पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture): क्या खेती से मिट्टी हर साल और बेहतर बन सकती है?

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आजकल पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture) की काफी चर्चा हो रही है। इसे मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी बचाने, बदलते मौसम का सामना करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती को मजबूत बनाने का एक तरीका माना जा रहा है। लेकिन कई लोग इसे जैविक खेती या प्राकृतिक खेती जैसा ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों पूरी तरह एक जैसे नहीं हैं।

पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture) क्या है?

इसी वजह से किसानों के मन में एक सवाल आता है। क्या पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture) का मतलब है कि रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना होगा? सीधा जवाब है – जरूरी नहीं। पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture) कोई एक तय तरीका नहीं है। यह न तो कोई ऐसी खेती है जिसमें सभी किसानों को एक जैसे नियम मानने पड़ें और न ही ऐसा मॉडल है जो हर जगह एक जैसा काम करे।

असल में यह खेती करने की एक सोच है। इसका मकसद है कि समय के साथ खेत की मिट्टी, पानी और पैदावार देने की क्षमता पहले से बेहतर होती जाए। यानी सिर्फ नुकसान कम करना ही नहीं, बल्कि मिट्टी की खोई हुई ताकत वापस लाना इसका लक्ष्य है। इसके लिए हर किसान अपनी जरूरत के हिसाब से अलग-अलग तरीके अपना सकता है। जैसे:

  • फसल बदल-बदल कर उगाना
  • फसल के बचे हुए अवशेष खेत में ही रहने देना
  • जरूरत से ज्यादा जुताई न करना
  • खाली खेत में ढकने वाली फसल उगाना
  • खेती के साथ पशुपालन जोड़ना
  • बारिश का पानी जमीन में अच्छी तरह उतरने देना
  • मिट्टी की जरूरत के हिसाब से सही मात्रा में खाद देना

हर खेत के लिए तरीका अलग

कोई किसान सिर्फ फसल चक्र में दलहनी फसलें जोड़कर और खेत को लंबे समय तक खाली न छोड़कर भी शुरुआत कर सकता है। हर किसान के लिए एक जैसा तरीका सही नहीं हो सकता। पंजाब में धान-गेहूं उगाने वाला किसान, महाराष्ट्र में बारिश के भरोसे कपास उगाने वाला किसान, राजस्थान का बाजरा किसान और केरल का नारियल किसान अलग-अलग परिस्थितियों में खेती करते हैं।

उनकी मिट्टी, बारिश, पानी, फसल, खेत का आकार, मशीनें और बाजार सब अलग हैं। इसलिए पुनर्जीवित कृषि (Regenerative Agriculture) भी हर खेत के हिसाब से अलग हो सकती है। एक ही तरीका सभी किसानों पर लागू नहीं होता।

मिट्टी को बेहतर बनाने की जरूरत क्यों?

मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती की जरूरत क्यों महसूस हुई? आधुनिक खेती ने भारत को खाद्यान्न उत्पादन में बड़ी सफलता दिलाई है। बेहतर बीज, सिंचाई, उर्वरकों, कीट नियंत्रण और मशीनों की मदद से पैदावार बढ़ी है और देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है। लेकिन अब कई इलाकों में खेती से जुड़े कुछ नए सवाल सामने आने लगे हैं।

कई किसान बताते हैं कि पहले जितनी खाद डालने से जितनी पैदावार मिलती थी, अब उतनी नहीं मिलती। कुछ खेतों में पहले से ज्यादा सिंचाई करनी पड़ रही है। मिट्टी सूखने पर सख्त हो जाती है। बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता है। फसल के अवशेष बेकार समझकर हटा दिए जाते हैं। मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) की कमी दिखने लगी है। कीट और बीमारियों पर नियंत्रण भी पहले जितना आसान नहीं रहा।

मिट्टी कमजोर होने के कारण

इन सभी समस्याओं की कोई एक वजह नहीं होती। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे:

