डायनामिक डीएम हीरा लाल, जिन्होंने जनसहयोग से बदली बांदा की तस्वीर

डॉ. हीरा लाला 2018 में बांदा जिले में डीएम के रूप में गए और वहां उन्होंने अपने शासन काल में जल सरंक्षण, पेड़ लगाओं, पेड़ जियाओ अभियान चलाए और तालाबों पुनर्निमाण का काम करवाया।

जनप्रतिनिधि या जनता का सेवक जैसे शब्द आपने नेताओं ओर अधिकारियों के मुंह से सुने तो बहुत बार होंगे, मगर एक ऐसा अधिकारी है जिसने इस शब्द को जिया है और हकीकत में जनता का सेवक और साथी बनकर उनकी ज़िंदगी बदली है। जी हां, हम बात कर रहे हैं आइएएस अधिकारी डॉ. हीरा लाल की। वो पहली बार जब उत्तर प्रदेश के बांदा जिले पहुंचे, तो पानी की कमी वहां की सबसे बड़ी चुनौती थी। उन्होंने इस समस्या का समाधान निकाला और वो भी लोगों की मदद से। जनसहयोग की बदौलत ही उन्होंने जिले में पेड़ लगाओ, पेड़ जियाओ अभियान और मेड़बंदी जैसे प्रयास शुरू किए। इन सबने बांदा की तस्वीर ही बदल दी। उन्होंने दिखा दिया कि लोगों की मदद से कैसे सुशासन चलाया जाता है और इससे कैसे किसी जिले की तरक्की हो सकती है। किसान के बेटे से डायनामिक डीएम बनने तक की डॉ. हीरा लाल की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है और उनके शासन का तरीका हर अधिकारी के लिए एक मिसाल है। अपनी इस यात्रा और अनुभवों के बारे में उन्होंने विस्तार से चर्चा की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली के साथ।

लोगों के सहयोग से चलाया सुशासन

डॉ. हीरा लाला 2018 में बांदा जिले में डीएम के रूप में गए और वहां उन्होंने अपने शासन काल में जल सरंक्षण, पेड़ लगाओं, पेड़ जियाओ अभियान चलाए और तालाबों पुनर्निमाण का काम करवाया। खास बात ये रही कि उन्होंने ये सारे काम वहां के लोगों की मदद से ही किया यानी जनसहयोग से। अपने सफर के बारे में हीरा लाल बताते हैं कि वो बस्ती जिले के एक गांव से आते हैं और उनका बचपन काफी संघर्ष में बीत है। गांव में रहे हैं तो उन्हें वहां कि समस्याओं की अच्छी समझ है और ये भी पता है कि वहां काम कैसे करना है। वो बताते हैं कि पुराने ज़माने में लोग खास मौकों पर एक-दूसरे की मदद करते थे यानी जनसहभागिता थी, लेकिन अब ये चीज़ खत्म हो चुकी है। उनका मानना है कि विकसित देश के लिए इस पुरानी पंरपरा को फिर से जीवित करने की ज़रूर है, उनके हिसाब से जनसहयोग और सहभागिता में बहुत ताकत होती है। हीरा लाल का मानना है कि कोई बड़ा काम करने के लिए पद, पावर और पैसा नहीं, ब्लकि अच्छी नीयत, सोच और विजन होना चाहिए। साथ ही कुछ कर गुज़रने की दीवानगी भी होनी चाहिए।

