IAS उमाकांत उमराव का ‘देवास मॉडल’ जिसने सूखा प्रभावित ज़िले को बना दिया खेती का हब

IAS उमाकांत उमराव के नेतृत्व में जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन से देवास ने सूखे से उबरकर देश-दुनिया के लिए सफल मॉडल ज़िला बनने की मिसाल पेश की।

अगर संसाधनों का सही और समझदारी से इस्तेमाल किया जाए तो नामुमकिन काम भी मुमकिन हो सकता है और मध्यप्रदेश का देवास ज़िला इसकी बेहतरीन मिसाल है। 2005-06 से पहले तक यहां के किसान भीषण सूखा, जल संकट और पलायन की समस्या से जूझ रहे थे, मगर आज की तरीख में यही देवास पूरी दुनिया के लिए रोल मॉडल बन गया है।

वर्षा जल संरक्षण और कृषि तालाबों के ज़रिए देवास एक सफल मॉडल ज़िला बन चुका है और इसका श्रेय जाता है साल 2005-06 के तत्कालीन IAS उमाकांत उमराव को। जिनके नेतृत्व में देवास को बदलने की पहल शुरू हुई थी। कैसे देवास ने दी सूखे के मात और कैसे बना ये जल संरक्षण का हब इस मुद्दे पर IAS उमाकांत उमराव से बात की किसान ऑफ इंडिया के संवाददाता सर्वेश बुंदेली ने। 

लोगों ने दी थी देवास न जाने की सलाह

IAS उमाकांत उमराव बताते हैं कि 2005-06 में जब उन्हें देवास का कलेक्टर नियुक्त किया गया तो बहुत से अधिकारियों ने उन्हें वहां न जाने की सलाह दी, क्योंकि इलाके में भयंकर जल संकट था। वहां पानी टैंकरों से पहुंचता था, किसान मुश्किल से सोयाबीन जैसी एक फ़सल लगा पाते थे और फ़सल सघनता 118 प्रतिशत थी, जो आज 180 प्रतिशत है। ये जानते हुए भी कि देवास में पानी की गंभीर समस्या है IAS उमाकांत उमराव वहां जाते हैं और अपनी सूझबूझ और दूरदर्शिता से न सिर्फ़ समस्या का समाधान करते हैं, बल्कि जल संरक्षण की ऐसी मिसाल पेश करते हैं, जो पूरे विश्व के लिए नजीर बन जाता है।

समस्या को समझने की कोशिश

IAS उमाकांत उमराव बताते हैं कि पहले तो उन्होंने ज़िले की समस्या को समझने की कोशिश की कि आखिर पानी की इतनी समस्या है क्यों। तो पता चला कि नदी, तालाब सूख चुके है और भूजल स्तर इतना नीचे जा चुका है कि ट्यूबवेल लगावर भी किसानों को फ़ायदा नहीं हो रहा है।

वो बताते हैं कि पानी बचाओं का जो नारा दिया जाता है वो भी किसी काम का नहीं है क्योंकि पानी का सबसे ज़्यादा इस्तेमाल तो खेती में हो रहा है, बाकी लोग पानी बचाकर क्या करेंगे। वो कहते हैं कि मान लीजिए पूरे देश में अगर 100 लीटर पानी इस्तेमाल हो रहा है तो उसमें से 90 लीटर पानी सिर्फ़ कृषि में उपयोग किया जा रहा है।

वो भी बड़े किसान जिनकी पास ज़्यादा ज़मीन और पैसा है वही पानी का भी इस्तेमाल ज़्यादा कर रहे हैं, क्योंकि वो हर साल नया ट्यूबवेल खुदवा लेते हैं, जिससे समस्या और बढ़ रही है। उन्होंने पहले सोचा कि पारंपरिक तरीके से जल संरक्षण का काम करना चाहिए, मगर जल्द ही उन्हें समझ आ गया कि पारंपरिक तरीके जिसमें नदियों पर बांध बनाना और वॉटर शेड बनाना शामिल है, इसमें बहुत समय और ख़र्च आएगा और ये व्यवहारिक नहीं है। 

IAS उमाकांत उमराव का ‘देवास मॉडल’ जिसने सूखा प्रभावित ज़िले को बना दिया खेती का हब

भागीरथ कृषक अभियान

उमकांत बताते हैं कि वो दिन-रात गांव वालों की पानी की समस्या का समाधान ढूंढ़ने के तरीके सोचते रहते थे। फिर उन्हें ख़ास तरीके से तालाब खुदवाने का आइडिया आया जिससे बारिश के पानी का संरक्षण कनरे के साथ ही भूजल स्तर भी बढ़ सकता है, मगर इसमें समस्या ये थी कि किसान ज़्यादा ख़र्च के लिए राजी नहीं होंगे। तो फिर उन्होंने को राजी करने के लिए अपने मॉडल को लाभ से जोड़ा यानी किसानों को समझाया कि आप जो भी पैसा निवेश करोगे 2-3 साल में ही उससे आपकी कमाई अच्छी होने लगेगी। यानी तालाब खुदवाने में ख़र्च करोगे तो पानी मिलेगी और पानी मिलेगा तो आप अच्छी खेती कर सकते हैं, जिससे मुनाफा बढ़ेगा।