  • साल-दर-साल एक ही फसल उगाना
  • जरूरत से ज्यादा या असंतुलित खाद का उपयोग
  • मिट्टी में जैविक पदार्थ (Organic Matter) की कमी
  • मिट्टी का दबकर सख्त हो जाना
  • मिट्टी का कटाव
  • पानी की निकासी ठीक न होना
  • भूजल स्तर का गिरना
  • गलत सिंचाई तरीके अपनाना

खेत को एक पूरी व्यवस्था मानना

मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती इन समस्याओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे खेत को एक व्यवस्था (System) मानकर समझती है। यह कुछ अहम सवाल पूछती है:

  • क्या मिट्टी को इतना बेहतर बनाया जा सकता है कि पौधों की जड़ें आसानी से फैल सकें?
  • क्या बारिश का ज्यादा पानी जमीन के भीतर जा सकता है, बजाय बह जाने के?
  • क्या फसल के अवशेष खेत में वापस मिलाए जा सकते हैं, बिना कीट या खरपतवार की समस्या बढ़ाए?
  • क्या अलग-अलग फसलें मिलाकर मिट्टी के पोषक तत्वों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है?
  • क्या मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीव पौधों तक पोषक तत्व पहुंचाने में मदद कर सकते हैं?
  • क्या खेत की पैदावार बनाए रखते हुए उसे सूखा, अधिक गर्मी और बढ़ती खेती लागत जैसी चुनौतियों के प्रति ज्यादा मजबूत बनाया जा सकता है?

इस सोच की शुरुआत मिट्टी से होती है, लेकिन बात सिर्फ मिट्टी तक सीमित नहीं रहती। इसमें पानी, जैव विविधता, फसलें, पशुपालन, खेती की लागत और किसानों का स्थानीय अनुभव भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

टिकाऊ खेती और Regenerative Agriculture में क्या फर्क है?

टिकाऊ खेती (Sustainable Agriculture) का उद्देश्य है कि आज की जरूरतें भी पूरी हों और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी खेती सुरक्षित रहे। इसमें पर्यावरण, किसानों की आय और समाज, तीनों का ध्यान रखा जाता है। कोशिश यह रहती है कि खेती लंबे समय तक बिना प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए चलती रहे।

मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती इससे एक कदम आगे बढ़ती है। इसका सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि संसाधनों को बचाया जाए, बल्कि यह भी है कि क्या पहले से कमजोर हो चुकी मिट्टी और प्राकृतिक संसाधनों को फिर से बेहतर बनाया जा सकता है? इसे एक आसान उदाहरण से समझिए।

  • टिकाऊ खेती का लक्ष्य हो सकता है कि मिट्टी की गुणवत्ता और खराब न हो।
  • मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती का लक्ष्य है कि जहां संभव हो, मिट्टी पहले से ज्यादा उपजाऊ और स्वस्थ बने।

फर्क सिर्फ सोच का है

इसी तरह:

  • टिकाऊ खेती मिट्टी के कटाव को कम करने पर जोर देती है।
  • जबकि मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती मिट्टी पर हर समय हरियाली या ढकाव बनाए रखने, जड़ों की अच्छी बढ़वार और पानी के बेहतर रिसाव पर भी काम करती है, ताकि मिट्टी भविष्य की चुनौतियों का बेहतर सामना कर सके।

असल में दोनों के बीच काफी समानताएं हैं। कोई भी खेती लंबे समय तक सफल नहीं हो सकती, अगर वह किसान के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी न हो। इसी तरह फसल चक्र अपनाना, पानी का सही उपयोग और संतुलित खाद देना जैसे तरीके, टिकाऊ खेती और मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती दोनों में महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य अंतर सिर्फ सोच का है।

  • टिकाऊ खेती का लक्ष्य है कि जो अच्छा है, उसे बनाए रखा जाए।
  • मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती का लक्ष्य है कि जो कमजोर हो चुका है, उसे पहले से बेहतर बनाया जाए।

जैविक, प्राकृतिक, संरक्षण और मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती में क्या फर्क है? 

