पंजाब के सरहदी ज़िले फिरोज़पुर के गांव तूत के निवासी लखविंदर सिंह आज इलाके के अग्रणी किसानों में से एक हैं। हालांकि, उनका खेती का सफ़र काफी दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है। शुरुआती दौर में उनके खेतों में बेर का बाग हुआ करता था, जिसे उन्होंने 1998 में लगाया था। लेकिन बाद में समय की मांग को देखते हुए उन्होंने बाग को हटाकर सब्जियों की खेती शुरू की और साल 2015 से वे मुख्य रूप से मिर्च की खेती से जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार, मिर्च की खेती का सफ़र “मिला जुला” रहा है, जहां अच्छे मुनाफे़ के साथ-साथ उन्हें मंदी के दिन भी देखने पड़े।

तीन ‘म’ और किसान का भाग्य
लखविंदर सिंह अपने बड़ों और विशेषज्ञों से सीखी एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात साझा करते हैं। उनका कहना है कि सब्जी की खेती में किसान की किस्मत तब चमकती है जब तीन ‘म’ एक साथ मिलें:
- म: मेहनत: किसान की अपनी मेहनत।
- म: मौसम: प्रकृति का साथ और अनुकूल जलवायु।
- म: मार्किट में फसल का उचित भाव।
वास्तव में, जब ये तीनों चीजें एक साथ मिलती हैं, तभी मिर्च की खेती किसान को खुशी देती है।

मिर्च की खेती के लिए फिरोज़पुर की ‘लो टनल’ तकनीक
फिरोजपुर क्षेत्र पूरे पंजाब में मिर्च की खेती के लिए प्रसिद्ध है। यहां के किसान मौसम के उल्ट जा कर खेती करते हैं। लखविंदर सिंह बताते हैं कि वे नवंबर महीने में ही मिर्च के पौधों की रोपाई कर देते हैं। कड़ाके की ठंड से बचाने के लिए प्लास्टिक शीट (लो टनल तकनीक) का इस्तेमाल किया जाता है। ये प्लास्टिक शीट फसल के ऊपर ही रहती हैं, जबकि पंजाब के बाकी हिस्सों में मिर्च की रोपाई फरवरी में की जाती है। इस शुरुआती तकनीक के कारण फिरोजपुर के किसान फसल को जल्दी बाज़ार में लाते हैं, जिससे अच्छे दाम मिलने की उम्मीद रहती है।
विपणन संबंधी कठिनाइयां: एमएसपी का अभाव
सरकार गेहूं और धान जैसी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करती है, लेकिन सब्जियों के लिए कोई निश्चित दर नहीं है। आज यह 2 रुपये प्रति किलो है तो कल 100 रुपये प्रति किलो हो जाएगी। लखविंदर सिंह बताते हैं कि उन्होंने खुद मिर्च 50 रुपये प्रति किलो के भाव से बेची है। एक निश्चित विपणन प्रणाली के अभाव में किसानों को अक्सर व्यापारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। फिरोजपुर मंडी दोपहर 2 बजे शुरू होती है, जहां से ट्रक गुजरात, मुंबई और कोलकाता जैसे दूरदराज के इलाकों के लिए माल से लदे जाते हैं।

फसल चक्र और खेत की तैयारी
मिर्च की खेती के बाद, लखविंदर सिंह पीआर-126 किस्म की धान को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इसमें कम समय लगता है और अगली मिर्च की फसल के लिए खेत जल्दी तैयार हो जाता है। वे खेत तैयार करने के लिए खाद के साथ-साथ डीएपी और पोटाश का सही मिश्रण इस्तेमाल करते हैं। किस्मों की बात करें तो, उनके क्षेत्र में ‘यूनाइटेड 8307’ (जिसे तेजा-2 भी कहा जाता है) और वीएनआर किस्में ‘साहिबा’ और ‘सुनिधि’ काफी लोकप्रिय हैं। विशेष रूप से, साहिबा किस्म राजस्थान के बाज़ारों में लाल मिर्च के रूप में खूब बिकती है।
प्रसंस्करण इकाइयों की कमी और सरकार से अपेक्षाएं
लखविंदर सिंह कहते हैं कि फिरोज़पुर में मिर्च का इतना बड़ा रकबा होने के बावजूद वहां अब तक कोई “प्रोसेसिंग यूनिट” स्थापित नहीं की गई है। अगर किसानों की मिर्च का दाम मंडी में गिर जाता है, तो उनके पास इसे स्टोर करने या चटनी/सॉस बनाने वाली उद्योगों को बेचने का कोई स्थानीय विकल्प नहीं बचता, जिसके कारण किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
इसी वजह से उनका मानना है कि पंजाब एग्रो को इलाके में अपने दफ्तर और स्टोर खोलने चाहिए, ताकि किसानों को अबोहर या दूर की मंडियों में न जाना पड़े। हालांकि, इस संबंध में उन्होंने विधानसभा स्पीकर और कृषि मंत्री के साथ बैठकें भी की हैं, लेकिन अभी तक कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया है।
कृषि क्षेत्र में जोखिम और घटता क्षेत्रफल
पिछले साल मिर्च की कीमतों में भारी गिरावट आई, जिसके चलते फिरोज़पुर में मिर्च की खेती का रकबा 12,000 एकड़ से घटकर लगभग 5,000-7,000 एकड़ रह गया। कई किसानों को अपनी खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाने पड़े क्योंकि मिर्च की कटाई की लागत (5-7 रुपये प्रति किलो) मिर्च के विक्रय मूल्य से अधिक थी। इसके साथ ही, किसान संघों (FPO) जैसी संस्थाओं में भी निहित स्वार्थों के कारण आम किसान को ज्यादा लाभ नहीं मिल पा रहा है।
सम्मान और उपलब्धियां
अपनी कड़ी मेहनत और आधुनिक तकनीकों को अपनाने की बदौलत लखविंदर सिंह को कई बार सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU) द्वारा विभिन्न प्रतियोगिताओं में पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके अलावा, फिरोज़पुर के डिप्टी कमिश्नर (DC) और कई अन्य सामाजिक संस्थाओं ने भी उन्हें “अग्रणी किसान” के रूप में सम्मानित करते हुए उनकी उपलब्धियों की सराहना की है।

लखविंदर सिंह की कहानी पंजाब के हर उस किसान की कहानी है, जो पारंपरिक खेती छोड़कर कुछ नया करना चाहता है। उनका मानना है कि अगर सरकार केवल बातें करने की बजाय कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करे, तो फिरोज़पुर की मिर्च पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना सकती है।
हालांकि मिर्च की खेती भले ही जोखिम भरी है, लेकिन सही तकनीक और बेहतर विपणन सहयोग के साथ यह किसानों की तकदीर बदलने की क्षमता रखती है। अब समय आ गया है कि प्रशासन किसानों का साथ दे, ताकि खेती एक लाभदायक व्यवसाय बन सके।
इसे भी पढ़िए: Iran And Israel–America War: युद्ध की मार ने कैसे बिगाड़ा भारतीय आम का स्वाद, Mango Export बुरी तरह प्रभावित
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

