प्राकृतिक खेती अपनाकर कंचन बनीं गांव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा

प्राकृतिक खेती अपनाकर कंचन ने खेती की लागत घटाई, बागवानी सुधारी और गांव के किसानों को नई राह दिखाई।

आज भी खेती की बात होती है तो अक्सर पुरुष किसानों का नाम ज़्यादा सुनने को मिलता है, लेकिन कई महिलाएं ऐसी हैं जो खेती और परिवार दोनों की जिम्मेदारी बखूबी निभा रही हैं। हिमाचल प्रदेश के नग्गर विकास खंड के स्योगी गांव की कंचन ऐसी ही एक महिला किसान हैं। उन्होंने प्राकृतिक खेती को अपनाकर न केवल अपनी खेती-बागवानी को मज़बूत बनाया, बल्कि गांव के दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन गई हैं।

एक प्रशिक्षण से शुरू हुआ बदलाव

कंचन को पहली बार प्राकृतिक खेती के बारे में साल 2019 में कृषि विभाग के अधिकारियों से जानकारी मिली। इसके बाद उन्हें पालमपुर में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने का मौक़ा मिला।

प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने जीवामृत, घनजीवामृत और अन्य प्राकृतिक इनपुट्स तैयार करने और उनके उपयोग के बारे में विस्तार से सीखा। घर लौटने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपने किचन गार्डन में मटर की खेती पर इसका प्रयोग किया।

पहले ही प्रयास में उन्हें अच्छे परिणाम मिले। मटर की फ़सल अच्छी हुई और स्वाद भी पहले से बेहतर लगा। यही अनुभव उन्हें आगे बढ़ाने के लिए काफी था।

किचन गार्डन से खेतों तक पहुंची प्राकृतिक खेती

मटर की सफल खेती के बाद कंचन का भरोसा प्राकृतिक खेती पर बढ़ गया। उन्होंने अपने 2 बीघा खेत और बागवानी क्षेत्र में भी इस पद्धति को अपनाना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने मक्की, गेहूं, राजमाश, टमाटर, शिमला मिर्च और जुकीनी जैसी फ़सलों में भी प्राकृतिक खेती का प्रयोग किया। उन्हें हर फ़सल में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले।

उनका कहना है कि इस पद्धति से फ़सलों की गुणवत्ता बेहतर होती है और उत्पादन में भी अच्छा सुधार देखने को मिलता है।

सेब बागवानी में मिला बड़ा फ़ायदा

कंचन लगभग 200 सेब के पौधों की बागवानी भी करती हैं। वे बताती हैं कि पहले जब रासायनिक तरीके से खेती होती थी, तब बागानों में कई तरह की बीमारियां देखने को मिलती थीं। रोगों को रोकने के लिए रसायनों का छिड़काव करना पड़ता था, लेकिन कई बार एक बीमारी रुकती तो दूसरी समस्या सामने आ जाती थी। इससे पौधों की सेहत पर भी असर पड़ता था।

जब उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाई, तो बागानों में रोगों का प्रकोप कम होने लगा। इससे उन्हें बागवानी में काफी राहत मिली और पौधे भी पहले से अधिक स्वस्थ दिखाई देने लगे।

प्राकृतिक खेती अपनाकर कंचन बनीं गांव की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा

सह फ़सल से बढ़ रही आय

कंचन केवल सेब पर निर्भर नहीं हैं। वे बागानों में सह फ़सल के सिद्धांत पर भी काम कर रही हैं। इसके तहत उन्होंने राजमाश और दूसरी दलहनी फ़सलें लगाई हैं।

इससे एक तरफ मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषण मिलता है, वहीं दूसरी ओर अतिरिक्त आय का स्रोत भी बनता है। प्राकृतिक खेती के साथ ये तरीक़ा उनके लिए काफी फ़ायदेमंद साबित हुआ है।

कम ख़र्च में बेहतर मुनाफ़ा

कंचन का अनुभव है कि प्राकृतिक खेती में लागत काफी कम हो जाती है। पहले जहां रासायनिक खेती में लगभग 20 हज़ार रुपये ख़र्च होते थे, वहीं अब ख़र्च घटकर करीब 5 हज़ार रुपये रह गया है।

ख़र्च कम होने के कारण शुद्ध लाभ पहले से बेहतर हो गया है। उनका मानना है कि किसान अगर रसायनों पर होने वाला ख़र्च बचा ले, तो उसकी आर्थिक स्थिति अपने आप मज़बूत होने लगती है।

गांव के किसान भी सीख रहे हैं

कंचन की सफलता देखकर गांव के दूसरे किसान भी प्रभावित हुए हैं। अब कई किसान उनके खेत और बागवानी क्षेत्र को देखने आते हैं और प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी लेते हैं।

उनके अनुसार गांव के करीब 10 किसानों ने इस पद्धति को अपनाने की शुरुआत कर दी है। लोग अब खुद परिणाम देखकर इस खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

बाज़ार में भी मिलने लगी पहचान

कंचन बताती हैं कि प्राकृतिक खेती से तैयार फल और सब्जियों की पहचान धीरे-धीरे बाज़ार में बन रही है। हालांकि इनके दाम सामान्य फ़सलों के बराबर ही मिलते हैं, लेकिन कम लागत के कारण किसानों को ज़्यादा फ़ायदा होता है।

साल 2020 में मौसम की मार से सेब की फ़सल कमज़ोर रही, लेकिन उसी दौरान उन्होंने लगभग 25 हज़ार रुपये की सब्ज़ियां स्थानीय बाज़ार में बेचकर अच्छी आय हासिल की।

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महिलाओं के लिए प्रेरणा बनी कहानी

कंचन की कहानी ये साबित करती है कि खेती में महिलाएं भी बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियों के साथ खेती को संभाला और प्राकृतिक खेती के ज़रिए अपनी अलग पहचान बनाई।

आज वे केवल एक सफल महिला किसान नहीं हैं, बल्कि गांव की दूसरी महिलाओं और किसानों के लिए प्रेरणा भी हैं।

एक नई सोच की ओर बढ़ते कदम

कंचन का मानना है कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की तकनीक नहीं, बल्कि खेती को टिकाऊ बनाने का तरीक़ा है। इससे मिट्टी, पौधे और किसान तीनों को फ़ायदा मिलता है।

उनकी कहानी ये दिखाती है कि अगर किसान सही जानकारी और धैर्य के साथ आगे बढ़े, तो प्राकृतिक खेती के ज़रिए कम ख़र्च में बेहतर खेती की जा सकती है। येी वजह है कि आज उनके खेत और बागवानी क्षेत्र कई किसानों के लिए सीखने की जगह बन चुके हैं।

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