पहलू जैविक खेती (Organic Farming) प्राकृतिक खेती (Natural Farming) संरक्षण कृषि (Conservation Agriculture) मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती (Regenerative Agriculture)
मुख्य उद्देश्य बिना प्रतिबंधित रासायनिक इनपुट के फसल उगाना प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं के सहारे, कम से कम बाहरी इनपुट के साथ खेती करना मिट्टी और पानी का संरक्षण करना तथा कटाव कम करना मिट्टी, पानी, जैव विविधता और खेत की सेहत को समय के साथ बेहतर बनाना
मुख्य सवाल कौन-कौन से इनपुट इस्तेमाल किए जा सकते हैं? क्या खेती मुख्य रूप से प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं से हो सकती है? मिट्टी और पानी को कैसे बचाया जाए? क्या हर फसल के बाद खेत पहले से बेहतर हो रहा है?
रासायनिक खाद और कीटनाशक प्रमाणित जैविक खेती में आमतौर पर अनुमति नहीं होती इनसे बचा जाता है जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किए जा सकते हैं खेती की स्थिति के अनुसार सोच-समझकर इस्तेमाल किए जा सकते हैं, साथ ही मिट्टी की सेहत सुधारने पर जोर रहता है
प्रमाणन (Certification) तय मानकों के अनुसार प्रमाणन होता है कोई एक समान प्रमाणन व्यवस्था नहीं प्रमाणन की जरूरत नहीं दुनिया भर में कोई एक तय प्रमाणन नहीं; इसका आकलन अपनाए गए तरीकों और उनके परिणामों से किया जाता है
मुख्य तरीके जैविक खाद, जैविक उत्पाद, फसल चक्र, स्वीकृत कीट प्रबंधन मल्चिंग, खेत में बने जैविक घोल, फसलों में विविधता, जैविक अवशेषों का उपयोग, पशुपालन कम जुताई, मिट्टी को हमेशा ढककर रखना, फसल चक्र और फसल विविधता फसल चक्र, फसल अवशेष खेत में रखना, कम जुताई, ढकने वाली फसलें, पेड़ और खेती साथ-साथ (Agroforestry), पशुपालन, मिट्टी के सूक्ष्म जीवों को बढ़ावा, खाद और पानी का बेहतर प्रबंधन
मिट्टी की सेहत पर जोर महत्वपूर्ण सबसे प्रमुख सबसे प्रमुख सबसे बड़ा उद्देश्य
जैव विविधता पर जोर प्रोत्साहित किया जाता है बहुत अधिक मध्यम बहुत अधिक
पानी बचाने पर जोर प्रोत्साहित किया जाता है प्रोत्साहित किया जाता है प्रमुख उद्देश्य स्वस्थ मिट्टी और बेहतर जल रिसाव के माध्यम से प्रमुख उद्देश्य
पैदावार बढ़ाने का तरीका जैविक तरीकों से उत्पादन बनाए रखना खरीदे जाने वाले इनपुट पर निर्भरता कम रखते हुए उत्पादन बनाए रखना संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए उत्पादन बनाए रखना मिट्टी और पूरे खेती तंत्र को बेहतर बनाकर लंबे समय तक अच्छी पैदावार बनाए रखना
क्या हर किसान अपना सकता है? प्रमाणन, बाजार और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर स्थानीय संसाधनों और किसान के प्रबंधन पर निर्भर फसल, मिट्टी और उपलब्ध मशीनों पर निर्भर हर क्षेत्र की मिट्टी, मौसम, फसल और किसान की जरूरत के अनुसार तरीका बदलना पड़ता है
आसान भाषा में समझें ध्यान इस बात पर कि क्या इस्तेमाल करना है। ध्यान प्राकृतिक तरीकों से खेती करने पर। ध्यान मिट्टी और पानी बचाने पर। ध्यान नतीजे परक्या समय के साथ मिट्टी, खेत और खेती पहले से बेहतर हो रही है?

