हिमाचल, देश का सबसे बड़ा सेब उत्पादक राज्य है। हिमाचल में सालाना 3 से 4 करोड़ पेटी सेब का उत्पादन होता है। हिमाचल के और ज़िलों की तुलना में अकेले शिमला ज़िले में ही सबसे ज़्यादा 80 फ़ीसदी सेब पैदा होता है। शिमला में करीबन 42 हज़ार हेक्टेयर में सेब का उत्पादन होता है। अकेला शिमला है, जहां सेब उत्पादन डेढ़ से ढ़ाई लाख मीट्रिक टन है। हिमाचल के सबसे बड़े सेब उत्पादक राज्य बनने के पीछे हर उस सेब उत्पादक किसान का योगदान है, जो दिन-रात खेत-खलिहानों में लगा रहता है। एक ऐसे ही प्रगतिशील किसान हैं, शिमला के बवाना गाँव के रहने वाले विशाल शांकता।
बवाना गाँव कोटखाई तहसील में पड़ता है। विशाल शांकता हाई डेंसिटी तकनीक से सेब की खेती करते हैं। हाई डेंसिटी तकनीक से उनके उत्पादन में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। ये तकनीक क्या है? कैसे काम करती है? कैसे इस तकनीक के इस्तेमाल से किसान अपनी लागत को कम और आमदनी को बढ़ा सकते हैं, इसपर किसान ऑफ़ इंडिया ने विशाल शांकता से ख़ास बातचीत की।

विशाल शांकता को खेती विरासत में मिली है। 1940 से उनके दादा परदादा खेती करते आए हैं। अब वो खेती की उस विरासत को बड़े स्तर पर ले जाने का काम कर रहे हैं। बचपन से ही खेती-किसानी को करीब से उन्होंने देखा है। लिहाज़ा मिट्टी और खेती के प्रति अपने लगाव को उन्होंने खुद भी चुना और आज वो एक सफल सेब उत्पादक किसान हैं। विशाल शांकता बताते हैं कि उनके क्षेत्र में ज़्यादातर किसान बागवानी कार्यों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में पहले से पारंपरिक तरीके से सेब की खेती होती आई है, लेकिन उन्होंने सेब की खेती को उन्नत बनाने के लिए हाई डेंसिटी तकनीक का इस्तेमाल किया। हाई डेंसिटी तकनीक एक यूरोपियन मेथड है, जिसमें रूट स्टॉक से सेब की खेती की जाती है।
क्या है हाई डेंसिटी तकनीक यानी उच्च घनत्व वाली खेती?
बागवानी में हाई डेंसिटी सिस्टम एक ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक फलदार पौधों का रोपण कर, उससे लगातार कई साल तक क्वालिटी वाली फलों की उपज ली जा सकती है। प्रति इकाई क्षेत्रफल में अधिक से अधिक पौधे लगाए जाते हैं। विशाल शांकता ने बताया कि सेब की हाई डेंसिटी बागवानी करते समय पौधे से पौधे की बीच की दूरी 1 मीटर और पंक्ति से पंक्ति की दूरी ढाई मीटर रखी जाती है।

प्रति हेक्टेयर बढ़ा उत्पादन
विशाल शांकता बताते हैं कि कई युरोपियन और एशियन देशों में सेब की औसत उत्पादकता 50 टन प्रति हेक्टेयर है, जबकि भारत में यह केवल 7 से 8 टन है। हाई डेंसिटी तकनीक अपनाने से उत्पादन क्षमता बढ़ती है। साथ ही लघु सीमांत किसान, जिनके पास कम ज़मीन है, उनके लिए ये तकनीक फ़ायदेमंद है। कम जगह में कई पौधे लगाए जा सकते हैं, जिससे उत्पादन दोगुना और कमाई तिगुनी होती है।
कमाई तिगुनी बढ़ी
