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कुल्लू जिले के रहने वाले किसान दिवान चंद की कहानी उन किसानों के लिए ख़ास है जो खेती में बढ़ती लागत और घटती गुणवत्ता से परेशान हैं। एक समय ऐसा था जब वे भी रासायनिक खेती पर निर्भर थे, लेकिन आज वे प्राकृतिक खेती के जरिए न सिर्फ़ बेहतर उत्पादन ले रहे हैं, बल्कि दूसरे किसानों के लिए मिसाल भी बन चुके हैं।
रासायनिक खेती से नहीं मिल रहा था सही फ़ायदा
दिवान चंद बताते हैं कि पहले वे पारंपरिक तरीके से खेती करते थे, जिसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों का खूब इस्तेमाल होता था। अनार की फ़सल में उन्हें 15 से 18 बार तक छिड़काव करना पड़ता था। इससे न केवल लागत बढ़ती थी बल्कि स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता था।
इतना ख़र्च करने के बाद भी उन्हें बाज़ार में सही दाम नहीं मिल पाता था। धीरे-धीरे उन्हें ये महसूस हुआ कि इस तरह की खेती लंबे समय तक फ़ायदेमंद नहीं है। यहीं से उन्होंने प्राकृतिक खेती की ओर कदम बढ़ाने का फैसला किया।
प्रशिक्षण से मिला नया रास्ता
दिवान चंद को प्राकृतिक खेती की शुरुआती जानकारी कृषि विभाग के अधिकारियों से मिली। इसके बाद उन्होंने साल 2018 में प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया, जहां उन्हें इस पद्धति के बारे में विस्तार से समझाया गया।
इस प्रशिक्षण ने उनकी सोच पूरी तरह बदल दी और उन्होंने ठान लिया कि अब वे अपने खेतों में प्राकृतिक खेती को अपनाएंगे।
छोटे स्तर से शुरू किया प्रयोग
शुरुआत में उन्होंने 1.5 बीघा ज़मीन पर मटर की खेती में प्राकृतिक खेती का प्रयोग किया। उन्होंने नियमित रूप से प्राकृतिक इनपुट्स का इस्तेमाल किया और कुछ ही समय में उन्हें अच्छे परिणाम मिलने लगे।
ये अनुभव उनके लिए बेहद ख़ास रहा, क्योंकि इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने धीरे-धीरे अन्य फ़सलों में भी इस पद्धति को अपनाना शुरू कर दिया।
मिट्टी और फ़सल दोनों में आया बदलाव
दिवान चंद बताते हैं कि रासायनिक खेती के कारण उनकी मिट्टी की गुणवत्ता लगातार ख़राब हो रही थी। मिट्टी सख़्त होती जा रही थी और फ़सल की गुणवत्ता भी घट रही थी।
लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद मिट्टी फिर से उपजाऊ बनने लगी। फ़सल की गुणवत्ता भी बेहतर हुई और पौधों की वृद्धि में स्पष्ट अंतर देखने को मिला।
लागत कम, मुनाफ़ा ज़्यादा
पहले जहां रासायनिक खेती में उनका ख़र्च लगातार बढ़ रहा था, वहीं अब प्राकृतिक खेती में ख़र्च काफी कम हो गया है। उन्होंने खुद दोनों तरीकों की तुलना करके देखा और पाया कि एक ही क्षेत्र में प्राकृतिक तरीके से खेती करने पर उन्हें लगभग 10 हजार रुपये अधिक की आय हुई।
कम लागत और बेहतर उत्पादन ने उनकी खेती को फिर से लाभकारी बना दिया।
कई फ़सलों में अपनाया प्राकृतिक तरीका
आज दिवान चंद 4 बीघा ज़मीन में खेती कर रहे हैं। इसमें से 2 बीघा में वे अनार की खेती कर रहे हैं और बाकी 2 बीघा में मटर, टमाटर, सेब और मक्की जैसी फ़सलें उगा रहे हैं। सभी फ़सलों में वे प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों का पालन कर रहे हैं, जिससे उन्हें हर फ़सल में अच्छे परिणाम मिल रहे हैं।
कम पानी में भी अच्छी खेती
दिवान चंद बताते हैं कि प्राकृतिक खेती में आच्छादन करने से खेत में नमी बनी रहती है। इससे कम पानी में भी फ़सल अच्छी तरह तैयार हो जाती है। ये तरीका ख़ासकर उन क्षेत्रों के लिए बहुत उपयोगी है जहां पानी की कमी रहती है।
बेहतर उत्पादन और बाज़ार में अच्छी क़ीमत
दिवान चंद ने अपने खेत में 550 पौधों से करीब 400 कैरेट सिंदूरी और कंधारी अनार की फ़सल ली। इसके अलावा टमाटर की भी अच्छी पैदावार हुई, जिसे उन्होंने बाज़ार में अच्छे दामों पर बेचा।
इससे ये साबित होता है कि प्राकृतिक खेती में गुणवत्ता के साथ-साथ बाज़ार में बेहतर क़ीमत भी मिल सकती है।
दूसरे किसानों को भी कर रहे प्रेरित
दिवान चंद अब केवल अपने खेत तक सीमित नहीं हैं। वे लगातार अन्य किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूक कर रहे हैं। अब तक वे 5 प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से सैकड़ों किसानों को इस पद्धति के बारे में जानकारी दे चुके हैं। वे अपने खेत को एक मॉडल फार्म के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जहां किसान आकर इस तकनीक को समझ सकते हैं।
एक किसान की पहल से बदली सोच
दिवान चंद का मानना है कि किसान अगर खुद इस पद्धति को अपनाकर देखे, तो उसे इसके फ़ायदे समझ में आ जाएंगे। वे कहते हैं कि जब लोग उनके खेत में आकर परिणाम देखते हैं, तो वे खुद इस खेती को अपनाने के लिए तैयार हो जाते हैं।
उनकी कहानी ये दिखाती है कि प्राकृतिक खेती केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि खेती का भविष्य बन सकती है। आज उनका खेत एक ऐसी जगह बन चुका है, जहां से कई किसान नई सोच और नई दिशा लेकर लौटते हैं।
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