याद रखने वाली सबसे जरूरी बात

  • जैविक खेती पूछती है: “कौन-कौन से इनपुट इस्तेमाल किए जा सकते हैं?”
  • प्राकृतिक खेती पूछती है: “क्या खेती मुख्य रूप से प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं के सहारे की जा सकती है?”
  • संरक्षण कृषि पूछती है: “मिट्टी और पानी को कैसे बचाया जाए?”
  • मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती पूछती है: “क्या पिछली फसल की तुलना में मेरा खेत आज पहले से ज्यादा स्वस्थ है?”

मिट्टी सिर्फ पौधे को खड़ा रखने का माध्यम नहीं है

मिट्टी को अक्सर सिर्फ ऐसी जगह समझा जाता है, जहां पौधों की जड़ें रहती हैं। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी इससे कहीं ज्यादा है। यह एक जीवित तंत्र (Living System) है, जिसमें खनिज, पानी, हवा, जैविक पदार्थ और लाखों-करोड़ों सूक्ष्म जीव रहते हैं।

एक स्वस्थ मिट्टी को एक साथ कई काम करने होते हैं। उसे:

  • पौधे को मजबूती से पकड़कर रखना होता है।
  • जड़ों को फैलने की जगह देनी होती है।
  • पानी को रोककर जरूरत पड़ने पर पौधों तक पहुंचाना होता है।
  • पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराने होते हैं।
  • हवा का आना-जाना बनाए रखना होता है।
  • मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीवों के लिए अच्छा वातावरण बनाना होता है।

इन सभी कामों के लिए मिट्टी की बनावट (Soil Structure) अच्छी होना जरूरी है।

जब मिट्टी के छोटे-छोटे कण आपस में मिलकर मजबूत समूह बनाते हैं, तो उनके बीच छोटी-छोटी जगहें बनती हैं। इन्हीं जगहों से हवा और पानी अंदर जाते हैं, जड़ें आसानी से बढ़ती हैं और सूक्ष्म जीव अपना काम करते हैं। लेकिन अगर मिट्टी की यह बनावट खराब हो जाए, तो मिट्टी की ऊपरी सतह सख्त हो सकती है, मिट्टी दब सकती है, पानी का निकास खराब हो सकता है और जड़ों की बढ़वार रुक सकती है।

मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती का उद्देश्य मिट्टी की इसी बनावट को सुधारना है। इसके लिए खेत में जड़ों को सक्रिय रखना, जैविक पदार्थ वापस मिट्टी में मिलाना, जरूरत से ज्यादा जुताई से बचना और मिट्टी की सतह को ढककर रखना जैसे तरीके अपनाए जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि हर मिट्टी एक जैसी बन जाएगी।

काली मिट्टी हमेशा रेतीली मिट्टी से अलग रहेगी। धान वाले भारी खेत और लाल मिट्टी वाले ऊंचे खेत भी एक जैसे नहीं हो सकते। मकसद सिर्फ इतना है कि हर मिट्टी अपनी क्षमता के अनुसार सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सके।

मिट्टी में जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon) क्यों महत्वपूर्ण है?