विशाल शांकता ने आगे बताया कि जहां पारम्परिक सेब की खेती से केवल करीबन 50 फ़ीसदी ही ए ग्रेड सेब और बाकी 50 फ़ीसदी बी ग्रेड सेब का उत्पादन होता था, हाई डेंसिटी में 90 प्रतिशत से ज़्यादा ए ग्रेड सेबों का उत्पादन होता है। कम ज़मीन में ज़्यादा पेड़ लगाकर ज़्यादा उत्पादन, वो भी क्वालिटी के साथ हासिल कर सकते हैं।
“पारंपरिक खेती में जहां प्रति एकड़ 5 लाख रुपये के आसपास आमदनी रहती थी, वहीं हाई डेंसिटी तकनीक अपनाने से आमदनी का प्रतिशत करीबन 3 गुना बढ़ा। उसी एक एकड़ से 12 से 15 लाख रुपये तक की कमाई होती है।”

विशाल शांकता ने 2019 से सेब की खेती में हाई डेंसिटी तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाना शुरू किया है। वह हर साल पारंपरिक खेती की जगह हाई डेंसिटी तकनीक से सेब की खेती का क्षेत्रफल बढ़ा रहे हैं। पुरानी जड़ों को निकालना, मिट्टी को तैयार करना, मशीनों द्वारा खेतों को तैयार कर हाई डेंसिटी तकनीक को अपनाया जा रहा है। वह 32 बीघे में सेब की खेती कर रहे हैं, जिसमें से 10 बीघे क्षेत्र में उन्होंने पूरी तरह से हाई डेंसिटी तकनीक को अपनाया हुआ है।
कैसे अपनाएं हाई डेंसिटी तकनीक?
वह कहते हैं कि अभी बाकी बची 22 बीघे की ज़मीन पर वो पारंपरिक तरीके से ही सेब की खेती कर रहे हैं। इसका कारण है कि अभी 22 बीघे में सेब के बड़े पौधे लगे हुए हैं। उन्हें अभी काटा नहीं जा सकता। इसलिए ज़रूरी है कि साल दर साल तकनीक को अपनाया जाए ताकि आमदनी निरंतर बनी रहे और कोई आर्थिक दबाव न आए।
इसका फॉर्मूला समझाते हुए विशाल शांकता ने बताया कि पारंपरिक खेती से जहां 30 लाख रुपये का सेब होता था, उन्होंने थोड़ा घाटा झेलते हुए 25 लाख रुपये के ही सेबों का उत्पादन लिया और 5 लाख रुपये तक का बगीचा काट लिया। फिर अगले तीन साल में जब काटे हुए बगीचे से 5 लाख रुपये आने शुरू हुए, तो पारंपरिक खेती में से फिर से 5 लाख रुपये का बागान काट दिए। विशाल शांकता बताते हैं कि इस फॉर्मूले से आपकी आय स्थिर रहेगी और आप कोई बड़ा नुकसान सहे बिना नयी तकनीक भी अपना पाएंगे।

किसानों को दे रहे ट्रेनिंग
विशाल शांकता अपने क्षेत्र के अन्य किसानों को हाई डेंसिटी तकनीक को अपनाने को लेकर प्रोत्साहित कर रहे हैं। वह अपने क्षेत्र के किसानों को सेब की खेती में हाई डेंसिटी तकनीक को कैसे अपनाना है, इसे लेकर ट्रेनिंग भी देते हैं। इसके लिए वो कोई फ़ीस भी चार्ज नहीं करते।
बड़ी संख्या में बाहर से प्लांट मैटेरियल किये जाते हैं आयात
विशाल शांकता आगे बताते हैं कि हाई डेंसिटी तकनीक का प्लांट मैटेरियल बाहर देशों से आयात होता है। भारत में रूटस्टॉक प्लांट मैटेरियल इटली से ही आयात किया जाता है। हालांकि, देश में कई पौध नर्सरी ने रूट स्टॉक उपजाना शुरू कर दिया है, तो आने वाले तीन से चार साल में 20 से 30 फ़ीसदी प्लांट मैटेरियल यहीं उपलब्ध हो जाएगा।
कैसे करें खेत तैयार?
