पीला रतुआ के बीच प्राकृतिक खेती बनी सहारा, बुद्धि राम ने खेतों में दिखाया कमाल

प्राकृतिक खेती अपनाकर बुद्धि राम ने पीला रतुआ से फ़सल बचाई, लागत घटाई और आमदनी बढ़ाई।

गेहूं की फ़सल में पीला रतुआ एक ऐसी बीमारी है, जिसने उत्तर भारत के कई इलाकों के किसानों की चिंता बढ़ाई है। हिमाचल प्रदेश के भी कई जिलों में इस बीमारी का असर देखने को मिलता है। रासायनिक और जैविक तरीकों से इसे नियंत्रित करने की कोशिशें भी कई जगह उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाईं। ऐसे समय में किसान बुद्धि राम ने अपने खेतों में प्राकृतिक खेती के जरिए ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसने आसपास के किसानों का ध्यान खींच लिया।

बुद्धि राम ने साल 2018 में प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी। उस समय उन्होंने सिर्फ़ 1 बीघा ज़मीन पर गेहूं के साथ चना और सरसों उगाकर इसका प्रयोग किया। पहली ही फ़सल में अच्छे नतीजे मिले तो उनका भरोसा बढ़ा और उन्होंने धीरे-धीरे अपनी बाकी ज़मीन को भी इस खेती पद्धति के तहत लाना शुरू कर दिया।

एक बीघा से शुरू हुआ प्रयोग

बुद्धि राम बताते हैं कि साल 2018 में उन्होंने पालमपुर में प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण लिया था। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने पहले छोटे स्तर पर इसे आजमाने का फैसला किया। उन्होंने 1 बीघा ज़मीन में गेहूं, चना और सरसों की फ़सल लगाई। इन फ़सलों से मिले परिणामों ने उन्हें काफी उत्साहित किया। इसके बाद उन्होंने तय किया कि सिर्फ़ एक बीघा तक सीमित रहने के बजाय अपनी ज्यादा ज़मीन पर इस तरीके को अपनाया जाए।

आज बुद्धि राम की कुल 16 बीघा ज़मीन है, जिसमें करीब 15 बीघा क्षेत्र में प्राकृतिक खेती की जा रही है। यानी जिस प्रयोग की शुरुआत एक छोटे से हिस्से से हुई थी, वह अब लगभग पूरी खेती तक पहुंच चुका है।

पीला रतुआ से खेतों को बचाने का अनुभव

बुद्धि राम के गांव और आसपास के इलाकों में पीला रतुआ जैसी समस्या किसानों के लिए चिंता का कारण रही है। लेकिन उनके खेतों में इस बीमारी का असर नहीं पहुंचा। यही बात आसपास के किसानों के लिए सबसे ज्यादा हैरानी वाली रही।

बुद्धि राम का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनके खेतों में फ़सलों की सेहत बेहतर हुई है। उनके खेतों में पीला रतुआ की समस्या नहीं पहुंची, जबकि आसपास के क्षेत्रों में किसान इस बीमारी को लेकर परेशान रहे। इसी वजह से अब आसपास के किसान उनके खेतों को देखकर प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी लेने लगे हैं।

पीला रतुआ के बीच प्राकृतिक खेती बनी सहारा, बुद्धि राम ने खेतों में दिखाया कमाल

अलग-अलग फ़सलों पर भी किया प्रयोग

बुद्धि राम ने प्राकृतिक खेती को सिर्फ़ गेहूं तक सीमित नहीं रखा। वे अपने खेतों में मक्का, चना, सरसों, गोभी, टमाटर, शिमला मिर्च, मटर, प्याज, अदरक और मेथी जैसी अलग-अलग फ़सलें उगा रहे हैं। इस तरह एक ही खेत में अलग-अलग फ़सलों को जगह देकर वे अपनी खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके अनुसार इस तरीके से खेत में विविधता बनी रहती है और किसान एक ही फ़सल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता।

उनके खेतों में प्राकृतिक खेती के तहत उगाई जा रही फ़सलों को देखकर गांव के दूसरे किसान भी प्रभावित हो रहे हैं।

पशुओं के लिए भी उगा रहे बरसीम

बुद्धि राम अपनी खेती में पशुओं की ज़रूरत का भी ध्यान रखते हैं। उन्होंने खेतों में बरसीम की फ़सल उगाई है, जिसकी अब तक सात बार कटाई हो चुकी है। इससे उन्हें अपने पशुओं के लिए चारा भी मिल रहा है। यानी खेत से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल वे अपने खेती और पशुपालन दोनों में कर रहे हैं।

इस साल रबी सीजन में उन्हें करीब 20 क्विंटल गेहूं की पैदावार मिली। वहीं आगे की फ़सल के लिए उन्होंने 33 किलोग्राम मक्की के बीज की बिजाई की है।

शुरुआत में नहीं मिला हर किसी का साथ

बुद्धि राम जब प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहे थे, तब सभी लोग उनके फैसले से सहमत नहीं थे। कुछ साथी किसानों और गांव के लोगों ने उन्हें इस तरीके को अपनाने से रोकने की कोशिश भी की।

लेकिन बुद्धि राम अपने फैसले पर कायम रहे। उन्होंने पहले अपने खेत में प्रयोग किया और परिणाम सामने आने के बाद ही दूसरों को इसके बारे में बताना शुरू किया। आज स्थिति ये है कि उनके आसपास के किसान खुद उनके खेतों में आकर फ़सलों को देख रहे हैं और प्राकृतिक खेती अपनाने में रुचि दिखा रहे हैं।

किसानों को साथ लेकर आगे बढ़ने की कोशिश

बुद्धि राम की कोशिश सिर्फ़ अपनी खेती तक सीमित नहीं है। वे आसपास के किसानों को भी प्राकृतिक खेती से जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने खेतों में दिखाई देने वाले परिणाम दूसरे किसानों को दिखाते हैं और उन्हें इस पद्धति के बारे में बताते हैं।

उनका मानना है कि अगर किसान खुद खेत में इसका असर देखेंगे, तो उन्हें भरोसा करना आसान होगा। यही वजह है कि उनके खेत अब आसपास के किसानों के लिए एक तरह का उदाहरण बन गए हैं।

पीला रतुआ के बीच प्राकृतिक खेती बनी सहारा, बुद्धि राम ने खेतों में दिखाया कमाल

खेतों से निकली एक नई उम्मीद

बुद्धि राम की कहानी ये बताती है कि खेती में बदलाव के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की ज़रूरत नहीं होती। उन्होंने एक बीघा ज़मीन से शुरुआत की, परिणाम देखे और फिर धीरे-धीरे अपनी पूरी खेती में प्राकृतिक खेती को अपनाया।

आज उनकी खेती में कई तरह की फ़सलें हैं, लागत पहले की तुलना में कम है और आमदनी में भी बड़ा फर्क देखने को मिला है। सबसे ख़ास बात ये है कि उनके खेतों ने आसपास के किसानों को भी सोचने और बदलाव की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।

बुद्धि राम का अनुभव दिखाता है कि अगर किसान किसी तरीके को समझकर, खुद प्रयोग करके और उसके नतीजे देखकर आगे बढ़े, तो खेती में बदलाव संभव है। उनके लिए प्राकृतिक खेती अब सिर्फ़ एक तरीका नहीं, बल्कि खेत, मिट्टी और फ़सल को बेहतर बनाने की दिशा बन चुकी है।

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