मिट्टी का जैविक कार्बन (Soil Organic Carbon) वह कार्बन है जो सड़ी-गली पत्तियों, पौधों की जड़ों, सूक्ष्म जीवों और दूसरे जैविक पदार्थों के टूटने के बाद मिट्टी में जमा होता है। यह सिर्फ खेत में फसल के अवशेष या गोबर डाल देने से नहीं बन जाता। इन चीजों को पहले मिट्टी के भीतर कई जैविक और रासायनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। तभी उनका कुछ हिस्सा मिट्टी का स्थायी हिस्सा बन पाता है। मिट्टी में पर्याप्त जैविक कार्बन होने से कई फायदे होते हैं:

  • मिट्टी के कण आपस में अच्छी तरह जुड़ते हैं।
  • सूक्ष्म जीव बेहतर तरीके से काम कर पाते हैं।
  • मिट्टी पोषक तत्वों को अधिक समय तक संभालकर रख सकती है।
  • पानी का रिसाव और नमी बनाए रखने की क्षमता बढ़ती है।

लेकिन यह भी समझना जरूरी है कि जैविक कार्बन कोई जादुई समाधान नहीं है। किसी खेत में कितना कार्बन बढ़ाया जा सकता है, यह कई बातों पर निर्भर करता है, जैसे:

  • मौसम
  • मिट्टी का प्रकार
  • कौन-सी फसल उगाई जा रही है
  • खेत में कितना जैविक पदार्थ उपलब्ध है
  • सिंचाई
  • तापमान
  • मिट्टी में पहले से मौजूद कार्बन

भारत जैसे गर्म क्षेत्रों में जैविक पदार्थ जल्दी सड़-गल जाते हैं। रेतीली मिट्टी और चिकनी मिट्टी में कार्बन जमा होने का तरीका भी अलग होता है। कई बार फसल के अवशेष पशुओं के चारे में चले जाते हैं, इसलिए उन्हें खेत में वापस डालना भी हमेशा संभव नहीं होता।

यही कारण है कि मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती का तरीका हर क्षेत्र के अनुसार अलग होना चाहिए।

जो तरीका किसी ठंडे देश के बड़े पशुपालन वाले फार्म में काम करता है, जरूरी नहीं कि वही भारत के सूखे या अर्ध-शुष्क इलाकों में भी उतना ही सफल हो।

पोषक तत्वों का चक्र: सिर्फ खाद डालना नहीं, बल्कि खाद का सही उपयोग करना

हर फसल मिट्टी से पोषक तत्व लेती है। जब किसान अनाज, भूसा, सब्जियां, फल या चारा खेत से बाहर ले जाता है, तो उनके साथ पोषक तत्व भी निकल जाते हैं। अगर इन पोषक तत्वों की भरपाई न की जाए, तो समय के साथ मिट्टी की उर्वरता घटने लगती है। मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती इस बात से इनकार नहीं करती। बल्कि इसका प्रयास यह होता है कि खेत में पोषक तत्वों का उपयोग ज्यादा समझदारी से हो।

इसके लिए किसान कई तरीके अपना सकता है, जैसे: 

  • फसल के अवशेष खेत में वापस मिलाना
  • जहां उपलब्ध हो वहां गोबर की खाद या कम्पोस्ट का उपयोग करना
  • फसल चक्र में दलहनी फसलें शामिल करना
  • बारिश या सिंचाई के पानी के साथ खाद बहने से बचाना
  • मिट्टी की जांच के आधार पर खाद देना
  • फसल की जरूरत के समय ही खाद का प्रयोग करना

उदाहरण के लिए, दलहनी फसलें नाइट्रोजन उपलब्ध कराने वाले जीवाणुओं के साथ मिलकर काम करती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बाकी सभी पोषक तत्व अपने-आप मिल जाएंगे। फॉस्फोरस, पोटाश, गंधक और सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत फिर भी बनी रहती है।

इसी तरह कम्पोस्ट या गोबर की खाद मिट्टी को बेहतर बनाती है और कुछ पोषक तत्व भी देती है। लेकिन छोटे किसानों के पास अक्सर इतनी मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध नहीं होती कि उससे अकेले ही अधिक पैदावार वाली फसल की पूरी जरूरत पूरी हो सके। इसलिए इस खेती में सबसे बड़ा सवाल हमेशा यह नहीं होता कि “क्या रासायनिक खाद पूरी तरह बंद की जा सकती है?” बल्कि यह होता है: “क्या खाद की बर्बादी कम की जा सकती है और जितनी खाद इस्तेमाल हो, उसका पूरा फायदा फसल को मिल सके?” 

