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बिहार का कृषि क्षेत्र लंबे समय से छोटे जोत, अनिश्चित मानसून और कमजोर बाजार संरचना की तिहरी चुनौतियों में उलझा रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रभावी अमल ने इस परिदृश्य में उल्लेखनीय संरचनात्मक बदलाव की नींव रखी है। ये बदलाव केवल उत्पादन के आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि ये ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जोखिम प्रबंधन और कृषि विपणन प्रणाली तक फैलता दिखाई देता है।
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (PM-KISAN), प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और e-NAM जैसी योजनाएं इस बदलाव की मुख्य धुरी बनकर उभरी हैं।
पीएम -किसान : ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह का नया आधार
पीएम -किसान योजना ने बिहार के लाखों छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक स्थिर वार्षिक नकद सहायता (Annual cash assistance) का ढांचा तैयार किया है। प्रति साल 6,000 रुपये की ये मदद, भले ही सीमित नज़र आती हो, लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसे “वर्किंग कैपिटल सपोर्ट” के रूप में देखा जा रहा है।
कई जिलों में ये देखा गया है कि किसान अब बीज और खाद की खरीद में ज़्यादा समय की पाबंदी दिखा रहे हैं और साहूकारी लोन पर निर्भरता में कुछ कमी दर्ज की गई है। कृषि अर्थशास्त्रियों के अनुसार, ये योजना सीधे आमदनी बढ़ोत्तरी से अधिक “आर्थिक स्थिरता” का टूल बनी है।
पीएमएफबीवीवाई : कृषि जोखिम प्रबंधन में संस्थागत हस्तक्षेप
बिहार जैसे राज्य में, जहां बाढ़ और सूखा दोनों ही कृषि के लिए चुनौती हैं, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना ने जोखिम प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण संस्थागत ढांचा मिला है।
उत्तर बिहार के बाढ़-प्रभावित जिलों में इस योजना के ज़रीये से किसानों को फसल नुकसान की स्थिति में वित्तीय राहत मिली है। जिससे दोबारा बुवाई और अगले साइकिल में निवेश की क्षमता में सुधार देखा गया है।
हालांकि, क्लेम निपटान में देरी और प्रोसेस में होने वाली मुश्किलों जैसी चुनौतियां अब भी योजना की पूरी प्रभावशीलता को सीमित करती हैं।
पीएमकेएसवाई : सिंचाई विस्तार और फसल विविधीकरण
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना ने “हर खेत को पानी” के लक्ष्य को लेकर बिहार में सिंचाई ढांचे के विस्तार और माइक्रो-इरिगेशन को बढ़ावा दिया है।
गया, नवादा, औरंगाबाद और जमुई जैसे जिलों में ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक के इस्तेमाल से सिंचाई दक्षता में सुधार और फसल पैटर्न में बदलाव देखा गया है। पारंपरिक धान-गेहूं चक्र के साथ अब सब्जी और बागवानी की ओर किसानों का रुझान बढ़ा है, जो आमदनी विविधीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण इशारा है।
ई -नाम : कृषि बाजार का डिजिटल ट्रांजेक्शन
ई -नाम ने कृषि विपणन प्रणाली में पारदर्शिता और सूचना आधारित फैसलों ने प्रोसेस को बढ़ावा दिया है। इससे किसानों को अलग-अलग लमंडियों में प्राइज़ कंपेरिज़न की सुविधा मिली है, जिससे बिचौलियों की भूमिका में कमी आई है।
हालांकि ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभी सीमित है, लेकिन युवा किसानों की भागीदारी इस प्रणाली को धीरे-धीरे अधिक प्रभावी बना रही है।
समग्र प्रभाव: एक बदलती कृषि संरचना
राज्य स्तरीय आकलनों के अनुसार, बिहार में खाद्यान्न उत्पादन में मज़बूत इज़ाफा और सब्जी उत्पादन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साथ ही फसल विविधीकरण की ट्रेंड भी मजबूत हुई है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी पहलों ने उर्वरक उपयोग के संतुलन और उत्पादन दक्षता में भी सुधार किया है।
चुनौतियां अब भी बरकरार
इन पॉजिटिव बदलाव के बावजूद कुछ संरचनात्मक बाधाएं अभी भी मौजूद हैं:
- छोटे किसानों तक योजनाओं की असमान पहुंच
- सिंचाई ढांचे में क्षेत्रीय असंतुलन
- फसल बीमा में देरी से भुगतान
- भंडारण और कोल्ड चेन अवसंरचना की कमी
- जलवायु परिवर्तन का बढ़ता दबाव
कुल मिलाकर, केंद्र सरकार की योजनाओं ने बिहार के कृषि क्षेत्र में एक आधारभूत परिवर्तन की प्रक्रिया को गति दी है। यह परिवर्तन अभी पूर्ण नहीं है, लेकिन इसकी दिशा स्पष्ट है—एक ऐसे कृषि मॉडल की ओर, जो अधिक तकनीक-आधारित, बाजार-संवेदनशील और जोखिम-प्रबंधन सक्षम है।
अगर नीतिगत निरंतरता और स्थानीय स्तर पर अमल की क्वालिटी बनी रहती है, तो बिहार आने वाले वर्षों में देश के उन राज्यों में शामिल हो सकता है जहां कृषि केवल जीविका नहीं, बल्कि आर्थिक विकास का प्रमुख इंजन बनकर उभरेगी।
ये लेख डॉ. मीना कुमारी (जांगिड) द्वारा लिखा गया है। लेखिका स्कॉलर, पत्रकार और स्वतंत्र लेखिका हैं।
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