अब छुटकारा मिलेगा। नए कानून के तहत हर मिल का एक अलग कोड होगा और सारी रिपोर्टिंग ऑनलाइन (API के जरिए) होगी । इससे सरकार और किसान दोनों देख सकेंगे कि कितना गन्ना आया, कितना पैसा बना और कितना बांटा गया। पारदर्शिता बढ़ेगी और झोल-झंखाड़ कम होंगे।

सटोरियों पर शिकंजा: अब नहीं चलेगी मनमानी

क्या आपने देखा है कई बार मिलें बन तो जाती हैं, लेकिन चलती नहीं? नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई मिल लगातार 7 सीजन तक बंद रहती है, तो उसकी मान्यता खत्म हो जाएगी । साथ ही, खाली कागजों पर मिलें बेचने पर रोक लगेगी। जो मिलें बनेंगी, उन्हें 2 करोड़ का बैंक गारंटी देना होगा, ताकि वह सच में चीनी बनाए ।

किसानों के लिए इतना बड़ा बदलाव क्यों जरूरी था?

अब तक गन्ना किसान अक्सर चीनी मिलों के रहम पर थे। देर से पैसा मिलना, गन्ने का दाम घटाना, या मिल का बंद हो जाना आम समस्या थी। यह नया गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026 इन सब समस्याओं की जड़ पर हमला करता है।

सरकार ने साफ कर दिया है कि अब किसान ही सबसे ऊपर है। चाहे मिल चीनी बनाए या एथेनॉल, गन्ने का दाम तय है। भुगतान तय है। नियम तय हैं। यह बदलाव इसलिए खास है क्योंकि यह 60 साल पुराने उद्योग को आधुनिक, डिजिटल और पारदर्शी बना रहा है।

(नोट: ये मसौदा फिलहाल सुझावों के लिए रखा गया है। अंतिम कानून 20 मई 2026 के बाद पारित होगा।)

 

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