पानी: यही वह जगह है जहां किसानों को सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है। भारत में खेती की सबसे बड़ी चिंता अक्सर पानी होती है। इसलिए मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती की असली उपयोगिता भी तब समझ आती है, जब उसका संबंध पानी से जुड़ता है। भारत में बारिश कुछ महीनों तक ही होती है। हर इलाके में बराबर बारिश नहीं होती और अब मौसम पहले से ज्यादा अनिश्चित भी हो गया है। कहीं लंबे समय तक सूखा रहता है, तो कहीं थोड़े समय में इतनी तेज बारिश होती है कि पानी जमीन में समाने के बजाय बह जाता है। जिन इलाकों में सिंचाई होती है, वहां भी कई जगह भूजल लगातार नीचे जा रहा है और पानी निकालने का खर्च बढ़ता जा रहा है।

अगर मिट्टी की बनावट अच्छी हो, तो बारिश का पानी आसानी से जमीन के भीतर चला जाता है। खेत में फसल का ढकाव और फसल के अवशेष मिट्टी को सीधे बारिश की मार से बचाते हैं और नमी जल्दी खत्म नहीं होने देते। पौधों की जड़ें और मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीव भी पानी को नीचे तक पहुंचाने में मदद करते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि ऐसी खेती से बारिश बढ़ जाएगी या सूखे की समस्या खत्म हो जाएगी। जहां फसल को सिंचाई की जरूरत है, वहां सिंचाई का विकल्प नहीं है। लेकिन अच्छी मिट्टी उपलब्ध पानी का बेहतर उपयोग जरूर कर सकती है। हर इलाके की जरूरत अलग होती है।

  • महाराष्ट्र के वर्षा आधारित क्षेत्रों में सबसे बड़ी जरूरत हो सकती है कि बारिश का पानी बहने से रोका जाए और मिट्टी हमेशा ढकी रहे।
  • पंजाब में ध्यान फसल के अवशेषों का बेहतर उपयोग, धान के कारण होने वाली मिट्टी की समस्याओं को कम करने और पानी का अधिक कुशल उपयोग करने पर हो सकता है।
  • केरल में जहां बारिश ज्यादा होती है, वहां अच्छी जल निकासी, मिट्टी का कटाव रोकना, पेड़ों की विविधता बनाए रखना और पोषक तत्वों को बहने से बचाना ज्यादा जरूरी हो सकता है।

सिद्धांत एक ही है, लेकिन तरीका हर इलाके के अनुसार बदलता है। पूरे भारत के लिए एक ही तरीका काम नहीं कर सकता भारत में खेती की परिस्थितियां बहुत अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक तरीके को हर किसान पर लागू नहीं किया जा सकता।

पंजाब का धान-गेहूं क्षेत्र

यहां भूजल तेजी से नीचे जा रहा है। फसल के अवशेषों का प्रबंधन चुनौती है। लगातार एक जैसी फसलें उगाने से मिट्टी पर दबाव बढ़ता है और पोषक तत्वों का संतुलन भी बिगड़ सकता है।

यहां बिना जुताई गेहूं की बुवाई (Zero Till), फसल के अवशेष खेत में रखना, फसल चक्र बदलना और खाद व पानी का सोच-समझकर उपयोग जैसे तरीके उपयोगी हो सकते हैं।

महाराष्ट्र की वर्षा आधारित खेत

यहां अनियमित मानसून, मिट्टी का कटाव, मिट्टी में जैविक पदार्थ की कमी और सिंचाई की सीमित सुविधा बड़ी चुनौतियां हैं।

ऐसे क्षेत्रों में खेत की मेड़ मजबूत करना, मिश्रित खेती, दलहनी फसलें शामिल करना, मल्चिंग और स्थानीय मौसम के अनुसार उपयुक्त किस्में अपनाना ज्यादा लाभदायक हो सकता है।

