वाराणसी के खेतों से बाज़ार के बीज तक – भारतीय किसानों के लिए इसका क्या मतलब है। भारत की खेती हमेशा दो मजबूत आधारों पर खड़ी रही है – विज्ञान और किसान का अनुभव। एक तरफ़ कृषि संस्थान नई और बेहतर किस्में तैयार करते हैं, तो दूसरी तरफ़ किसान अपने खेतों में प्रयोग करके नई खोज करते हैं। कई बार खेत में किया गया प्रयोग ही बड़ी सफ़लता बन जाता है।
हाल ही में ऐसा ही एक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है। वाराणसी के दो किसान नवप्रवर्तकों द्वारा विकसित पांच ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्मों को, नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन (NIF) की मदद से, नागपुर की एक कंपनी को व्यावसायिक उपयोग के लिए सौंपा गया है। इसका मतलब यह है कि अब इन किस्मों का बड़े स्तर पर बीज उत्पादन होगा और ये अधिक किसानों तक पहुंचेंगी। यह सिर्फ़ एक बीज समझौता नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि किसान की खोज अब बाज़ार तक पहुंच सकती है और उसे औपचारिक मान्यता मिल सकती है।
खेती में तकनीक बीज सौंपना क्या होता है?
जब कोई नई फसल किस्म विकसित होती है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी कंपनी या संस्था को बीज उत्पादन, प्रसंस्करण और बिक्री के लिए दिया जाता है। इसे तकनीक हस्तांतरण या तकनीक सौंपना कहते हैं। इस मामले में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत काम करने वाली संस्था NIF ने पांच किसान विकसित किस्मों को नागपुर की गिन्नी एग्रो प्रोडक्ट्स लिमिटेड (GAPL) को सौंपने में सहयोग किया है।
इसका सीधा मतलब है कि अब इन किस्मों का बड़े पैमाने पर बीज तैयार होगा, ट्रुथफुली लेबल्ड (TL) बीज किसानों को उपलब्ध होंगे, और जिन किसानों ने ये किस्में विकसित कीं, उन्हें पहचान और आर्थिक लाभ मिल सकता है। इससे किसान की खोज सीमित दायरे में नहीं रहेगी।
यह किसानों के लिए क्यों जरूरी है?
अक्सर किसान द्वारा विकसित अच्छी किस्में केवल स्थानीय स्तर पर ही रह जाती हैं। उनके पास बड़े स्तर पर बीज उत्पादन या बिक्री का साधन नहीं होता। परिणाम यह होता है कि अच्छी किस्म भी सीमित किसानों तक ही पहुंचती है।
इस समझौते से बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन होगा, गुणवत्ता की निगरानी रहेगी और पैकिंग व वितरण सही तरीके से होगा। किसान नवप्रवर्तकों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और कई राज्यों में इन बीजों की उपलब्धता बढ़ेगी।
इन किस्मों को महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में उपलब्ध कराया जाएगा। इन क्षेत्रों के किसानों के लिए यह उत्पादन और आय बढ़ाने का अवसर बन सकता है।
गेहूं की किस्में: ज्यादा पैदावार, मजबूत पौधा और बेहतर पोषण
इस समझौते में तीन गेहूं किस्में शामिल हैं – कुदरत-8, कुदरत-9 और अन्नपूर्णा। ये तीनों किस्में उत्पादन, संरचना और गुणवत्ता के कारण ध्यान आकर्षित करती हैं।
कुदरत-8 (गेहूं): कम ऊंचाई, कम गिरने का खतरा
कुदरत-8 की उत्पादन क्षमता लगभग 65.41 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका छोटा और मजबूत पौधा है।
इसकी ऊंचाई लगभग 76 सेंटीमीटर है। प्रति बाल लगभग 50 दाने बनते हैं और टेस्ट वेट लगभग 52 ग्राम है। प्रति वर्ग मीटर लगभग 390 टिलर पाए गए हैं, जो अच्छी उपज का संकेत है।
कम ऊंचाई होने से तेज हवा या असमय बारिश में फसल गिरने का खतरा कम होता है। यह किस्म पत्ती झुलसा रोग के प्रति प्रतिरोधी और माहू के प्रति मध्यम प्रतिरोधी पाई गई है। इससे दवा खर्च कम हो सकता है और उत्पादन स्थिर रह सकता है।
कुदरत-9 (गेहूं): उत्पादन के साथ पोषण
