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औद्योगीकरण और शहरीकरण के इस दौर में जहां एक ओर तेज़़ी से पेड़ काटे जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महाराष्ट्र की धरती पर एक ऐसा शख्स है जो लुप्त होती देसी प्रजातियों को सहेजने का काम कर रहा है। महाराष्ट्र के बुलढ़ाणा ज़िले के किसान परिवार में जन्में अनंत तायडे का बचपन अनिश्चितताओं के बीच गुजरा जहां, उन्होंने किसानों के चेहरे पर अक्सर सूखे के कारण फ़सल खराह होने का डर देखा है।
ऐसे इलाके में पौधों की नर्सरी शुरू करना आसान नहीं था, मगर उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और सूझ-बूझ से न सिर्फ़ एक अनोखा ग्रीन बिज़नेस खड़ा किया, बल्कि देसी प्रजातियों के लिए सीड बैंक की तरह भी काम कर रहे हैं। उन्होंने सिर्फ़ 5 हज़ार पौधों से का 8 Naturals Nursery की शुरुआत की थी, आज उनके पास 6 लाख से ज़्यादा पौधें और 400 से अधिक प्रजातियां हैं। उनकी नर्सरी एक ऐसा सस्टेनेबल बिज़नेस मॉडल है प्रकृति और रोज़गार-दोनों का संतुलन बना रही है।
सूखाग्रस्त इलाके से आते हैं अनंत तायडे
अनंत तायडे का जन्म महाराष्ट्र के बुलढाणा के फुली गांव में 1977 में हुआ, जो विदर्भ इलाके में आता है। कृषि के लिहाज से महाराष्ट्र का विदर्भ इलाका बिल्कुल भी अच्छा नहीं माना जाता। मॉनसून की अनिश्चितता और सिंचाई की उचित व्यवस्था न होने की वजह से यहां सिर्फ़ कपास और सोयाबीन की खेती होती है। मगर इसी इलाके में अनंत तायडे ने दुर्लभ प्रजातियों को बचाने के लिए एक सफल नर्सरी बिज़नेस स्थापित करके सबको हैरान कर दिया। किसान परिवार में जन्में अनंत तायडे का बचपन से ही मिट्टी से लगाव था और वो उसी मिट्टी को अपनी पहचान समझने लगे थे।
2018 में जन्म हुआ Naturals Nursery का
अनंत तायडे साल 2000 से 2003 तक कई समाजसेवी आंदोलन का हिस्सा बने और उन्हें तभी यह समझ आया कि वो जो बदलाव चाहते हैं, वो सिर्फ़ सोचने से नहीं होगा, बल्कि ज़मीन पर उतरकर काम करना होगा। बस फिर क्या था, इसी सोच के साथ 2018 में 8 Naturals Nursery का जन्म हुआ। अनंत तायडे ने डॉ. प्रवीण भागवत के मार्गदर्शन और 4-5 लोगों के साथ मिलकर इसकी शुरुआत की थी और आज इस नर्सरी का प्रचार-प्रसार नासिक और बुलढाणा तक हो चुका है।
400 से अधिक प्रजातियां
नर्सरी स्थापित करने के पीछे अनंत तायडे का मकसद है महाराष्ट्र से लुप्त हो रहे दुर्लभ पौधों को सहेजकर रखना। वो सैकड़ों पौधों के बीज इकट्ठा कर रहे हैं और अब तक वो क़रीब 460 देसी प्रजातियों को सहेज चुके हैं। इसमें तुंभा, अंजनी, बाहव, अक्कलकारा, अनंतमूल, पवित्र सीता अशोक जैसे नाम शामिल हैं।
अनंत तायडे बताते हैं कि उन्होंने शुरुआत सिर्फ़ 5 प्रजातियों और 5 हजार पौधों से की थी, मगर उनके पास 460 से ज़्यादा प्रजातियां और 6 लाख से भी अधिक पौधे हैं। आगे वो बताते हैं कि जिन दुलर्भ पौधों को वो बचा रहे हैं उसमें एक नामक पाढर का भी है जिसके बीज महाराष्ट्र में 20 हजार रुपए किलो बीज मिलता है, क्योंकि ये पौधा खत्म होता जा रहा है, ऐसे में वो लोग इसके बीज इकट्ठा करके पौध बना रहे हैं ताकि इसका अस्तित्व बचा रहे।
अनुवांशिक धरोहर को सहेज रहे
अनंत तायडे हमेशा नए बीजों का ट्रायल करके देखते हैं। उनकी नसर्री का ख़ासियत ये है कि यहां सिर्फ़ पौधे नहीं उगाए जाते, बल्कि भारत की अनुवांशिक धरोहर ( Genetic Heritage) का संरक्षण होता है। भारत में अधिकांश नर्सरी जहां सिर्फ़ मुनाफे वाले पौधों पर फोकस कर रही है, वहीं अनंत तायडे धरोहर को सहेजने का काम कर रहे हैं। उनकी नर्सरी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी देसी पौध नर्सरी है। साथ ही ये महाराष्ट्र की इकलौती नर्सरी है जिसे worldwide books of record में जगह मिली है, यही नहीं सबसे ज़्यादा देसी प्रजातियों को सरंक्षित करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी इसके नाम है।
आदिवासी और महिलाओं को दिया आजीविका का साधन
इस नर्सरी को स्थापित करने का मकसद सिर्फ़ हरियाली ही नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में खुशहाली लाना भी है। तभी तो अनंत तायडे ने जंगलों की समझ रखने वाले आदिवासी समुदाय को इस मिशन से जोड़ा है और उनके पारंपरिक ज्ञान से बीजों को एकत्र किया जाता है, जिससे उन्हें सम्मानजनक आजीविका मिलती है। यही नहीं उनकी नर्सरी ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम भी किया है, वो बचतगढ़ से जुड़ी महिलाओं को नर्सरी में काम करने का प्रशिक्षण देते हैं।
अगर आप भी देसी पौधों, सीड बैंक या स्सटेनेबल नर्सरी मॉडल के बारे में और जानना चाहते हैं तो अनंत तायडे और उनकी पहल 8 Naturals Nursery से जुड़ सकते हैं।
संपर्क 8208040061/9881482387
वेबसाइट- https://8naturals.wordpress.com/
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