जेसीबी, ट्रैक्टर या छोटे टिलर से खेत की अच्छे से जुताई कर लें। ढाई बाय ढाई फ़ीट का ट्रेंच बना लें। फिर खाद के रूप में गोबर खाद या कोई भी जैविक खाद, जैविक सुपर फॉस्फेट उर्वरक डाल दें। इसके बाद थोड़ी सी रेत डाल दी जाती है। सबको अच्छे से खुरपी की मदद से मिलाया जाता है और फिर प्लांट मैटेरियल को ट्रेंच में लगा दिया जाता है।
कैसी हो मिट्टी?
विशाल शांकता बताते हैं कि चिकनी मिट्टी में हाई डेंसिटी तकनीक से सेब की बागवानी करने से बचें। चिकनी मिट्टी में जड़ें अच्छे से विकसित नहीं हो पाती। दोमट मिट्टी में सेब की अच्छी पैदावार प्राप्त होती है। जहां पर लाल मिट्टी है, उसमें थोड़ी रेत का इस्तेमाल सहित जैविक खाद डालकर अच्छा उत्पादन लिया जा सकता है।

कौन सी किस्म?
हाई डेंसिटी तकनीक में बौनी किस्मों का चुनाव फ़ायदेमंद रहता है। विशाल शांकता ने बताया कि ज़्यादातर लोग रूट स्टॉक में मुख्य तौर पर एम-09 किस्म का इस्तेमाल करते हैं। ये एक बौनी किस्म है। एम-09 रूट स्टॉक में उत्पादन क्षमता सबसे ज़्यादा है। बौनी किस्मों का रखरखाव करना आसान होता है। श्रमिक लागत ज़्यादा नहीं आती। इन बौनी किस्मों के पौधों की ऊंचाई 8 से 10 फ़ीट की होती हैं। इसके अलावा, विशाल शांकता ने हाई डेंसिटी तकनीक में सेब की गाला, किंग रॉट रेड डिलिशियस वैराइटी, स्कारलेट, रैड बिलॉक्स जैसी किस्में लगाई हुई हैं।
पौधों का रखरखाव, लगाएं ट्रेलिस सिस्टम
पौधों को गिरने से बचाने के लिए ट्रेलिस सिस्टम लगाया जाता है। इसमें जमीन से ऊपर लताओं को रस्सियों के सहारे उठा दिया जाता है। ट्रेलिस को नायलॉन और प्लास्टिक की रस्सी, बांस, लकड़ी की मदद से बनाया जाता है। 10 फीट के बांस या लकड़ी के खंभों को कुछ निर्धारित दूरी पर रखकर, उनके बीच में वायर या रस्सी को बांध दिया जाता है। फिर पौधे की उथली जड़ों को इसके सहारे बांध दिया जाता है। इससे पौधे के टूटने का खतरा नहीं रहता।

कितना खर्चा?
