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कर्नाटक राज्य के बीजापुर ज़िले के अलमेल गांव के एक किसान स्वर्गीय सोमन्ना सिद्दप्पा भसागी की कहानी आज हर किसान के लिए प्रेरणा बन चुकी है। मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प के बल पर उन्होंने अपने जीवन में ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसे आज लोग मिसाल के रूप में देखते हैं। उन्होंने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद सूअर पालन को एक सफल और लाभदायक व्यवसाय में बदल दिया। उनकी सोच थी कि मेहनत करने वाला किसान कभी हार नहीं मानता, बस सही दिशा में काम करना ज़रूरी है। आज वही सपना, वही समर्पण उनके बेटे और पूरे परिवार के ज़रिए आगे बढ़ रहा है, जो इस व्यवसाय को और भी ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं।
खेती के साथ शरू किया सूअर पालन
स्व. सोमन्ना भसागी पहले कबाड़ का काम करते थे। लेकिन खेती में कुछ नया करने का सपना उनके मन में हमेशा था। साल 2009 में उन्होंने 2.5 एकड़ ज़मीन खरीदी और गन्ने की खेती शुरू की। उस ज़मीन से उन्हें 40–45 टन प्रति एकड़ उत्पादन मिला। बाद में उन्होंने 6 एकड़ ज़मीन पट्टे पर लेकर खेती जारी रखी, लेकिन फ़सलों के दाम से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगा कि केवल पारंपरिक खेती से परिवार का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। तभी उन्होंने सोचा – “क्यों न कुछ नया किया जाए जो कम लागत में ज़्यादा फ़ायदा दे।” यहीं से उनके मन में सूअर पालन का विचार आया।
सूअर पालन की शुरुआत
उन्होंने बेंगलुरु के हेसरघट्टा स्थित पिग्गरी ब्रीडिंग सेंटर में प्रशिक्षण लिया, जहां उन्हें सूअर पालन के सभी तकनीकी पहलुओं की जानकारी मिली। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने जून 2014 में 20 पिगलेट्स खरीदे और अपने गांव अलमेल में सूअर पालन का काम शुरू किया।
शुरुआत में उन्होंने 60×100 फीट का एक शेड बनाया जिसमें 20 पिगलेट्स के लिए सभी सुविधाएं थीं। बिजली कटौती की समस्या को देखते हुए उन्होंने जनरेटर भी लगवाया। स्वच्छता पर उनका खास ध्यान था — रोज़ शेड की सफाई और पानी से धुलाई होती थी ताकि बीमारियाँ न फैलें।
खेत और सूअर पालन का अनोखा मेल
सोमन्ना भसागी ने अपनी खेती और सूअर पालन को एक-दूसरे से जोड़ा। शेड से निकलने वाले अपशिष्ट को वे खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल करते थे। इससे रासायनिक खादों की ज़रूरत 50–60% तक कम हो गई। उन्होंने पिगलेट्स के लिए घर पर ही चारा तैयार करना शुरू किया, जिसमें मकई, चावल, गेहूं, मूंगफली, खनिज और नमक का संतुलित मिश्रण होता था। इससे चारे का खर्च बहुत घट गया।
बढ़ता मुनाफ़ा और नई पहचान
धीरे-धीरे उनका सूअर पालन का काम बढ़ता गया। पहले जहां 20 पिगलेट्स थे, वहीं तीन सालों में उनकी संख्या बढ़कर 200 तक पहुँच गई। वे हर साल 16–18 पिगलेट्स के बैच तैयार करते थे और एक पिगलेट को ₹3,500 में बेचते थे। उनका सालाना टर्नओवर ₹4 से ₹5 लाख तक पहुँच गया। उन्होंने गोवा और हासन जिले में पोर्क बेचने के लिए बाज़ार से सीधे संबंध बनाए। उनकी मेहनत और ईमानदारी ने उन्हें स्थानीय किसानों में एक सफल किसान के रूप में पहचान दिलाई।
खेती के साथ मिश्रित खेती की ओर रुख
सूअर पालन के साथ-साथ उन्होंने अपनी 4.5 एकड़ ज़मीन पर मिश्रित खेती भी शुरू की। उन्होंने गन्ना, कपास, कद्दू, आम, अमरूद, नींबू और नारियल जैसे बागवानी फ़सलें लगाईं। कद्दू की एक ही फ़सल से उन्होंने ₹2 लाख की आमदनी की। खेत के चारों ओर 110 नारियल के पेड़ लगाए जिनसे हर पेड़ से 80–100 नारियल सालाना मिलते थे। इस तरह सूअर पालन और खेती दोनों से उन्होंने ₹4.5 से ₹5 लाख तक सालाना शुद्ध मुनाफ़ा कमाया।
सम्मान और समाज के लिए संदेश
स्व. सोमन्ना भसागी के नवाचार और परिश्रम को देखते हुए University of Agricultural Sciences (UAS), धारवाड़ ने उन्हें “Progressive Farmer Award” से सम्मानित किया।
वे युवाओं को हमेशा यही संदेश देते थे —
“खेती प्रकृति के करीब है। जो सुख और संतोष हमें खेती से मिलता है, वो किसी और काम से नहीं मिल सकता।”
अब परिवार आगे बढ़ा रहा है उनकी विरासत
पिछले वर्ष स्व. सोमन्ना भसागी का निधन हो गया, लेकिन उनके काम की गूंज आज भी अलमेल गांव में सुनाई देती है। उनके बेटे और परिवार ने सूअर पालन का काम उसी समर्पण से आगे बढ़ाया है। वे न सिर्फ़ अपने पिता की परंपरा को जिंदा रख रहे हैं बल्कि गांव के अन्य युवाओं को भी सूअर पालन शुरू करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका परिवार अब सूअर पालन के साथ-साथ बागवानी फ़सलों में भी विस्तार कर रहा है। वे चाहते हैं कि हर किसान आत्मनिर्भर बने और खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़े।
प्रेरणा हर किसान के लिए
सोमन्ना भसागी की कहानी ये सिखाती है कि अगर लगन और सच्ची मेहनत हो, तो छोटे स्तर से भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। उन्होंने दिखाया कि सूअर पालन जैसी गतिविधि केवल कमाई का साधन नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास का रास्ता भी है। आज उनका नाम न सिर्फ़ बीजापुर में बल्कि पूरे कर्नाटक में एक प्रेरणा के रूप में लिया जाता है। उनके बेटे का कहना है —
“हमारे पिताजी ने जो बीज बोया था, हम उसी को आगे बढ़ा रहे हैं। सूअर पालन हमारे लिए सिर्फ़ व्यवसाय नहीं, एक ज़िम्मेदारी है।”
निष्कर्ष
स्व. सोमन्ना सिद्दप्पा भसागी की जर्नी हमें ये सिखाती है कि खेती में सफलता पाने के लिए नई सोच, अनुशासन और मेहनत ज़रूरी है। सूअर पालन से उन्होंने जो पहचान बनाई, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल है।
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