इस तरह से उन्होंने भागीरथ कृषक अभियान शुरू किया जिसके तहत किसानों को खेत में ही एक ख़ास आकार और गहराई के तालाब बनाने के लिए प्रेरित किया गया। शुरूआत मुश्किल थी, मगर धीरे-धीरे किसान इससे जुड़ते गए। उमकांत बताते हैं कि जिस गांव के बारे में ये कहा जाता था कि लोग एक इंच ज़मीन भी नहीं देंगे उसी गांव में कई किसान तालाब खुदवाने के लिए राजी हो गए, क्योंकि उन्होंने किसानों को इसके फ़ायदे गिनवाए, सिर्फ़ खोखले वादे ही नहीं किए।

बड़े किसानों को बनाया रोल मॉडल

अपने अभियान को अमली जामा पहनाने के लिए IAS उमाकांत उमराव ने गांव में बड़े किसानों को चुना, क्योंकि छोटे किसान उन्हें ही अपना रोल मॉडल मानते हैं। वो बताते हैं कि उन्हें लगा कि जब बड़े किसान तालाब बनवा लेंगे तो छोटे किसान भी उन्हें करेंगे। मगर इसके लिए किसानों को ये समझाना पड़ा कि ज़मीन से ज़्यादा कीमती पानी है, क्योंकि बिना पानी के ज़मीन से वो कुछ उगा नहीं सकते। उन्होंने दूसरे राज्यों का उदाहरण देकर किसानों को समझाया कि पानी की कमी की वजह से उनके ज़िले में पैदावार इतनी कम है। उनकी बात लोगों ने समझी और धीरे-धीरे अभियान से जुड़ते गए, जिसकी बदौलत हर साल ज़िले में तालाब बढ़ रहे है।

जल संरक्षण की फिलॉसिफी को बदली

आमतौर पर जिस भी इलाके में पानी की समस्या होती है वहां प्रशासन द्वारा जल है तो कल है, जल बचाओ जीवन बचाओ। जैसे नारे लगवाए जाते हैं, मगर उमकांत ने देवास मे ऐसे नारों को प्रतिबंधित कर दिया और इसकी जगह नया नारा दिया जल बचाओ लाभ कमाओ।

उनका कहना है कि इसके पीछे सोच सिंपल थी कि जब लोग जल सरंक्षण करेंगे तो उसका कुछ पानी ज़मीन के अंदर जाएगा, तो बहुत से लोगों की पानी की ज़रूरत अपने आप पूरी होगी। वो बताते हैं कि योजना के कुछ साल बाद सूखा प्रभावित गांव में भी छोटे किसान तालाब खोदने लगे, क्योंकि भूजल स्तर बढ़ गया था।

इस तरह से अभियान से छोटे किसानों को लाभ हुआ। इस अभियान के तहत हजारों नए कुएं खुदें, कुछ पुराने कुओं की सफाई की गई और ट्यूबवेल में भी पानी आ गया। इस अभियान की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि ये समुदाय आधारित जल संरक्षण अभियान है जिसमें ज़मीन भी किसान की है और पैसे भी उन्होंने ख़र्च किए। IAS उमाकांत उमराव बताते हैं कि अगर सराकरी मापदंडों के हिसाब से अभियान की कीमत देखें तो वो क़रीब 10 हजार करोड़ थी।

IAS उमाकांत उमराव का ‘देवास मॉडल’ जिसने सूखा प्रभावित ज़िले को बना दिया खेती का हब

खेती बढ़ी, पक्षी लौटे

जल संरक्षण उपायों की बदौलत देवास की तस्वीर बदलने लगी। IAS उमाकांत उमराव बताते हैं कि जब वो वहां गए थे तो वहां सिर्फ़ 1.25 हेक्टेयर में ही खेती होती थी, जो अब बढ़कर 4 लाख हेक्टेयर हो गई। यही नहीं पानी आने पशु-पक्षी भी अपने घर लौटने लगे। कई प्रवासी पक्षी वापस आ गए। यही नहीं हायना और लकड़बग्घा जैसे जानवर भी देवास में दिखने लगे।

जल संरक्षण के लिए IAS उमाकांत उमराव को संयुक्त राष्ट्र संघ से भी सम्मान मिल चुका है। वो बताते हैं कि देवास के लोगों ने वर्षा जल की अहमियत को समझा और उसके सरंक्षण से ही इलाके की तस्वीर बदली है। बाकी जगह भी अगर इसी तरह जल संरक्षण के उपाय किए जाए तो पानी की समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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