विशाल शांकता बताते हैं कि अगर आप पौधा या कहे रूट स्टॉक विदेश से आयात कर रहे हैं तो एक पौधे पर दो हज़ार रुपये तक का खर्चा आता है। इसमें पौधे की 700 रुपये की कीमत से लेकर, रोपाई, ट्रेलिस सिस्टम लगाना शामिल है। इस तरह से एक पौधे पर करीब दो हज़ार रुपये का खर्चा आ जाता है। अगर आप 100 पौधे लगाते हैं तो 2 लाख रुपये का खर्चा आएगा।
वहीं अगर आपको प्लांट मैटेरियल भारत में उपलब्ध हो जाता है तो फिर भी करीबन 1300 रुपये का एक पौधे पर खर्चा आएगा। रूट स्टॉक प्लांट मैटेरियल की मांग बढ़ने लगी है। इस वजह से इनकी बुकिंग पहले से होने लगती हैं। इसलिए आपको पता करते रहना होता है कि ये कब उपलब्ध होंगे।

नयी तकनीकों को अपनाएं
विशाल शांकता कहते हैं कि दुनिया भर में अगर हमको अपनी धाक रखनी है तो हमें अपने कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से खेती की नयी तकनीकों को अपनाना होगा। साथ ही ज़रूरी है धरातल में रहकर काम किया जाए। किसानों को नयी तकनीकों के बारे में जानकारी देने के लिए ट्रेनिंग सेशन से लेकर सेमीनार आयोजित किये जाएं। विशाल शांकता कहते हैं किसानों को वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना ज़रूरी है तभी कामयाबी मिलेगी।
कुछ चुनौतियां
विशाल शांकता आगे बताते हैं जहां जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड जैसे राज्यों में ए ग्रेड सेब की कीमत लगभग 63 रुपये, बी ग्रेड का 44 रुपये और सी ग्रेड का 24 रुपये प्रति किलो दाम मिलता है। उनके क्षेत्र में यही सी ग्रेड सेब 9 रुपये प्रति किलो की दर से बिकता है। एक किलो सेब उत्पादन की लागत लगभग 22 रुपये पड़ती है। इस वजह से किसानों को लागत का पैसा निकालने में मुश्किल होती है। वहीं ए ग्रेड सेब के लिए मार्केट पर निर्भर हैं। दिल्ली, लखनऊ, देहरादून, मुंबई, जयपुर या स्थानीय मंडियों में सेब जाता है।
इसके अलावा, उन्होंने कहा कि हिमाचल में सेब उत्पादक किसानों को लाभ हो, इसके लिए कुछ अहम कदम उठाने की ज़रूरत हैं। मसलन तकनीक से लेकर प्लांट मैटेरियल, कीटनाशकों और उर्वरकों पर सब्सिडी की व्यवस्था होनी चाहिए। वहीं उन्होंने जानकारी दी कि सेब की पैकेजिंग सामग्री पेटी ओर ट्रे पर लगने वाले 18 प्रतिशत जीएसटी को लेकर सेब बागवानों ने प्रदेश सरकार से कार्टन के दाम कम करने की अपील भी की है।
ये भी पढ़ें- बागवानी प्रबंधन: कृषि वैज्ञानिक डॉ. बी.पी. शाही से जानिए फलों के फटने और गिरने की समस्या से कैसे पाएं निजात
सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

ये भी पढ़ें:
- राष्ट्रीय बागवानी मिशन से बदली खेती की तस्वीर, कोरबा में तरबूज की बंपर खेती से किसान बन रहे लखपतिउद्यान विभाग के अनुसार, कोरबा जिले की जलवायु और मिट्टी तरबूज की खेती के लिए बेहद अनुकूल है। वर्तमान में लगभग 650 हेक्टेयर क्षेत्र में तरबूज की खेती की जा रही है।
- जयपुर ग्रामीण में लसोड़े की खेती से किसानों को मिल रही अतिरिक्त आयजयपुर ग्रामीण में लसोड़े की खेती से किसान कम लागत में अच्छी आमदनी कमा रहे हैं और इसे अतिरिक्त आय का ज़रिया बना रहे हैं।
