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दुनिया का एक छोर खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध (Iran-Israel-US War) से जल रहा है, वहीं दूसरी तरफ अलवर समेत देश के कई ज़िलों के सरसों उगाने वाले किसान और व्यापारी (Mustard-growing farmers and traders) मालामाल हो रहे हैं। युद्ध ने देश में खाने के तेल (Mustard Oil) के दाम बढ़ा दिये हैं, और इसी का सीधा फायदा सरसों किसानों को मिल रहा है।
पहली बार इतने बढ़े दाम
अनाज मंडी में इस बार सरसों (Mustard Oil) की कीमतों ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सरसों का भाव पहली बार 7100 रुपये प्रति क्विंटल के पार जा पहुंचा है। पिछले साल जहां किसान 5000-5500 रुपये में सरसों बेचने को मजबूर थे, वहीं इस बार उनकी झोली खुशियों से भरी है। मंडी में हर तरफ सरसों के ढेर लगे हैं, और पल्लेदारों (मजदूरों) के पास दिन-रात एक करने की नौबत आ गई है। काम इतना बढ़ गया है कि मजदूर खाली नहीं बैठ रहे हैं।
क्यों बढ़ा सरसों का दाम?
ये बदलाव अचानक नहीं आया। इसके तीन बड़े कारण सामने आए हैं-
:-आयात पर निर्भरता: भारत में कुल खाने का 55 फीसदी तेल विदेशों से आता है। पाम ऑयल मलेशिया से, सोयाबीन तेल अमेरिका से (Palm oil from Malaysia, soybean oil from the US)। लड़ाई के कारण समुद्री रास्ते बाधित हुए और आयात घटकर आधा रह गया।
:-स्टॉक खत्म: आमतौर पर देश में हर साल करीब 10 लाख टन सरसों का स्टॉक बच जाता था, लेकिन इस बार युद्ध की वजह से विदेशी तेल कम आने पर यह पूरा स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है।
:-डॉलर महंगा: डॉलर के बढ़ते दाम ने भी विदेशी तेल को महंगा बना दिया है, जिससे देसी सरसों का तेल सबसे सस्ता और बेहतर ऑप्शन बन गया है।
इस बार की ख़ासियत: दोगुना फायदा
किसानों के लिए यह सिर्फ भाव बढ़ने का मौका नहीं है, बल्कि गुणवत्ता का भी मौका है। व्यापारियों के अनुसार, इस साल अलवर, भरतपुर, झुंझुनू में पैदा हुई सरसों में तेल की मात्रा (यानी क्वालिटी) बढ़कर 42-43 फीसदी हो गई है। आमतौर पर 100 किलो सरसों में 40 किलो तेल निकलता था, अब 43 किलो निकल रहा है। यानी किसान को महंगे दाम भी मिल रहे हैं और तेल भी ज्यादा।
किसान खुश, मगर आगे क्या?
अलवर मंडी में रोजाना 35 से 40 हजार बोरे सरसों की आवक हो रही है। यहां करीब 80 तेल मिलें हैं, जहां से तेल पूरे देश (खासकर बंगाल, बिहार, असम) में जाता है।
फिलहाल, देश के कई शहरों की मंडियों में खुशी की लहर है। ईरान-इजरायल युद्ध की आग से जहां दुनिया जल रही है, वहीं सरसों के सुनहरे दाने किसानों की किस्मत बदल रहे हैं। अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाले महीनों में सरसों किसानों की पॉकेट तो गर्म करेगी ही, साथ ही आम आदमी की रसोई भी महंगी कर देगी।
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