राजस्थान के सूखे क्षेत्र

यहां सबसे जरूरी काम है हवा और पानी से होने वाले मिट्टी के कटाव को रोकना, कम पानी में टिकने वाली फसलों को बनाए रखना, पशुपालन का संतुलित उपयोग करना और बारिश की हर बूंद का अधिकतम उपयोग करना।

केरल के नारियल और बागान क्षेत्र

यहां कई स्तरों पर फसलें उगाना, खेत में हरियाली बनाए रखना, जैविक अवशेषों से खाद बनाना, अच्छी जल निकासी रखना और मसाले, चारा या पशुपालन को साथ जोड़ना उपयोगी हो सकता है।

यहां चुनौती पानी की कमी नहीं, बल्कि तेज बारिश, ढलान वाली जमीन और पोषक तत्वों के बह जाने की होती है। इन उदाहरणों से साफ है कि मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती किसी तय नुस्खे पर नहीं, बल्कि कुछ मूल सिद्धांतों पर आधारित है। एक तरीका किसी किसान के लिए फायदेमंद हो सकता है, लेकिन वही तरीका दूसरे किसान के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकता है।

इसमें आमतौर पर कौन-कौन से तरीके अपनाए जाते हैं?

इस खेती का कोई एक तय पैकेज नहीं है, लेकिन इनमें से कई तरीके अपनाए जाते हैं।

  • जरूरत से ज्यादा जुताई से बचना, ताकि मिट्टी की बनावट और उसमें रहने वाले जीव सुरक्षित रहें।
  • फसल चक्र अपनाना, ताकि एक ही फसल बार-बार मिट्टी से वही पोषक तत्व न खींचे।
  • जहां संभव हो, मुख्य फसलों के बीच ढकने वाली फसलें (Cover Crops) उगाना।
  • फसल के अवशेष खेत में छोड़ना, ताकि मिट्टी ढकी रहे और जैविक पदार्थ वापस मिल सके। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि कई किसान इन्हें पशुओं के चारे के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं।
  • दलहनी फसलें शामिल करना, जिससे मिट्टी की उर्वरता और फसल विविधता बढ़े।
  • जहां उपयुक्त हो, खेती के साथ पेड़ लगाना (Agroforestry), ताकि चारा, फल, लकड़ी या ईंधन जैसी अतिरिक्त आय भी मिल सके।
  • खेती के साथ पशुपालन जोड़ना, ताकि गोबर के जरिए पोषक तत्व वापस खेत में आ सकें।
  • खाद और पानी का जरूरत के अनुसार सही मात्रा में उपयोग करना।
  • कीट प्रबंधन के ऐसे तरीके अपनाना, जिनमें दवाओं का प्रयोग तभी किया जाए जब वास्तव में जरूरत हो।

हर किसान को एक साथ ये सभी तरीके अपनाने की जरूरत नहीं है। शुरुआत सिर्फ एक छोटे बदलाव से भी हो सकती है।

किसान कैसे पहचानें कि खेत सचमुच बेहतर हो रहा है? 

किसी तरीके को सिर्फ इसलिए अच्छा नहीं कहा जा सकता कि वह पर्यावरण के अनुकूल लगता है। असली पहचान उसके नतीजों से होती है। किसान कुछ बातों पर नजर रख सकते हैं:

  • क्या बारिश का पानी पहले से ज्यादा जमीन में समा रहा है?
  • क्या मिट्टी का कटाव कम हुआ है?
  • क्या पौधों की जड़ें पहले से ज्यादा गहरी और स्वस्थ हैं?
  • क्या कुछ वर्षों में मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार दिख रहा है?
  • क्या खाद का असर पहले से बेहतर मिल रहा है?
  • क्या खराब मौसम में भी पैदावार ज्यादा स्थिर रहती है?
  • क्या खेती की लागत कम हुई और शुद्ध आय बढ़ी?
  • क्या मिट्टी में केंचुए और दूसरे उपयोगी जीव बढ़े हैं?
  • क्या खरपतवार, कीट या मजदूरी की समस्याएं कम हुई हैं या बढ़ गई हैं?

