Table of Contents
कई लोग गांव से शहर की ओर नौकरी और बेहतर कमाई की तलाश में जाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो गांव लौटकर खेती को ही अपना रास्ता बना लेते हैं। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले के रहने वाले अजय रत्न की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। क़रीब 10 साल तक सहायक अभियंता के तौर पर नौकरी करने के बाद उन्होंने गांव लौटकर खेती-बाड़ी शुरू करने का फैसला किया। आज वह क़रीब 25 बीघा ज़मीन पर खेती कर रहे हैं और अपने साथ कई किसानों को भी प्राकृतिक खेती से जोड़ रहे हैं।
नौकरी के बाद खेती की तरफ लौटे अजय रत्न
अजय रत्न जब नौकरी कर रहे थे, तब भी गांव और खेती से उनका जुड़ाव बना रहा। गांव आने पर वह अपने खेतों में कुछ नया करने की कोशिश करते थे। लेकिन खेती की बढ़ती लागत ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि किसानों के लिए कम ख़र्च में टिकाऊ खेती का कोई रास्ता होना चाहिए।
इसी दौरान उन्हें सुभाष पालकर की प्राकृतिक खेती पद्धति के बारे में जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने इस तरीके को समझने और अपनाने का फैसला किया। धीरे-धीरे अजय रत्न ने अपनी खेती में प्राकृतिक खेती के तरीकों को शामिल करना शुरू किया।
25 बीघा में तैयार किया अपना खेती मॉडल
आज अजय रत्न क़रीब 25 बीघा ज़मीन में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में गेहूं, चना, मटर, मक्का, सोयाबीन, मूंग, सरसों, अरहर, उड़द के साथ शिमला मिर्च, धनिया, कद्दू, टमाटर, फूलगोभी, अदरक और दूसरी फ़सलें भी उगाई जाती हैं।
उनकी कोशिश सिर्फ़ फ़सल उगाने तक सीमित नहीं है। वह खेती में बाहर से खरीदे जाने वाले संसाधनों पर ख़र्च कम करने पर भी ध्यान देते हैं। अजय रत्न के मुताबिक, पहले रासायनिक खेती में खेती का ख़र्च काफी ज्यादा था। अब प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनका ख़र्च बहुत कम हो गया है।
उनके खेती मॉडल में क़रीब 25 बीघा ज़मीन पर प्राकृतिक खेती का ख़र्च लगभग 3 हज़ार रुपये बताया गया है। वहीं रासायनिक खेती में ख़र्च क़रीब 30 हज़ार रुपये था।
देसी गाय से तैयार करते हैं खेती के लिए ज़रूरी सामान
अजय रत्न के लिए प्राकृतिक खेती का एक अहम हिस्सा देसी गाय भी है। नौकरी छोड़ने के बाद उन्हें अपने पिता और परिवार का सहयोग मिला। खेती की इस पद्धति को अपनाने के लिए उन्होंने देसी नस्ल की गाय अपने रिश्तेदारों से ली।
अब वह गाय के गोबर और दूसरे उपलब्ध संसाधनों से खेती के लिए ज़रूरी प्राकृतिक inputs तैयार करते हैं। उनका कहना है कि इस तरीके से खेत में बाहर से चीजें खरीदने की ज़रूरत काफी कम हो जाती है। यही वजह है कि प्राकृतिक खेती उनके लिए कम लागत वाली खेती का एक तरीका बन गई है। अजय रत्न दूर-दूर से आने वाले किसानों को भी अपने यहां तैयार किए गए प्राकृतिक आदान उपलब्ध कराते हैं। उनका उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा किसानों को इस खेती पद्धति से जोड़ना है।
किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने में जुटे
अजय रत्न ने अपनी खेती में बदलाव करने के साथ-साथ दूसरे किसानों को भी इसके बारे में समझाना शुरू किया। उनके सफल मॉडल को देखकर क्षेत्र के क़रीब 250 किसान उनके साथ जुड़ चुके हैं। वह खुद मास्टर ट्रेनर के तौर पर किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देते हैं और अब तक 1500 से ज्यादा किसानों को इस तरीके के बारे में जागरूक कर चुके हैं।
उनके प्रयासों को पहचान भी मिली है। वर्ष 2019 में उन्हें राज्यपाल हिमाचल प्रदेश आचार्य देवव्रत की ओर से कृषि से जुड़े सम्मान से सम्मानित किया गया।
अजय रत्न की कोशिश से बढ़ रहा भरोसा
अजय रत्न की कहानी सिर्फ़ अपनी खेती में बदलाव करने की कहानी नहीं है। उन्होंने नौकरी छोड़कर गांव लौटने के बाद प्राकृतिक खेती को अपनाया और इसे दूसरे किसानों तक पहुंचाने का काम भी शुरू किया। उनका मानना है कि खेती की लागत कम करके किसान अपनी कमाई को बेहतर कर सकते हैं।
आज उनके खेत दूसरे किसानों के लिए एक तरह का उदाहरण बन रहे हैं। अजय रत्न का मॉडल यह दिखाता है कि खेती में बदलाव के लिए हमेशा बड़े ख़र्च की ज़रूरत नहीं होती। सही जानकारी, उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल और लगातार सीखने की कोशिश से किसान प्राकृतिक खेती को अपने खेतों के हिसाब से अपना सकते हैं।
इसी सोच के साथ अजय रत्न लगातार किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने और गांव में खेती को मज़बूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
ये भी पढ़ें : पीला रतुआ के बीच प्राकृतिक खेती बनी सहारा, बुद्धि राम ने खेतों में दिखाया कमाल
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुंचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