कुदरत-9 की उत्पादन क्षमता लगभग 67 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक बताई गई है। लेकिन इसकी खास बात केवल उत्पादन नहीं, बल्कि पोषण भी है। इसमें 10–12 प्रतिशत प्रोटीन, 47.58 ppm आयरन और 23.77 ppm जिंक पाया गया है। भारत में आयरन और जिंक की कमी एक बड़ी समस्या है। ऐसी किस्में पोषण सुरक्षा में मदद कर सकती हैं। भविष्य में ऐसी गेहूं किस्मों को विशेष बाज़ार या सरकारी योजनाओं में प्राथमिकता मिल सकती है। इससे किसानों को अतिरिक्त लाभ मिलने की संभावना भी बनती है।
अन्नपूर्णा (गेहूं): लंबी बाल और अधिक दाना
अन्नपूर्णा गेहूं की उत्पादन क्षमता लगभग 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसकी बाल लगभग 25 सेंटीमीटर लंबी होती है और प्रति बाल लगभग 80 लंबे और मोटे दाने बन सकते हैं। मोटा और भरा हुआ दाना बाजार में अधिक पसंद किया जाता है। इससे किसान को बेहतर कीमत मिल सकती है। यह किस्म उत्पादन और बाजार दोनों की दृष्टि से उपयोगी हो सकती है।
अरहर की किस्में: आय बढ़ाने का अवसर
इस समझौते में दो अरहर किस्में शामिल हैं – कुदरत-3 और ललिता। अरहर भारत के कई राज्यों में महत्वपूर्ण दलहन फसल है और आय का अच्छा स्रोत है।
कुदरत-3 (अरहर): साल में दो बार उत्पादन
कुदरत-3 एक ऐसी किस्म है जिससे साल में दो बार उत्पादन लिया जा सकता है। इसकी सालाना उत्पादन क्षमता लगभग 36.17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसमें 6–8 सेंटीमीटर लंबी फलियां बनती हैं और प्रति फली लगभग 5 मोटे दाने होते हैं। सूखे दाने लाल रंग के होते हैं और स्वाद में अच्छे माने जाते हैं। साल में दो बार उत्पादन का मतलब है कि किसान को एक ही जमीन से अधिक आय मिल सकती है। यह जमीन के बेहतर उपयोग का अवसर देता है।
ललिता (अरहर): अधिक दाल निकासी
ललिता एक वार्षिक किस्म है जिसकी उत्पादन क्षमता लगभग 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इसके दाने गोल और लाल रंग के होते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इससे 80 प्रतिशत से अधिक दाल निकलती है। मिलिंग के समय दाने कम टूटते हैं। ज्यादा दाल निकलने का मतलब ज्यादा लाभ। यह किस्म जैविक खेती के लिए भी उपयुक्त बताई गई है, इसलिए कम रासायनिक खेती करने वाले किसान इसे अपनाने पर विचार कर सकते हैं।
किसान को पहचान और अधिकार
इस पूरी प्रक्रिया की खास बात यह है कि किसान नवप्रवर्तकों को औपचारिक मान्यता मिली है। पहले कई बार किसान की खोज को पहचान नहीं मिलती थी। अब उन्हें कानूनी सुरक्षा और व्यावसायिक अधिकार मिल रहे हैं। इससे यह संदेश जाता है कि नई किस्में केवल प्रयोगशाला में नहीं बनतीं, बल्कि खेतों में भी विकसित होती हैं। किसान भी शोधकर्ता हो सकता है।
अपनाने से पहले किसान क्या करें?
नई किस्म अपनाने से पहले किसान को स्थानीय प्रदर्शन प्लॉट देखना चाहिए। कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेनी चाहिए। संतुलित खाद प्रबंधन और रोग-कीट की निगरानी आवश्यक है। हर क्षेत्र की मिट्टी और मौसम अलग होता है, इसलिए पहले जानकारी लेना जरूरी है।
बीज का व्यावसायिक उत्पादन क्यों जरूरी है?
अगर बीज सही तरीके से तैयार और संरक्षित न किया जाए, तो उसकी शुद्धता कम हो सकती है। किस्म बदल सकती है या उत्पादन क्षमता घट सकती है। व्यावसायिक स्तर पर बीज उत्पादन होने से गुणवत्ता बनी रहती है, ज्यादा किसान लाभ उठा सकते हैं और सही उत्पादन क्षमता मिलती है।
अंतिम संदेश किसानों के लिए
ये पांच किस्में केवल बीज नहीं हैं। ये इस बात का उदाहरण हैं कि किसान की मेहनत और समझ से नई खोज हो सकती है।नई किस्म अपनाने से पहले जानकारी लें, तुलना करें और सोच-समझकर निर्णय लें। खेती का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि अच्छी जानकारी और बेहतर बीज कितनी तेजी से एक खेत से दूसरे खेत तक पहुंचते हैं। जब किसान की खोज को पहचान मिलती है, तभी खेती मजबूत बनती है।
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