कुछ बदलाव, जैसे पानी का कम बहना या मिट्टी का ढका रहना, एक ही मौसम में दिखाई दे सकते हैं। लेकिन मिट्टी की गुणवत्ता में बड़ा बदलाव आने में कई साल भी लग सकते हैं। इसलिए यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि एक मौसम में ही चमत्कार हो जाएगा।

क्या रासायनिक खाद और कीटनाशक पूरी तरह बंद कर देने चाहिए?

सिर्फ इसलिए नहीं कि कोई खेती का तरीका “मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती” कहलाता है। खाद और कीटनाशकों का उपयोग खेत की जरूरत, मिट्टी की जांच, वैज्ञानिक सलाह, लागत और खेती की परिस्थितियों को देखकर तय होना चाहिए। हो सकता है कोई किसान दलहनी फसलें शामिल करने और मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के बाद धीरे-धीरे नाइट्रोजन खाद कम कर दे। दूसरा किसान रासायनिक खाद का इस्तेमाल जारी रखे, लेकिन मिट्टी की जांच के आधार पर सही मात्रा और सही समय पर दे।

इसी तरह, अच्छी किस्में, फसल चक्र और नियमित निगरानी से कई बार कीटनाशकों की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन अगर कीट या बीमारी का गंभीर प्रकोप हो, तो फसल बचाने के लिए उचित दवा का इस्तेमाल करना जरूरी हो सकता है।

मकसद यह नहीं कि हर हाल में खाद और दवा बंद कर दी जाए। मकसद यह है कि जहां जरूरत न हो, वहां उनका अनावश्यक उपयोग न किया जाए। अगर इनपुट कम करने के कारण किसान की आय घट जाए और वह खेती ही छोड़ने पर मजबूर हो जाए, तो उसे सफल तरीका नहीं कहा जा सकता।

यह पुराने समय की खेती में लौटने की बात नहीं है 

कई बार कहा जाता है कि मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती का मतलब है पुराने जमाने की खेती में लौट जाना। यह सही समझ नहीं है। इसका उद्देश्य आधुनिक कृषि विज्ञान को नकारना भी नहीं है और न ही सिर्फ इसलिए पुरानी परंपराओं को अपनाना है कि वे पुरानी हैं। इसका उद्देश्य है किसानों के अनुभव, प्रकृति की समझ और आधुनिक विज्ञान को साथ लेकर ऐसी खेती करना, जिससे उत्पादन भी बना रहे और मिट्टी की ताकत भी धीरे-धीरे बढ़ती जाए।

भारतीय किसान इसकी शुरुआत छोटे-छोटे कदमों से कर सकते हैं। जैसे:

  • फसल चक्र में एक दलहनी फसल जोड़ना।
  • मिट्टी की जांच करवाना।
  • एक अनावश्यक जुताई कम करना।
  • कुछ फसल अवशेष खेत में छोड़ना।
  • खेत की जल निकासी सुधारना।
  • यह देखना कि बारिश का पानी पहले से ज्यादा जमीन में समा रहा है या नहीं।

शुरुआत का कोई एक तय तरीका नहीं है, क्योंकि भारत में हर खेत अलग है। मिट्टी को बेहतर बनाने वाली खेती यह नहीं कहती कि हर किसान एक जैसा काम करे। यह सिर्फ एक सवाल पूछती है: “इस फसल की कटाई के बाद मेरा खेत पहले से कमजोर हुआ है या अगली फसल के लिए पहले से ज्यादा मजबूत?” यही इस खेती की सबसे बड़ी पहचान है। 

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या kisanofindia.mail@gmail.com पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।

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