पानी बचाओ और पेड़ जियाओ अभियान

डॉ. हीरा लाल बताते हैं कि बांदा जिले में बहुत से डीएम आए और जल बचाव अभियान चलाया, मगर कुछ फ़ायदा हुआ नहीं। क्योंकि ज़मीनी स्तर पर लोगो को ये नहीं बताया गया कि क्या करना है और कैसे करना है। मगर जब वो वहां गए तो उन्होंने जनता से कहा कि 50 साल से जो समस्या वो झेल रहे है उसका समाधान उन्हें खुद करना होगा। इसके लिए उन्होंने जनता से बरसात का पानी बचाने की अपील की और लोगों को ट्रेनिंग दी कि बिना पैसे के कैसे पानी बचाया जा सकता है। साथ ही सूख चुके तालाब-कुओं को फिर से भरने के लिए उन्होंने एक नारा दिया ‘कुआं-तालाब में पानी लाएंगे बांदा को खुशहाल बनाएंगे।’ फिर कुए की सफ़ाई करवाई, जो खऱाब थे उनकी मरम्मत करवाई, मिट्टी जमे तालाब को फिर से खुदवाया, मेड़बंदी करवाई। इन तरीकों से धीरे-धीरे जमीन के पानी का स्तर बढ़ने लगा। जिससे किसानों को पानी मिलने लगा और एक की जगह वो दो फसल उगाने लगे। जिससे क्रॉप प्रोडक्टिविटी 18% बढ़ गई। डॉ. हीरा लाल कहते हैं कि पानी लोगों ने बचाया, उन्होंने सिर्फ तरीका बताया। पेड़ जियाओ अभियान के बारे में वो कहते हैं कि वृक्षारोपण अभियान के तहत हर साल नए पेड़ तो बहुत लगते थे, लेकिन वो बच नहीं पाते थे, तो इसका समाधान निकालने के लिए उन्होंने पेड़ जियाओ अभियान चलाया। इसके लिए उन्होंने एक कार्यक्रम रखा और लोगों को तोहफे के रूप में पौधे बांटे। इसके पीछे मकसद ये था कि उपहार में मिली चीज़ से लोगों को लगाव होता है तो वो उस पौधे की अच्छी तरह देखभाल करेंगे और उसे मरने नहीं देंगे। इसके अलावा उन्होंने मंदिर में भी पौधे बंटवाएं और पुजारी को कहा कि प्रसाद के रूप में लोगों को पौधे दें। यही नहीं जो लोग घर को हरा-भरा रखते थे हीरा लाला उनके घर जाकर चाय पीते और अखाबर में फोटो छपवाते थे जिससे दूसरे लोग भी प्रेरित होने लगे।

डायनमिक डीएम किताब

डॉ. हीरा लाल का मानना है कि हमारे पास जो भी ज्ञान है उसका डॉक्यूमेंटेशन ज़रूरी है ताकि आगे वाली पीढ़ी भी उसका फ़ायदा उठा सके। वो कहते हैं कि अब तक उन्होंने जो भी काम किया या तरीके आज़माए कुछ साल बाद शायद याद न रहे, इसलिए अपने हर काम को उन्होंने एक किताब के लिख गिया। उनकी किताब का नाम है ‘डायनमिक डीएम’। ये किताब हिंदी, इंग्लिश और गुजराती भाषा में है और बेस्ट सेलिंग बुक है। जहां तक किताब के नाम का सवाल है तो वो बताते हैं कि बांदा की जनता ने ही उनके काम और व्यक्तित्व को देखते हुए उन्हें ये नाम दिया था, इसलिए किता का नाम उन्होंने डायनामिक डीएम रखा।

पहले खुद करते हैं काम

आमतौर पर अधिकारी लोगों को हर तरह की नसीहतें देते हैं, मगर खुद वैसा नहीं करते हैं, मगर हीरा लाल उनसे बिल्कुल विपरित है। वो कहते हैं कि कोई भी काम वो पहले खुद करते हैं और उसके बाद लोगों से करने के लिए कहते हैं। इससे लोग भी प्रेरित होते थे कि जब डीएम साहब कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं। उनका मानना है कि लोग सिर्फ कहने से नहीं समझते। पहले खुद करों तो लोग खुद ब खुद वो काम करेंगे। वो इस बात से भी तस्दीक नहीं रखते कि गांव के लोगों की मानसिकता का बदलना या उन्हें समझाना बहुत चुनौतीपूर्ण है, बल्कि वो कहते हैं कि अगर तर्कपूर्ण तरीके से लोगों को समझाया जाए तो वो आसानी से समझ जाते हैं, तो कहीं बदलाव लाने के लिए अधिकारियों को वहां की जनता को बात समझाने का तरीका पता होना चाहिए। जैसे एक बार बांदा जिले में वोटिंग प्रतिशत बढ़ाना था तो उन्होंने पहले पता लगाया कि पंचायत चुनाव में कहां-कहां कितनी वोटिंग हुआ, इसमें पता चला कि दो गांवों में 90 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। तो उन्होंने दूसरे गांव के अधिकारियों को कहा कि पता करें कि फलां गांव में इतनी वोटिंग कैसे हुई और वहां हुई है तो आपके गांव में क्यों नहीं हो सकती। बांदा की छवि को सुधारना है तो लोगों से कहा कि उन्हें वोटिंग बढ़ानी हो साथ ही ये देश सेवा है तो एक पॉज़िटिव सोच को बढ़ावा दिया और असर भी दिखा। उस बार बांदा में वोटिंग प्रतिशत बढ़ा। वो साफ कहते हैं वो कहते हैं लोगों में दिक्कत नहीं है, बल्कि शासन करने वाले लोगों में समस्या है। बड़ी कुर्सियों पर बैठकर अपने हिसाब से नहीं आम जनता के हिसाब से यदि सोचेंगे और उनके हिसाब से चीज़ों में बदलाव करेंगे तो काम आसान हो जाएगा, मगर ये काम एसी कमरे में बैठकर नहीं होगा, इसके लिए बाहर निकलकर लोगों से मिलना होगा और उनसे बात करनी होगी और उन्हें एहसास दिलाना होगा कि वो खुद भी उनकी तरह ही है। हीरा लाला कहते हैं कि वो जब भी लोगों के बीच जाते तो कहते हैं कि मैं किसान का बेटा हूं, तो लोगों को लगता है कि ये हमारे बीच का ही आदमी है। अच्छा शासन चलाने के लिए आम जनता को साथ लेकर चलना होता है।