- रायसेन में ‘उन्नत कृषि महोत्सव 2026’ का शुभारंभ: आधुनिक तकनीक, जैविक खेती और किसान सशक्तिकरण पर जोरमहोत्सव का उद्देश्य किसानों को आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और उन्नत कृषि पद्धतियों से जोड़ना है। उद्घाटन के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आधुनिक तकनीक, आधुनिक ज्ञान, आधुनिक अनुसंधान, आधुनिक कृषि पद्धतियां इन सबको आज आपको देखने का, समझने का, सोचने का, सीखने का मौका मिलेगा।
- बेहद गुणकारी है ‘राइस ब्रान ऑयल’, उत्पादन बढ़े तो खाद्य तेलों का आयात भी घटेगाभारत में अभी सालाना क़रीब 250 लाख टन खाद्य तेलों की खपत है। इसमें से हमारा घरेलू उत्पादन क़रीब 80 लाख टन का ही है। बाक़ी दो-तिहाई खपत की भरपाई आयात से होती है। इस साल खाद्य तेलों का आयात 140 लाख टन तक पहुँचने का अनुमान है। देश में पारम्परिक खाद्य तेलों की तुलना में ‘राइस ब्रान ऑयल’ की हिस्सेदारी क़रीब 14 फ़ीसदी ही है।
- रांची में महिला मत्स्य कृषक सशक्तिकरण कार्यशाला से महिलाओं का बढ़ा आत्मविश्वासरांची में आयोजित महिला मत्स्य कृषक सशक्तिकरण कार्यशाला से महिलाओं को मत्स्य पालन के ज़रिए आय बढ़ाने और आत्मनिर्भर बनने का मौका मिला।
- Drones for “Precision” Nutrition: कैसे स्मार्ट छिड़काव, मल्टीस्पेक्ट्रल इमेजिंग और खेत की मैपिंग भारतीय खेती में इनपुट के उपयोग को बदल रहे हैंप्रिसिजन खेती इस समस्या को इनपुट को जरूरत से जोड़कर हल करने की कोशिश करती है। इस काम में ड्रोन महत्वपूर्ण बन रहे हैं क्योंकि वे दो काम साथ कर सकते हैं
- Unseasonal Rain And Hailstorm: उत्तर प्रदेश के CM योगी ने जताई चिंता, सर्वे और मुआवज़े के निर्देशप्रकृति ने एक बार फिर किसानों के सपनों पर पानी फेर दिया है। उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि (Unseasonal Rain and Hailstorm) ने भले ही गर्मी से राहत दे दी हो, लेकिन गेहूं की फसल पर ऐसा कहर बरपाया कि किसानों की उम्मीदें चूर-चूर हो गईं। कई ज़िलों में हुई… Read more: Unseasonal Rain And Hailstorm: उत्तर प्रदेश के CM योगी ने जताई चिंता, सर्वे और मुआवज़े के निर्देश
- Vermicompost Business: जानिए वर्मीकम्पोस्ट बिज़नेस से जुड़े नोएडा के राम पांडे किन बातों का रखते हैं ध्यानवर्मीकम्पोस्ट जिसे केंचुआ खाद भी कहा जाता है, पोषक तत्वों से भरपूर जैविक खाद होती है। जिसे गोबर और केंचुए की मदद से तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में केंचुए बहुत अहम होते हैं। इसलिए केंचुए की सही देखभाल करके बिज़नेस से अच्छा मुनाफ़ा कमाया जा सकता है।
- करनाल दौरे पर डॉ. मांगी लाल जाट ने कृषि अनुसंधान कार्यों की समीक्षा कीडॉ. मांगी लाल जाट ने करनाल में कृषि अनुसंधान की समीक्षा कर जलवायु अनुकूल खेती और नई तकनीकों पर ज़ोर दिया।
- बेबी कॉर्न की खेती से बदली किसानों की तकदीर, युवाओं के लिए बना मुनाफे़ का नया मॉडलपूर्णिया जिले के रानीपतरा के युवा किसान शशि भूषण ने खेती के क्षेत्र में एक नया उदाहरण पेश किया है। जहां अधिकांश किसान अभी भी पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं, वहीं शशि भूषण ने बेबी कॉर्न की खेती अपनाकर यह दिखाया है कि कम समय और कम लागत में भी बेहतर मुनाफ़ा कमाया जा सकता है।
- मध्यप्रदेश सरकार की बड़ी सौगात: Cage Culture Scheme से मछुआरों की कमाई होगी दोगुनी, लास्ट डेट से पहले करें अप्लाईमछुआरों की आय बढ़ाने के लिए Integrated Fisheries Policy 2026 के तहत केज कल्चर योजना (cage culture scheme) शुरू कर दी है।
