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कुल्लू जिले के शोरन गांव के किसान विजय सिंह की कहानी उन युवाओं के लिए ख़ास है, जो अपने फैसलों पर डटे रहते हैं। ग्रेजुएट की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्होंने खेती को आजीविका के रूप में चुना, तो परिवार ने इसका विरोध किया। लेकिन विजय सिंह ने हार नहीं मानी और आज उनकी मेहनत उन्हें एक सफल किसान के रूप में पहचान दिला चुकी है।
उनकी सफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण है प्राकृतिक खेती, जिसने उनकी खेती ही नहीं बल्कि सोच को भी पूरी तरह बदल दिया।
सीखने की शुरुआत यूट्यूब से
विजय सिंह ने साल 2017 से प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। शुरुआत में उन्होंने यूट्यूब के जरिए इस खेती पद्धति को समझा और धीरे-धीरे छोटे स्तर पर प्रयोग करने लगे।
उन्होंने देसी गाय के गोबर और गौमूत्र का उपयोग करके कुछ ज़मीन पर हल्के-फुल्के प्रयोग किए। हालांकि उस समय उनके इलाके में इस पद्धति को लेकर ज़्यादा जागरूकता नहीं थी, इसलिए वे भी पूरी तरह इसे अपनाने को लेकर थोड़ा हिचकिचा रहे थे। लेकिन उनका विश्वास बना रहा और उन्होंने सीखना जारी रखा।
प्रशिक्षण से मिला आत्मविश्वास
जब प्रदेश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा मिलने लगा, तब विजय सिंह ने 2019 में पालमपुर से इसका प्रशिक्षण लिया। इस प्रशिक्षण ने उन्हें सही दिशा और आत्मविश्वास दिया। इसके बाद उन्होंने पूरी तरह से प्राकृतिक खेती अपनाने का फैसला किया। हालांकि परिवार ने इस फैसले का विरोध किया, लेकिन विजय सिंह अपने निर्णय पर कायम रहे।
6 बीघा में तैयार किया सफल मॉडल
विजय सिंह ने शुरुआत में 6 बीघा ज़मीन पर प्राकृतिक खेती का मॉडल तैयार किया। उन्होंने इस मॉडल की तुलना पारंपरिक खेती से करने के लिए समान क्षेत्र में दोनों तरीकों को अपनाया।
जब परिणाम सामने आए, तो अंतर साफ़ दिखाई दिया। जहां पहले खेत में लगभग 200 किलो खाद डालनी पड़ती थी, वहीं प्राकृतिक खेती में केवल 15 किलो घनजीवामृत से काम चल गया। इससे न सिर्फ लागत कम हुई बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर हुई।
मिट्टी की सेहत में आया बड़ा बदलाव
विजय सिंह बताते हैं कि पहले उनके खेत की मिट्टी सख्त रहती थी, लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद मिट्टी नरम और उपजाऊ हो गई। घनजीवामृत और जीवामृत के उपयोग से मिट्टी में जैविक गतिविधियां बढ़ीं और फ़सलों को बेहतर पोषण मिलने लगा। इस बदलाव ने उनकी खेती को और मज़बूत बना दिया।
कई फ़सलों से बढ़ाई आय
विजय सिंह ने केवल एक फ़सल पर निर्भर रहने के बजाय विविध फ़सलों को अपनाया। उन्होंने मक्की, राजमा, मटर, टमाटर, बीन्स और जो जैसी फ़सलें उगाईं।
आज उनके पास कुल 24 बीघा ज़मीन है, जिसमें से 20 बीघा में वे प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। विविध फ़सलों के कारण उनकी आय के कई स्रोत बने और जोखिम भी कम हुआ।
लागत घटी, आमदनी बढ़ी
विजय सिंह के अनुसार पहले रासायनिक खेती में उनका ख़र्च लगभग 40 हज़ार रुपये तक होता था लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनका ख़र्च घटकर क़रीब 7 हज़ार रुपये रह गया और आय भी बढ़ गई। ये बदलाव उनके लिए सबसे बड़ा संतोष देने वाला रहा।
फलदार पौधों में भी अपनाया प्राकृतिक तरीक़ा
विजय सिंह ने अपनी खेती को और आगे बढ़ाते हुए फलदार पौधों में भी प्राकृतिक खेती अपनाई। उनके पास लगभग 400 सेब और 150 नाशपाती के पौधे हैं, जिनमें वे प्राकृतिक इनपुट्स का उपयोग करते हैं।
उनका अनुभव है कि कैंकर और लीफ एफिड जैसे रोगों पर प्राकृतिक खेती के तरीके ज़्यादा असरदार साबित हुए हैं।
देसी उपायों से रोगों पर नियंत्रण
विजय सिंह ने खेती में देसी उपायों का इस्तेमाल किया। मटर की फ़सल में खट्टी लस्सी और दशपर्णी अर्क का उपयोग कर उन्होंने लीफ माइनर जैसी समस्या को नियंत्रित किया। इससे ये साबित होता है कि प्राकृतिक खेती में बिना रसायनों के भी कीट और रोगों का प्रभावी समाधान किया जा सकता है।
कम पानी में भी सफल खेती
विजय सिंह का मानना है कि प्राकृतिक खेती कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए भी बेहद उपयोगी है। ये पद्धति मिट्टी में नमी को बनाए रखने में मदद करती है, जिससे कम पानी में भी अच्छी फ़सल ली जा सकती है।
बारिश आधारित खेती के लिए ये एक मज़बूत विकल्प बनकर सामने आई है।
खेती के साथ जीवन में भी आया बदलाव
विजय सिंह कहते हैं कि प्राकृतिक खेती ने केवल उनकी खेती को नहीं बदला, बल्कि उनके जीवन को भी बेहतर बनाया है। अब वे ज़्यादा संतुलित और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
वे पुराने देसी बीजों को संरक्षित करने का काम भी कर रहे हैं और अन्य किसानों को इस पद्धति से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरों के लिए बन रहे प्रेरणा
आज विजय सिंह अपने क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरणा बन चुके हैं। वे लगातार किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूक कर रहे हैं और उन्हें प्रशिक्षण के लिए भी प्रेरित करते हैं।
उनकी कहानी ये बताती है कि अगर किसान सही जानकारी और धैर्य के साथ काम करे, तो खेती में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
एक नई सोच की शुरुआत
विजय सिंह की कहानी ये दिखाती है कि खेती में बदलाव केवल तकनीक से नहीं, बल्कि सोच से आता है। उन्होंने ये साबित किया है कि प्राकृतिक खेती अपनाकर कम लागत में बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है और एक टिकाऊ भविष्य बनाया जा सकता है।
आज उनका खेत सिर्फ उत्पादन का स्थान नहीं, बल्कि एक सीखने का केंद्र बन चुका है, जहां से कई किसान नई दिशा पा रहे हैं।
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