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हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के जुब्बल क्षेत्र के प्रगतिशील किसान और कृषि विभाग में ब्लॉक टेक्निकल मैनेजर अभय राठौर की कहानी ये बताती है कि बदलाव केवल बातों से नहीं, बल्कि खुद करके दिखाने से आता है। वे न केवल खुद खेती कर रहे हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित कर रहे हैं।
खेती के साथ जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं
अभय राठौर कृषि विभाग के ATMA प्रोजेक्ट से जुड़े हैं और उनका काम किसानों को नई तकनीकों के बारे में जानकारी देना है। लेकिन उन्होंने केवल सलाह देने तक खुद को सीमित नहीं रखा।
उन्होंने सोचा कि अगर किसान को समझाना है, तो पहले खुद उस तरीके को अपनाना ज़रूरी है। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने खेत में प्राकृतिक खेती का मॉडल तैयार करना शुरू किया।
70 बीघा में से 5 बीघा में किया प्रयोग
अभय राठौर कुल 70 बीघा ज़मीन में सेब की खेती करते हैं। उन्होंने इस ज़मीन में से 5 बीघा क्षेत्र को ख़ास तौर पर प्राकृतिक खेती के प्रयोग के लिए चुना।
साल 2019 में उन्होंने इस ज़मीन पर सेब के पौधे लगाए और इसे एक मॉडल के रूप में विकसित करने की योजना बनाई, ताकि दूसरे किसान इसे देखकर सीख सकें।
हाई डेंसिटी बाग़ान में अपनाया प्राकृतिक तरीक़ा
अभय राठौर ने अपने खेत में हाई डेंसिटी सेब बाग़ान तैयार किया है। इस बाग़ान में भी वे प्राकृतिक खेती के सभी तरीकों का पालन कर रहे हैं।
वे बताते हैं कि अगर सही समय पर प्राकृतिक घोलों का छिड़काव किया जाए, तो फ़सलों में बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है। इससे सेब की खेती में रसायनों की ज़रूरत कम हो जाती है और पौधे स्वस्थ रहते हैं।
कम ख़र्च में बेहतर खेती का अनुभव
अभय राठौर का कहना है कि जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब प्राकृतिक खेती में ख़र्च क़रीब 35 हज़ार रुपये तक आता था। लेकिन धीरे-धीरे अनुभव बढ़ने के साथ ये ख़र्च घटकर लगभग 10 हज़ार रुपये तक रह गया। इससे साफ़ होता है कि जैसे-जैसे किसान इस पद्धति को समझता है, लागत अपने आप कम होने लगती है।
आसान और वैज्ञानिक तरीक़ा
अभय राठौर के अनुसार प्राकृतिक खेती कोई कठिन या जटिल तरीक़ा नहीं है। ये एक सरल और वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें किसान आसानी से गाय के गोबर और गौमूत्र से घोल तैयार कर सकते हैं।
इन घोलों का सही समय पर उपयोग करने से पौधों की सेहत बेहतर रहती है और बीमारियों का असर कम होता है। यही वजह है कि अब सेब की खेती में भी इस पद्धति को अपनाने की रुचि बढ़ रही है।
किसानों को जोड़ने का काम
अभय राठौर इन सभी क्षेत्रों में किसानों को जागरूक करने का काम कर रहे हैं। वे लगातार किसानों के बीच जाकर उन्हें प्राकृतिक खेती के फायदे समझाते हैं और उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं।
उनकी इस पहल का असर भी दिखने लगा है। अब तक 500 से ज़्यादा किसान उनके बाग़ान का दौरा कर चुके हैं और इस तकनीक को क़रीब से समझ चुके हैं।
बाज़ार पर निर्भरता को लेकर चिंता
अभय राठौर एक और महत्वपूर्ण बात पर ध्यान दिलाते हैं। वे कहते हैं कि आजकल किसान तैयार इनपुट्स बाज़ार से खरीदने लगे हैं, जो कि लंबे समय में सही नहीं है।
उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती का असली फ़ायदा तभी मिलेगा, जब किसान अपने खेत और आसपास के संसाधनों से ही इनपुट तैयार करें।
सेब की खेती में बढ़ता भरोसा
अभय राठौर के प्रयोग ने ये साबित किया है कि सेब की खेती में भी प्राकृतिक खेती को सफलतापूर्वक अपनाया जा सकता है। उनके बाग़ान में पौधों की वृद्धि अच्छी है और बीमारियों का असर बहुत कम देखने को मिल रहा है। इससे दूसरे किसानों का भरोसा भी बढ़ा है और वे भी धीरे-धीरे इस पद्धति को अपनाने लगे हैं।
सीख जो हर किसान के काम आए
अभय राठौर की कहानी हमें ये सिखाती है कि अगर किसान खुद बदलाव के लिए आगे बढ़े, तो पूरी खेती की दिशा बदल सकती है। उन्होंने दिखाया कि प्राकृतिक खेती केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि भविष्य की ज़रूरत बनती जा रही है।
आज उनका बाग़ान एक मॉडल बन चुका है, जहां किसान आकर सीखते हैं और समझते हैं कि सेब की खेती को कम लागत और बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता है। उनकी पहल ये बताती है कि सही जानकारी, धैर्य और प्रयोग करने की सोच से खेती में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
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