ग्रीन इलेक्शन का कॉन्सेप्ट

जलवायु परिवर्तन से पूरी दुनिया परेशान है और इसका असर अब साफ दिखने लगा है। बिन मौसम बरसात और दिन ब दिन बढ़ते तापमान ने सबको परेशान कर रखा है। अगर इसे रोकने के लिए जल्द ही प्रयास नहीं किया गया तो इंसानों को जीना दूभर हो जाएगा। डॉ. हीरा लाला ने इस दिशा में एक छोटा सा प्रयास करते हुए चुनावों के दौरान होने वाले कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए ग्रीन इलेक्शन का कॉन्सेप्ट लेकर आए। हालांकि वो कहते हैं कि चुनाव आयोग की गाइडलाइन में इसका ज़िक्र है, मगर इसे फॉलो कोई नहीं करता है। उन्होंने चुनाव के दौरान प्लास्टिक के इस्तेमाल को प्रतिबंधित करके बायोडिग्रेडेबल मटीरियल का इस्तेमाल किया और लोगों के बीच पौधे का वितरण करवाया। जिससे पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़े और लोग ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाए ताकि कार्बन उत्सर्जन को कुछ हद तक कम किया जा सके। वो बताते हैं कि पेड़ जियाओ अभियान चलाया, पानी बचाओ अभियान, प्लास्टिक फ्री बांदा का जो अभियान चलाया गया वो सब पर्यावरण सरंक्षण की दिशा में उठाया गया ही एक कदम था।

मॉडल गांव का कॉन्सेप्ट

डॉ. हीरा लाल ने मॉडल गांव का कॉन्सेप्ट दिया यानी गांव में रहकर ही कैसे उसका विकास किया जा सकता है। वो कहते हैं कि गांव के विकास के बिना देश का विकास संभव नहीं है। गांव का विकास थोड़ा हुआ है, मगर जितना होना चाहिए उतना नहीं हुआ। इसकी वजह ये है कि पढ़े-लिखे क्षमतावान लोग एक बाहर गांव से निकलने के बाद वहां से रिश्ता तोड़ लेते हैं। मगर वो खुद गांव से अभी तक जुड़े हैं और लोगों को भी वहीं रहकर विकास की सलाह देते हैं, जैसे वो गांव के किसानों और महिलाओं को ट्रेनिंग दिलवाते हैं ताकि वो बेहतर तरीके से खेती करके अपने जीवन स्तर में सुधार ला सकते। एफपीओ के कॉन्सेप्ट को बढ़ावा देते हैं।

हीरा लाल का मानना है कि गांव की तकदीर बदलने के लिए किसानों को भी बदलाव को अपनाना होगा नई चीज़ें सीखनी होगी, खेती में नई तकनीक को अपनाना होगा और किसान की तरह नहीं एक बिज़नेसमैन की तरह खेती के बारे में सोचना होगा तभी वो आज के समय में खेती से अच्छी आमदनी प्राप्त करके अपने जीवन स्तर में सुधार ला सकते हैं। उन्हें मल्टीलेयर, मल्टीक्रॉपिंग जैसी तकनीक को भी अपनाना होगा, क्योंकि दिन ब दिन खेती योग्य ज़मीन कम हो रही है

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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