विदेश से सीखी grafting technique, अब छत्तीसगढ़ के किसानों की ज़िंदगी बदल रहें हैं मितुल कोठारी

मितुल कोठारी का पॉलीहाउस काफी हाइटेक है जिसकी लगात करीब 3.5 करोड़ रुपए है। उनका पॉलीहाउस FAN-PAD ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी वाला है जिसे हाइटेक ग्रीनहाउस भी बोलते हैं।

आज के दौर में सफ़ल होने के लिए हर क्षेत्र में नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल ज़रूरी है, फिर चाहे वो क्षेत्र खेती-किसानी का ही क्यों न हो। छत्तीसगढ़ के रायपुर के रहने वाले मितुल कोठारी अपने नर्सरी बिज़नेस को आगे बढ़ाने के लिए पिछले 6 सालों से grafting techniques का इस्तेमाल कर रहे हैं। नई-नई तकनीक सीखने के लिए वो लगभग 18 देशों की यात्राएं कर चुके हैं। आज वो रायपुर में एक हाईटेक श्रीजी नर्सरी चला रहे हैं, जहां ग्राफ्टेड सब्ज़ियों के पौधें और फलों की नर्सरी तैयार की जाती है। इसके साथ ही वो स्थानीय महिलाओं को रोज़गार भी दे रहे हैं। अपनी हाइटेक नर्सरी और ग्राफ्टिंग तकनीक के बारे में उन्होंने विस्तार से चर्चा की किसान ऑफ़ इंडिया के संवाददाता सोमेश से।

क्या होती है grafting techniques?

सब्ज़ियों की ग्राफ्टिंग एक हाइटेक तकनीक है, जिसमें एक मजबूत जंगली पौधे (रूटस्टॉक) की जड़ के साथ अधिक उत्पादन वाली फसल (सायन) के पौधे को जोड़ा जाता है। यानी इस तकनीक में दो पौधों को मिलाकर एक पौधा बनता है। इस तकनीक से टमाटर, बैंगन, मिर्च और खीरे की अच्छी फसल मिलती है और उनमें होने वाले मृदा जनित रोगों से छुटकारा मिलता है। साथ ही बेहतर गुणवता वाली फसल मिलती है।

20 साल से चला रहे हैं नर्सरी

विदेशों से नई-नई तकनीक सीखकर उसे अपने देश के किसानों के हित के लिए इस्तेमाल करने वाले छत्तीसगढ़ के मितुल कोठारी पिछले 20 साल से नर्सरी का काम कर रहे हैं। वो कहते हैं कि उनके यहां पपीता की ताइवान रेड लेडी 786 वैरायटी के पौधें तैयार होते हैं, साथ ही कई सब्ज़ियों के पौधे तैयार होते हैं। पिछले 6 सालों से वो सब्ज़ियों की ग्राफ्टिंग के जरिए पौध तैयार कर रहे हैं और किसानों को ग्राफ्टेड टमाटर और बैंगन के पौधे उपबल्ध करा रहे हैं।

कैसे तैयार होते हैं ग्राफ्टेड पौधे?

मितुल कोठारी बताते हैं कि इस तकनीक में रूटस्टॉक की वाइल्ड वैरायटी का इस्तेमाल होता है जिसे सोलेनम टोरवम (Solanum torvum) कहते हैं, इसका उपयोग बैंगन में किया जाता है। इसके अलावा एक रूटस्टॉक वो साउथ कोरिया से आयात करते हैं जिसका इस्तेमाल टमाटर में किया जाता है। उनका कहना है कि रूटस्टॉक जितना मज़बूत होगा, उत्पादन उतना ही अधिक होगा। नया पौधा तैयार करने के लिए वाइल्ड रूटस्टॉक पर सायन जोड़ा जाता है यानी ऊपर का पौधा। इसके लिए वो किसानों की पसंद के पौधे लगाते हैं जिनकी उपज क्षमता अधिक होती है। मितुल कहते हैं कि हर किसान किसी खास कंपनी या वैरायटी का बीज लगाना चाहता है ऐसे में वो उनकी पसंद के पौधे का सायन तैयार करके ग्राफ्टिंग करते हैं। जैसे बाज़ार में सफे़द से लेकर हल्के बैंगनी और हरे रंग के कई तरह के बैंगन उपलब्ध होते हैं, तो ये सब अलग-अलग किस्म के बीज से होते हैं। हर किसान की अपनी एक पसंद होते हैं, तो उनकी पसंद की बीज की पौध तैयार करके ही ग्राफ्टिंग की जाती है। पहले रूटस्टॉक और सायन को अलग-अलग उगाया जाता है और फिर ग्राफ्टिंग के जरिए दोनों को एक साथ जोड़ा जाता है। यानी इस तकनीक में दो तरह के पौधों को जोड़कर एक पौधा तैयार किया जाता है। जंगली पौधे की जड़ और दूसरे पौधे के ऊपरी हिस्से को जोड़कर एक नया पौधा तैयार होता है।

