सूखे इलाके में ज्ञान चंद की प्राकृतिक खेती बनी किसानों के लिए मिसाल

प्राकृतिक खेती अपनाकर ज्ञान चंद ने कम पानी में बेहतर खेती की, लागत घटाई और कई किसानों को नई राह दिखाई।

हिमाचल प्रदेश के आनी ब्लॉक के सराली गांव में खेती करना हमेशा आसान नहीं रहा। इस इलाके में सिंचाई की अच्छी व्यवस्था नहीं है, इसलिए किसान अक्सर बारिश पर ही निर्भर रहते हैं। समय पर बारिश न हो तो फ़सल प्रभावित होती है और मेहनत पर पानी फिर जाता है। ऐसे हालात में गांव के किसान ज्ञान चंद ने प्राकृतिक खेती को अपनाया और आज यह तरीका उनके लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के कई किसानों के लिए भी उम्मीद बन गया है।

पानी की कमी ने सिखाया नया रास्ता

ज्ञान चंद बताते हैं कि उनके इलाके में पानी हमेशा सबसे बड़ी चुनौती रहा है। खेतों का एक हिस्सा लंबे समय तक बंजर पड़ा रहा क्योंकि वहां पर्याप्त सिंचाई नहीं थी।

इसी दौरान उन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में जाना। इस पद्धति की सबसे बड़ी ख़ासियत यह लगी कि इसमें पानी की ज़रूरत कम होती है। उन्होंने इसे अपने खेत में अपनाया और धीरे-धीरे वही बंजर ज़मीन फिर से उपजाऊ बनने लगी। उनका कहना है कि प्राकृतिक खेती ने यह भरोसा दिलाया कि कम पानी वाले क्षेत्रों में भी अच्छी खेती की जा सकती है।

मिट्टी में फिर लौटी जान

ज्ञान चंद ने अपने खेतों में जीवामृत, घनजीवामृत और आच्छादन का नियमित उपयोग शुरू किया। कुछ समय बाद उन्हें मिट्टी में बड़ा बदलाव दिखाई देने लगा। वे बताते हैं कि पहले जहां मिट्टी सख्त रहती थी, वहीं अब वह भुरभुरी हो गई है। मिट्टी के नीचे देसी केंचुए भी दिखाई देने लगे, जो स्वस्थ मिट्टी की पहचान माने जाते हैं।

उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती की असली ताकत मिट्टी को दोबारा जीवित करना है। जब मिट्टी स्वस्थ होगी, तभी फ़सल भी अच्छी होगी।

सूखे इलाके में ज्ञान चंद की प्राकृतिक खेती बनी किसानों के लिए मिसाल

कई फ़सलों में मिल रहे अच्छे परिणाम

आज ज्ञान चंद क़रीब 5 बीघा क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। उनके खेतों में सेब के साथ-साथ गेहूं, जौ, मक्की, राजमाश, आलू और बीन्स जैसी फ़सलें भी उगाई जा रही हैं।

वे बताते हैं कि प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद फ़सलों की गुणवत्ता पहले से बेहतर हुई है। स्वाद में भी फर्क साफ महसूस होता है और उत्पादन में कोई कमी नहीं आई। यही वजह है कि उनका भरोसा इस खेती पद्धति पर लगातार बढ़ता जा रहा है।

कम ख़र्च में बढ़ी आमदनी

ज्ञान चंद के अनुसार पहले रासायनिक खेती में हर साल क़रीब 85 हज़ार रुपये तक ख़र्च हो जाता था। लेकिन प्राकृतिक खेती अपनाने के बाद उनका ख़र्च घटकर लगभग 18 हज़ार रुपये रह गया।

कम लागत का सीधा फ़ायदा उनकी आमदनी पर भी पड़ा। वे कहते हैं कि जब ख़र्च कम हो और फ़सल अच्छी मिले, तो किसान का आत्मविश्वास अपने आप बढ़ जाता है।

खेत देखकर बदल रही किसानों की सोच

ज्ञान चंद की खेती देखने के लिए अब आसपास के किसान अक्सर उनके खेतों में पहुंचते हैं। वे रासायनिक खेती और प्राकृतिक खेती से तैयार फ़सलों का अंतर खुद दिखाते हैं।

उनका कहना है कि जब किसान अपनी आंखों से बदलाव देखते हैं, तभी उन्हें इस पद्धति पर भरोसा होता है। आज उनकी देखा-देखी क्षेत्र के क़रीब 35 किसान प्राकृतिक खेती अपनाना शुरू कर चुके हैं और कई दूसरे किसान भी इसकी तैयारी कर रहे हैं।

सूखे इलाके के लिए बेहतर विकल्प

ज्ञान चंद मानते हैं कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी रहती है, वहां प्राकृतिक खेती बहुत उपयोगी साबित हो सकती है। आच्छादन की वजह से खेत में नमी लंबे समय तक बनी रहती है और बार-बार सिंचाई की ज़रूरत नहीं पड़ती। इससे पानी की बचत भी होती है और मिट्टी की सेहत भी बेहतर बनी रहती है।

वे कहते हैं कि उन्होंने अपने खेत में इसका असर खुद देखा है, इसलिए पूरे विश्वास के साथ दूसरे किसानों को भी इसे अपनाने की सलाह देते हैं।

सूखे इलाके में ज्ञान चंद की प्राकृतिक खेती बनी किसानों के लिए मिसाल

खेती को बना रहे सीखने की जगह

ज्ञान चंद चाहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा किसान प्राकृतिक खेती को समझें और अपनाएं। वे अपने खेत पर आने वाले किसानों को प्राकृतिक इनपुट बनाने से लेकर उनके उपयोग तक की जानकारी देते हैं।

उनका मानना है कि खेती में बदलाव किसी एक दिन में नहीं आता, लेकिन अगर किसान धैर्य रखें तो कुछ ही समय में अच्छे परिणाम मिलने लगते हैं।

नई उम्मीद की कहानी

ज्ञान चंद की कहानी बताती है कि मुश्किल हालात भी बदलाव का रास्ता बन सकते हैं। पानी की कमी और बंजर ज़मीन जैसी चुनौतियों के बीच उन्होंने प्राकृतिक खेती अपनाई और आज बेहतर खेती कर रहे हैं।

उनके अनुभव से साफ है कि यह खेती पद्धति सिर्फ़ लागत कम करने का तरीका नहीं है, बल्कि मिट्टी को स्वस्थ रखने, पानी बचाने और खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने का भी माध्यम है।

आज ज्ञान चंद सिर्फ़ एक सफल किसान नहीं हैं, बल्कि उन किसानों के लिए प्रेरणा हैं जो कम पानी वाले इलाकों में भी बेहतर खेती करना चाहते हैं। उनकी कहानी यह भरोसा देती है कि सही जानकारी और मेहनत के साथ प्राकृतिक खेती हर किसान की जिंदगी में सकारात्मक बदलाव ला सकती है।

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