अब वही भारतीय मसाला कंपनी यूरोप में राज करेगी,जो Digital Traceability और Green Certification में आगे होगी

हाल ही में दक्षिण भारत में Consulate General of the Netherlands और विश्व मसाला संगठन (WSO) ने एक बड़ा सेमिनार किया। विषय था। “Sustainable Spice Value Chain” यानी टिकाऊ मसाला चेन। यूरोप और भारत के जानकारों ने साफ कहा कि भारतीय मसाला कंपनियों के लिए अब नियम बदल चुके हैं।

दुनिया भर में भारतीय मसालों (Indian Spice Companies) की धाक है। काली मिर्च हो या हल्दी, इलायची हो या धनिया, हर घर की रसोई से लेकर मिशेलिन स्टार रेस्टोरेंट तक, भारतीय मसालों की ख़ुशबू बिखरती है। लेकिन अब वो जमाना बदल गया है। अब विदेशी खरीदार सिर्फ ‘तेज़’ और ‘तीख़ा’ नहीं देखते, बल्कि पूछते हैं कि ये मसाला किस खेत में उगा? किसान सुरक्षित है? पर्यावरण को कितना नुकसान हुआ?

हां, आपने सही सुना। अब ग्लोबल मसाला मार्केट  में ‘Taste’ से ज्यादा ‘Sustainability’ और ‘Traceability’ ज़रूरी हो गई है। यानी, मसाला दाने-दाने का हिसाब देने वाला होना चाहिए।

हाल ही में दक्षिण भारत में Consulate General of the Netherlands और विश्व मसाला संगठन (WSO) ने एक बड़ा सेमिनार किया। विषय था। “Sustainable Spice Value Chain” यानी टिकाऊ मसाला चेन। यूरोप और भारत के जानकारों ने साफ कहा कि अब नियम बदल चुके हैं।

 यूरोप की सख्ती, भारत की चुनौती

यूरोपीय संघ (EU) ने नए कानून लागू किए हैं। अब वहां मसाला बेचना है तो ये बताना होगा:

  • मसाला कहां उगा? (Need to provide your GPS location)
  • उसमें कितनी कीटनाशक दवा छिड़की गई?
  • बच्चों या महिलाओं से कोई जबरन मजदूरी तो नहीं हुई?
  • पैकेट फैक्ट्री से आपके हाथ तक कितना प्रदूषण फैला?

यानी, अब हर मसाला ‘जांचा-परखा’ होना चाहिए। बिना ये सर्टिफिकेट के भारतीय मसालों को यूरोप के बंदरगाह पर ही रोक दिया जा सकता है।

 भारत ने सीखा सबक- 35 हजार किसान जुड़े

Spices Board of India ने इस चुनौती देखकर पहले ही कमर कस ली थी। साल 2019 में “नेशनल सस्टेनेबल स्पाइसेस प्रोग्राम (NSSP)” शुरू किया गया। अब इससे 35,000 से अधिक किसान जुड़ चुके हैं। ये किसान मिर्च, जीरा, हल्दी, काली मिर्च जैसी फसलों को टिकाऊ तरीके से उगा रहे हैं।

मसाला बोर्ड के डायरेक्टर बी.एन झा ने बताया, ‘हम 250 से अधिक तरह के मसाले 180 देशों को निर्यात करते हैं। लेकिन अब हम किसानों को Good Agricultural Practices, Modern Pest Management और Clean Processing की ट्रेनिंग दे रहे हैं।’

किसानों को क्या फायदा?

जब कोई किसान टिकाऊ खेती करता है, तो 

  • उसे बेहतर दाम मिलते हैं (यूरोपीय कंपनियां प्रीमियम देती हैं)
  • विदेशी निर्यातक सीधे उसके खेत से खरीदते हैं (बिचौलिए कम)
  • फसल में विषैले रसायन कम होते हैं, सेहत बचती है
  • मिट्टी और पानी भी खराब नहीं होते

नेदरलैंड की कृषि सलाहकार मैरियन वैन शाइक ने कहा,  “भारत को डिजिटल ट्रेसबिलिटी पर ध्यान देना होगा। हर खेप के साथ एक QR कोड होना चाहिए, जिसे स्कैन करते ही पता चले कि मसाला किसान की कौन सी बेटी के हाथों सूखा।”

 नीदरलैंड बना भारत का नया साथी

नीदरलैंड यूरोप का सबसे बड़ा कृषि तकनीकी सहयोगी है। उनके महावाणिज्य दूत इवोट डे विट ने साफ कहा – “हम छोटे किसानों, महिलाओं और किसान समूहों को आगे लाना चाहते हैं। सरकार, कंपनियाँ और संस्थान मिलकर काम करेंगे तो ही बड़ा बदलाव होगा।”

 क्या होगा आगे?

आने वाले 5 सालों में वही भारतीय मसाला कंपनी दुनिया में राज करेगी, जो डिजिटल ट्रेसिबिलिटी और ग्रीन सर्टिफिकेशन में सबसे आगे होगी। अब ‘जैविक’ (ऑर्गेनिक) काफी नहीं, अब ‘पारदर्शी’ (Traceable) ज़रूरी है।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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