कम वर्षा और पथरीली जमीन में गन्ने की सफ़ल खेती, हमीरपुर के किसान ललित कालिया ने बदली धारणा

ललित कालिया ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर यह साबित किया है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन संभव है। उन्होंने मात्र 18 मरले भूमि पर गन्ने की खेती की और पहले ही सीजन में करीब 70 किलोग्राम शक्कर तैयार कर ली।

जिला हमीरपुर में जहां कम वर्षा और पथरीली जमीन के कारण पारंपरिक रूप से गन्ने की खेती मुश्किल मानी जाती थी, वहीं अब प्राकृतिक खेती के जरिए इस सोच को चुनौती मिल रही है। विकास खंड बमसन के गांव हरनेड़ के प्रगतिशील किसान ललित कालिया ने सीमित संसाधनों में गन्ने की सफल खेती कर एक नई मिसाल पेश की है।

प्राकृतिक खेती से बदली तस्वीर

ललित कालिया ने प्राकृतिक खेती को अपनाकर यह साबित किया है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन संभव है। उन्होंने मात्र 18 मरले भूमि पर गन्ने की खेती की और पहले ही सीजन में करीब 70 किलोग्राम शक्कर तैयार कर ली। खास बात यह रही कि उन्होंने पूरी फसल बिना किसी सिंचाई के उगाई, जो इस क्षेत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

कम वर्षा और पथरीली जमीन में गन्ने की सफ़ल खेती, हमीरपुर के किसान ललित कालिया ने बदली धारणा

चुनौतियों के बीच संतोषजनक उत्पादन

हालांकि उनकी आधी फसल जंगली सूअरों के कारण नष्ट हो गई, इसके बावजूद उन्हें संतोषजनक उत्पादन प्राप्त हुआ। यह प्रयोग दर्शाता है कि प्राकृतिक खेती न केवल लागत कम करती है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी टिकाऊ साबित हो सकती है।

गांव में बढ़ रही प्राकृतिक खेती की ओर रुचि

ललित कालिया ने बताया कि उन्होंने कुछ वर्ष पहले प्राकृतिक खेती की शुरुआत की थी। आत्मा परियोजना और सरकारी प्रोत्साहन के चलते अब गांव हरनेड़ के करीब 52 परिवार इस पद्धति से जुड़ चुके हैं। ये किसान गेहूं, मक्की के साथ-साथ मोटे अनाज और दलहनी फसलों की खेती भी प्राकृतिक तरीके से कर रहे हैं।

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परंपरा और नवाचार का संगम

ललित कालिया का कहना है कि पहले इस क्षेत्र में गन्ने की खेती की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन उन्होंने अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह प्रयोग किया। फसल तैयार होने के बाद उन्होंने खुद गन्ने की पेराई कर शक्कर तैयार की। उन्होंने यह भी बताया कि गन्ने की फसल 5 से 7 वर्षों तक बिना दोबारा बोए भी खेत में बनी रह सकती है, जिससे लागत में कमी आती है।

पारंपरिक बीजों के संरक्षण पर जोर

ललित कालिया पारंपरिक बीजों के संरक्षण के लिए भी सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। उनका मानना है कि ये बीज अधिक पौष्टिक होते हैं और बदलते मौसम के अनुकूल बेहतर ढंग से टिके रहते हैं।

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प्रशासन का समर्थन

उपायुक्त हमीरपुर गंधर्वा राठौड़ ने बताया कि प्रदेश सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयासरत है। आत्मा परियोजना के माध्यम से जिले में सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं और किसान तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से उगाई गई फसलों की गुणवत्ता बेहतर और अधिक पौष्टिक होती है, जिससे किसानों की आय में भी सुधार हो रहा है। हमीरपुर के इस छोटे से गांव में किया गया यह प्रयोग न केवल स्थानीय किसानों के लिए प्रेरणा है, बल्कि यह दिखाता है कि सही तकनीक और सोच के साथ सीमित संसाधनों में भी कृषि को लाभकारी बनाया जा सकता है।

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