- कैसे काम करता है किसानों के डिजिटल मित्र ‘एग्रीबॉट्स’? खेती को आसान बनाने वाले Agribotsएग्रीबॉट्स को ही कृषि रोबोट कहा जाता है। ये मूल रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी artificial intelligence पर आधारित रोबोट हैं, जो कृषि प्रथाओं के लिए उपयोगी हैं।
- नौकरी गई तो शुरू किया अंकुरित काजू का व्यवसाय और बन गए सफल कृषि उद्यमीजब दिल में कुछ करने की चाह हो तो रास्ते अपने आप ही बन जाते हैं, ऐस ही कुछ हुआ कुन्नूर के रहने वाले ब्रिजिथ कृष्णा के साथ। नौकरी खोने के बाद भी वह मायूस नहीं हुए और लगातार कुछ नया करने की कोशिश करते रहे। उन्हें एक नया आइडिया निकाला अंकुरित काजू का व्यवयास करने का और कुछ ही समय में यह आइडिया हिट भी हो गया।
- कोरबा में बदल रही खेती की तस्वीर, तिलहन–दलहन फसलों से बढ़ रही किसानों की आयदिलीप कुमार कंवर ने अपनी जमीन पर सूरजमुखी की खेती शुरू की है, जो कम लागत में अच्छी पैदावार देने वाली फसल मानी जाती है।
- छत्तीसगढ़ के खोरसी गांव में गेंदे की खेती से बदल रही आदिवासी महिलाओं की ज़िंदगीछत्तीसगढ़ के खोरसी गांव में गेंदे की खेती से आदिवासी महिलाएं अच्छी आमदनी कमा रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
- Kharif Season 2026 के लिए NBS सब्सिडी तय, किसानों को अब मिलेगी सस्ती खादKharif Season 2026 (1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026) के दौरान फॉस्फेटिक और पोटाशिक (Phosphatic and Potassic) खादों पर पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) की दरें तय कर दी गई हैं.
- पॉलीहाउस तकनीक: वर्टिकल फ़ार्मिंग से कैसे मिलेगा अधिक उत्पादन, क्या है इसका सही तरीका? जानिए एक्सपर्ट सेबुंदेलखंड की सख्त ज़मीन पर पॉलीहाउस तकनीक से खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें बांदा कृषि विश्वविद्यालय अहम भूमिका निभा रहा है। मुश्किल परिस्थितियों में सब्ज़ियों का उत्पदान कैसे पूरे साल किया जाए, इसके लिए विश्वविद्यालय ने एक प्रोजेक्ट के तहत 200 स्क्वायर मीटर के छोटे एरिया में कई पॉलीहाउस लगाए हुए हैं। जानिए सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पॉलीहाउस तकनीक से खेती के बारे में विस्तार से।
- Backyard Poultry Farming: पोल्ट्री विशेषज्ञ डॉ. एल.सी. वर्मा से जानिए बैकयार्ड मुर्गी पालन का गणितअगर पोल्ट्री फ़ार्मिंग की बात करें तो बैकयार्ड मुर्गी पालन व्यवसाय कई मानकों में फ़ायदेमंद है। खेती करते हुए बैकयार्ड मुर्गी पालन व्यवसाय भी शुरू किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र मऊ के प्रमुख और पोल्ट्री विशेषज्ञ डॉ. एल.सी. वर्मा से किसान ऑफ़ इंडिया की विशेष बातचीत।
- ढकरानी कृषि विज्ञान केंद्र में नई फ़सल किस्में तैयार, किसानों में बढ़ी उत्सुकताढकरानी कृषि विज्ञान केंद्र में वैज्ञानिकों द्वारा तैयार नई फ़सल किस्में किसानों को बेहतर उत्पादन और कम नुकसान का विकल्प दे रही हैं।
- खेतों में शी-टेक: कैसे ग्रामीण महिलाएं ड्रोन और डेटा अपना रही हैं?खेतों में शी-टेक से ग्रामीण महिलाएं तकनीक अपनाकर खेती के फैसले ले रही हैं, वहीं FPO पहल उन्हें सशक्त और कृषि को समावेशी बना रही है।





