ग्राफ्टिंग के फ़ायदे

मितुल कहते हैं कि आज से कुछ साल पहले जब वो साउथ कोरिया गए थे, तो उन्होंने देखा कि वहां वेजीटेबल ग्राफ्टिंग पर बहुत बड़े लेवल पर काम चल रहा था और वहां की तकनीक देखने के बाद उन्हें समझ आया कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी भी रेतीली है जिससे वहां बैंगन, टमाटर जैसी फसल में उकटा (Wilt) रोग अधिक लगता है, ये मृदा जनित रोग है। इस वजह से 60-65 दिनों में पौधे मरने लगते हैं और किसानों को फसल का बहुत नुकसान होता है। आगे वो बताते हैं कि अब ग्राफ्टिंग तकनीक से फायदा ये हुआ कि इस रोग का प्रकोप बहुत कम या न के बराबर रह गया है, क्योंकि जिस जंगली वैरायटी का रूसस्टॉक इस्तेमाल किया जाता है उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत अधिक है। जिससे अब पौधे नहीं मरते हैं और उत्पादन भी बहुत अधिक होता है जिससे किसानो की आमदनी में इज़ाफा हुआ है।

हाइटेक पॉलीहाउस

मितुल कोठारी का पॉलीहाउस काफी हाइटेक है जिसकी लगात करीब 3.5 करोड़ रुपए है। उनका पॉलीहाउस FAN-PAD ग्रीन हाउस टेक्नोलॉजी वाला है जिसे हाइटेक ग्रीनहाउस भी बोलते हैं। इसमे ऐसे डिवाइस लगे हैं जिससे तापमान को नियंत्रित किया जा सकता हैं, अगर तापमान बढ़ता है तो लगा हुआ पंखा चलने लगता है। उनका कहना है कि इसमें अलग-अलग हिस्से बने हैं, कहीं सायन लगा है, कहीं रुटस्टॉक का उत्पादन हो रहा है तो कहीं ग्राफ्टिंग की जाती है और एक हिस्से में किसानों को देने से पहले पौधों को मज़बूत बनाने का काम किया जाता है यानी पौध की हार्डनिंग की जाती है। उनका मानना है कि पूरे देश में ग्राफ्टिंग वेजीटेबल तकनीक का बहुत स्कोप है, क्योंकि ये इतना लोकप्रिय नहीं है। यदि कोई किसान भाई या उद्यमी इसे शुरू करना चाहते हैं तो वो मितुल कोठारी से संपर्क कर सकते हैं।

सरकार से मदद

ये तकनीक थोड़ी महंगी ज़रूर है, मगर एक बार निवेश के बाद मुनाफ़ा भी अच्छा मिलता है। जहां तक सरकारी मदद का सवाल है तो मितुल बताते हैं कि कि सरकार की राष्ट्रीय एकीकृत बागवानी मिशन के तहत अनुदान मिलता है। साथ ही नर्सरी स्थापित करने में सरकार की ओर से 50 प्रतिशत का अनुदान मिलता है। तो कोई किसान या युवा इस बिज़नेस में आना चाहता है तो उन्हें बड़ी मदद मिलेगी सरकार की ओर से।

अधिक लागत

मितुल कहते हैं कि अगर किसान हाइब्रिड नर्सरी लगाता है तो वैरायटी की सीड के हिसाब से लागत अलग-अलग होती है। मगर ग्राफ्टेड पौध की बाद की जाए तो ये थोड़ी महंगी पड़ती है एक पौध किसानो को 10-12 रुपए में पड़ती है, जिससे उनके प्रति एकड़ खेती का खर्च बढ़ जाता है, मगर इन पौधों से उत्पादन अधिक मिलता है तो मुनाफ़ा भी अधिक होती है जिससे लागत कवर हो जाती है।

किन बातों का रखें ध्यान?

बागवानी फसल और सब्ज़ियों की खेती में पारंपरिक फसल से अधिक मुनाफ़ा होता है, मगर इसके लिए किसानों को कुछ बातों का ध्यान रखना भी ज़रूरी है। मितुल कहते हैं कि किसानों को इस बात का ध्यान रखन चाहिए कि उनके खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था हो और बारिश के समय भी खेत में पानी भरे नहीं। सिंचाई के लिए ड्रिप तकनीक का इस्तेमाल करें। मितुल कहते हैं कि उनकी नर्सरी में तैयार पौधे छत्तीसगढ़ के अलावा महाराष्ट्र और उड़ीसा के किसानों तक भी पहुंच रहे हैं। किसान उनसे सीधा संपर्क करते हैं और वो उन्हें पौध पहुंचाते हैं।

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सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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