इंडिया का पहला AI-Based Basmati Paddy Survey Project हुआ लॉन्च, 40 लाख हेक्टेयर ज़मीन होगी कवर

Experts का मानना है कि सरकार अब बासमती के Geographical Indication (GI) क्षेत्र की पूरी क्षमता का दोहन करने की तैयारी कर रही है। GI क्षेत्र तो पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में 60 लाख हेक्टेयर से अधिक में फैला है। लेकिन अब तक इसका सही आकलन नहीं हो पाया था।

बासमती चावल (Basmati Rice), जिसकी सुगंध पूरी दुनिया में मशहूर है, अब एक नए तकनीकी क्रांति से गुजर रहा है। केंद्रीय वाणिज्य राज्य मंत्री जितिन प्रसाद (Union Minister of State for Commerce Jitin Prasada) ने पिछले हफ्ते भारत के पहले AI-आधारित बासमती धान सर्वेक्षण प्रोजेक्ट (India’s First AI-Based Basmati Paddy Survey Project-2026-2028) का शुभारंभ किया। ये परियोजना कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) की ओर से लागू की जा रही है।

5 लाख से ज़्यादा किसानों से सीधा कॉन्टेक्ट

सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत लगभग 40 लाख हेक्टेयर जमीन को कवर किया जाएगा। इसमें 1.50 लाख से अधिक जमीनी जांच बिंदुओं से डेटा जुटाया जाएगा और 5 लाख से अधिक किसानों से सीधा संपर्क किया जाएगा।

Main Objective हैं:

  •   फसल का सटीक अनुमान लगाना
  •   विभिन्न किस्मों की पहचान करना
  •   किसानों को वैज्ञानिक सलाह देना
  •   निर्यात की बेहतर योजना बनाना

बिजनेस में पॉजिटिव बातचीत : क्या हो रहा है?

कुछ लोगों को ये लग सकता है कि मौजूदा बासमती खेती (लगभग 21 लाख हेक्टेयर) से ये टारगेट बड़ा है, लेकिन इसे निगेटिव न देखकर मौके के रूप में देखना चाहिए।

एक्सपर्ट्स् का मानना है कि सरकार अब बासमती के Geographical Indication (GI) क्षेत्र की पूरी क्षमता का दोहन करने की तैयारी कर रही है। GI क्षेत्र तो पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में 60 लाख हेक्टेयर से अधिक में फैला है। लेकिन अब तक इसका सही आकलन नहीं हो पाया था।

AI तकनीक की मदद से अब हर इंच जमीन का सटीक डेटा तैयार होगा। इससे उन क्षेत्रों की पहचान हो सकेगी जहां बासमती उगाई जा सकती है, लेकिन न तो आंकड़े थे और न ही सरकारी मदद।

सबका साथ, सबका विकास

इंडियन राइस एक्सपोर्टर्स फेडरेशन (IREF) के महानिदेशक विनोद कौल ने भी पॉजिटिव संदेश दिया है। उन्होंने कहा, ‘हम APEDA से कॉन्टेक्ट कर सहयोग करने की योजना बना रहे हैं। सटीक आंकड़े केवल व्यवस्थित फसल सर्वे से ही मिल सकते हैं।’

कौल का एक बेहतरीन सुझाव भी है-सर्वे रिपोर्ट दो भागों में बने:

  1. GI क्षेत्र में उगने वाली प्योर बासमती
  2. GI क्षेत्र के बाहर उगने वाली बासमती किस्में (जो कानूनी तौर पर बासमती नहीं कहला सकतीं, लेकिन किसानों की आमदनी का जरिया हैं)

इससे हर किसान को उसकी जमीन की वास्तविक पहचान मिलेगी और बाजार में पारदर्शिता आएगी।

राज्यों के लिए संभावनाएं

मध्य प्रदेश का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लेकिन इस AI सर्वे से Just and Scientific तरीके से ये साबित हो सकता है कि मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में बासमती के लिए उपयुक्त मिट्टी और मौसम है या नहीं। ये सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं, बल्कि अवसरों की पहचान का वैज्ञानिक ज़रिया बन सकता है।

फंडिंग: बासमती एक्सपोटर्स का योगदान

इस प्रोजेक्ट की फंडिंग बासमती एक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (Basmati Export Development Foundation) के फंड से हो रही है। BEDF के लिए APEDA निर्यातकों से प्रति टन केवल 70 रुपये शुल्क लेता है। ये राशि सीधे किसानों और सर्वेक्षण के विकास में लगाई जा रही है। ये एक सराहनीय सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल है।

आगे का रास्ता

पहले जो सर्वे बंद हुए (2024 के बाद), वे शायद अपनी सीमाओं के कारण बंद हुए। लेकिन अब AI, मशीन लर्निंग और बड़े डेटा का जमाना है। APEDA ने एक नई शुरुआत की है, पारदर्शी, वैज्ञानिक और सटीक।

 

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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