चावल सब्सिडी को लेकर WTO में भारत का वार: 7वीं बार बजा ‘Peace Clause’ का डंका, किसान हित में बड़ा कदम

WTO का कहना है कि कोई भी विकासशील देश अपने कुल चावल उत्पादन (Total Rice Production) के 10 फीसदी से ज्यादा का सब्सिडी (अनुदान) नहीं दे सकता। लेकिन भारत में तो मामला ही कुछ और है। भारत की धरती पर 14 करोड़ किसान परिवार पसीना बहाते हैं, और सरकार चाहती है कि इन्हें उनकी मेहनत का सही दाम मिले।

दुनिया भर की निगाहें जहां भारत (India) पर टिकी हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने एक बार फिर ग्लोबल स्टेज  पर ताकत दिखाते हुए किसानों की रक्षा करने का काम किया है। भारत ने World Trade Organization (WTO) में जोरदार एंट्री लेते हुए ‘Peace Clause‘ (शांति उपबंध) नाम की ढाल को सातवीं बार उठा लिया है। यानी, अब अमेरिका हो या यूरोप, कोई भी भारत के किसानों को चावल (Rice) पर मिलने वाली सब्सिडी पर उंगली नहीं उठा सकता। 

चावल के मामले में भारत ने तोड़ा WTO का खेल

दरअसल, WTO का कहना है कि कोई भी विकासशील देश अपने कुल चावल उत्पादन (Total Rice Production) के 10 फीसदी से ज्यादा का सब्सिडी (अनुदान) नहीं दे सकता। लेकिन भारत में तो मामला ही कुछ और है। भारत की धरती पर 14 करोड़ किसान परिवार पसीना बहाते हैं, और सरकार चाहती है कि इन्हें उनकी मेहनत का सही दाम मिले।

2024-25 के आंकड़ों पर गौर करें:

  • भारत ने किसानों को 7.6 अरब डॉलर (लगभग 63,000 करोड़ रुपये) की सब्सिडी दी है
  • ये सब्सिडी 11.85 फीसदी के आसपास पहुंच गई, जो WTO की 10 फीसदी की सीमा से ज़्यादा है।
  • लेकिन भारत चुप क्यों बैठे? उसने कहा – ‘हमारे गरीबों को खाना चाहिए, हमारे किसान को MSP चाहिए। बाकी दुनिया चाहे जो कहे।’

क्या है ये ‘Peace Clause’?  

सबसे पहले ये समझिए: ‘Peace Clause‘ कोई जादू नहीं है, बल्कि WTO का एक पुराना फॉर्मूला है। जब भारत जैसा देश खाद्य सुरक्षा (Food Security) देने के चक्कर में, MSP पर अनाज ख़रीदते हुए सब्सिडी की सीमा पार कर जाता है, तो कोई देश इस पर WTO में केस नहीं कर सकता। यानी भारत को नो-टेंशन जोन में रखा जाता है।

2020 में पहली बार भारत ने इसका इस्तेमाल किया था, और अब लगातार सातवीं बार इसका यूज़ किया है। यानी कांग्रेस हो या बीजेपी, हर सरकार जानती है कि अगर किसान का पेट नहीं भरेगा, तो देश का पेट नहीं भरेगा।

आंकड़े बताते हैं: किसान को मिला भरपूर सहारा

सिर्फ चावल ही नहीं, सरकार ने किसानों पर लगभग 42.5 अरब डॉलर (साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये) खर्च किए हैं। ये पैसे कहां गए?

  • सस्ती खाद (यूरिया, DAP) पर सब्सिडी
  • बीज और सिंचाई पर रियायत
  • बिजली बिल में छूट

भले ही ये राशि पिछले साल (43.25 अरब डॉलर) से थोड़ी कम है, लेकिन ये अभी भी इतनी बड़ी है कि दुनिया के तमाम देश इसकी तुलना में छोटे लगें।

क्यों ज़रूरी है ये सब?

इमेजिन, अगर भारत WTO की 10 फीसदी की सीमा में बंध जाए, तो क्या होगा?

:-MSP पर गेहूं-चावल खरीदना मुश्किल हो जाएगा।

:-PDS के तहत गरीबों को 2-3 रुपये किलो राशन मिलना बंद हो जाएगा।

:-लाखों किसान मंडियों में इधर-उधर भटकेंगे।

इसलिए भारत ने WTO को साफ-साफ लिखा है – ‘हमारे चावल की खरीद सिर्फ भारतीय गरीब के पेट के लिए है, न कि दुनिया के बाजार में गड़बड़ी फैलाने के लिए।’

किसानों के हित में रचा इतिहास

भारत का ये फैसला साफ संकेत है कि देश का किसान सबसे ऊपर है। सातवीं बार ‘पीस क्लॉज’ उठाकर भारत ने एक नया इतिहास रच दिया है।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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