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हिमाचल प्रदेश के बंजार क्षेत्र के किसान ठाकुर दास की कहानी ये दिखाती है कि अगर किसान किसी नई तकनीक को धैर्य और भरोसे के साथ अपनाए, तो खेती की तस्वीर बदल सकती है। कभी वे रसायनों और बाज़ार से खरीदे जाने वाले इनपुट्स पर निर्भर थे, लेकिन आज उनकी पूरी खेती प्राकृतिक खेती पर आधारित है।
सबसे ख़ास बात ये है कि उन्होंने केवल अपने खेत तक ही इस बदलाव को सीमित नहीं रखा, बल्कि दूसरे किसानों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाने का काम शुरू किया है।
एक छोटे प्रयोग से शुरू हुआ सफ़र
ठाकुर दास ने साल 2018 में सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने तुरंत पूरी ज़मीन पर बदलाव नहीं किया। पहले उन्होंने केवल 1 बीघा ज़मीन पर प्राकृतिक खेती को प्रयोग के तौर पर अपनाया।
पहले ही सीजन में उन्हें अच्छे परिणाम मिले। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और अगले साल उन्होंने 3 बीघा ज़मीन में प्राकृतिक खेती शुरू कर दी। धीरे-धीरे उन्हें इस पद्धति पर इतना भरोसा हो गया कि आज वे अपनी पूरी 8 बीघा ज़मीन में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
रसायनों से दूरी, ख़र्च में बड़ी कमी
ठाकुर दास बताते हैं कि पहले वे जैविक खेती करते थे, लेकिन उसमें भी कई तरह के इनपुट बाज़ार से खरीदने पड़ते थे। इससे खेती की लागत बढ़ जाती थी। जब उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाई, तो स्थिति बदल गई। अब वे अपने खेत और घर में उपलब्ध संसाधनों से ही अधिकांश इनपुट तैयार कर लेते हैं। इससे बाज़ार पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई है।
पहले उनकी खेती में लगभग 75 हज़ार रुपये ख़र्च होते थे अब प्राकृतिक खेती में उनका ख़र्च घटकर लगभग 20 हज़ार रुपये रह गया है, जबकि आय भी बढ़ गई है।
फ़सलों के साथ बागवानी में भी सफलता
ठाकुर दास केवल अनाज या सब्ज़ियों तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने अपने सेब के बागानों में भी प्राकृतिक खेती के तरीके अपनाए हैं। इसके साथ ही वे अनार, नाशपाती और पर्सिमन जैसे फलों के पौधों में भी प्राकृतिक इनपुट्स का उपयोग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन पौधों की बढ़वार पहले से बेहतर हुई है और पौधे अधिक स्वस्थ दिखाई देते हैं।
आज उनके खेत में मक्की, बीन्स, मटर, गेहूं, गोभी, आलू, सेब, प्लम, नाशपाती और अनार जैसी कई फ़सलें और फलदार पौधे मौजूद हैं।
गांव के लोग भी हो रहे प्रभावित
जब ठाकुर दास ने प्राकृतिक खेती शुरू की थी, तब कई लोग इसे केवल एक प्रयोग मान रहे थे। लेकिन समय के साथ जब लोगों ने उनके खेतों में अच्छे परिणाम देखे, तो उनका नज़रिया बदल गया।
आज उनके गांव के कई किसान इस खेती पद्धति को अपनाने लगे हैं। ठाकुर दास अपने घर पर तैयार किए गए प्राकृतिक इनपुट्स गांव वालों और रिश्तेदारों के साथ भी साझा करते हैं, ताकि वे भी इस पद्धति को आसानी से अपना सकें।
किसानों को जोड़ने के लिए बनाया संगठन
ठाकुर दास ने कुछ किसान मित्रों के साथ मिलकर कुल्लू प्राकृतिक खेती संघ भी बनाया है। इस संघ का उद्देश्य किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूक करना और उन्हें आपस में जोड़ना है।
संघ के माध्यम से किसानों को खेती से जुड़ी जानकारी देने के साथ-साथ सरकारी योजनाओं के बारे में भी बताया जाता है। इससे किसानों को नई तकनीकों और सुविधाओं तक पहुंच बनाने में मदद मिल रही है।
खेती को बना रहे सीखने का केंद्र
ठाकुर दास का मानना है कि किसी भी नई तकनीक को समझाने का सबसे अच्छा तरीक़ा उसे करके दिखाना है। येी कारण है कि वे अपने खेतों को एक मॉडल के रूप में विकसित कर रहे हैं।
कई किसान और बागवान उनके खेत देखने आते हैं। जब वे प्राकृतिक खेती के परिणाम अपनी आंखों से देखते हैं, तो इस पद्धति को अपनाने के लिए प्रेरित होते हैं। उनका कहना है कि इस खेती पद्धति से मिट्टी की सेहत बेहतर रहती है, पौधे मज़बूत बनते हैं और खेती का ख़र्च भी काफी कम हो जाता है।
बदलाव की ये कहानी यहीं नहीं रुकी
ठाकुर दास की कहानी ये साबित करती है कि खेती में सफलता केवल ज़्यादा ख़र्च करने से नहीं मिलती, बल्कि सही सोच और सही तरीके अपनाने से मिलती है। 1 बीघा के छोटे से प्रयोग से शुरू हुआ उनका सफ़र आज 8 बीघा तक पहुंच चुका है। प्राकृतिक खेती ने उनकी लागत कम की, आय बढ़ाई और उन्हें दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बना दिया।
आज वे केवल एक सफल किसान नहीं हैं, बल्कि ऐसे व्यक्ति हैं जो अपने अनुभव से दूसरे किसानों को भी नई राह दिखा रहे हैं। उनकी कहानी बताती है कि अगर किसान स्थानीय संसाधनों पर भरोसा करे और प्राकृतिक खेती को समझकर अपनाए, तो खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाया जा सकता है।
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