दुधारु पशुओं में कई तरह के रोग होते हैं जिसका असर न सिर्फ पशुओं की सेहत पर होता है, बल्कि वह दूध देना भी बंद कर देते हैं जिससे पशु मालिकों को बहुत आर्थिक नुकसान होता है। ऐसे में पशु में किसी तरह के रोग के लक्षण दिखने पर तुरंत उपचार किया जाना ज़रूरी है। यदि आप भी डेयरी उद्योग से जुड़े हैं तो दुधारु पशुओं को होने वाला प्रमुख रोग और उनके उपचार के बारे में आपको पता होना चाहिए।
थनैला (Mastitis)
थनैला बीमारी की वजह से पशुओं के थनों में सूजन, कड़ापन और दर्द होता है। थन में गांठ पड़ जाती है और उनका आकार भी छोटा हो सकता है। इस रोग की वजह से उनके दूध पर असर पड़ता है। दूध फटा हुआ, थक्के जैसा या दही की तरह जमा हुआ निकलता है और उसमें से दुर्गंध भी आती है यानी उस दूध का उपयोग नहीं किया जा सकता। इस बीमारी की वजह से पशुओं को बुखार भी आता है और वह खाना-पीना छोड़ देते हैं।
उपचार/बचाव
पशु के रहने की जगह को साफ-सुथरा रखें। थन को अच्छी तरह साफ करें और दूध निकालने से पहले अपने हाथों की भी सफाई करें। दूध निकालने से पहले 2-3 धार नीचे गिरा दें। दूध निकालने के बाद पशु को कम से कम आधे घंटे तक नीचे न बैठने दें, क्योंकि इससे गंदगी उनके स्तन में प्रवेश करके संक्रमण का कारण बन सकती है। प्रभावित थन में मेमरी एंटीबायोटिक क्रीम लगा सकते हैं। समस्या ज़्यादा न बढ़े इसके लिए पशु चिकित्सक से सलाह अवश्य लें।

गलघोंटू रोग (Hemorrhagic Septicemia)
यह गाय भैंस को होने वाला आम रोग है जो ज़्यादातर बरसात के मौसम में होता है। वैसे यह रोग भैंसों को अधिक होता है। इसमें बहुत तेज़ बुखार, सांस लेते समय गर-गर की आवाज़, गर्दन में सूजन, भूख न लगना, लगातार लार गिराना, कुछ देर के लिए जीभ बाहर निकालना आदि लक्षण दिखते हैं। इस रोग की वजह से पशु की मौत भी हो सकती है। इसका कोई सटीक उपचार नहीं है, बस रोकथाम ही एकमात्र उपाय है।
उपचार/बचाव
इस रोग से बचाव के लिए पशु का टीकाकरण करवाना चाहिए। उन्हें साफ और हवादार जगह पर रखें। यदि ट्रक से उन्हें कहीं ले जाना है तो उसमें उचित जगह होनी चाहिए। हवा आने-जाने की भी उचित व्यवस्था होनी चाहिए, इस बात का ध्यान रखें।
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ब्रूसीलोसिस रोग (Brucellosis)
ब्रूसीलोसिस रोग पशुओं में होने वाला एक बैक्टीरियल संक्रमण है जिसकी वजह से गर्भावस्था के 5-7 महीने में पशुओं का गर्भपात हो सकता है और दूध उत्पादन पर भी असर पड़ता है। इससे बांझपन जैसी समस्या भी हो सकती है।
उपचार/बचाव
इस रोग का कोई उपचार नहीं है, बस इससे बचाव ही किया जा सकता है। इससे बचने के लिए पशुओं के आवास को साफ-सुथरा रखें। चूना पाउडर या फिनाइल का छिड़काव करें। मादा बछड़ियों/कटड़ियों का 5-7 महीने की उम्र में टीकाकरण करवाएं।
मुंह व खुर रोग (Foot & Mouth Disease, FMD)
यह वायरस से होने वाली बीमारी है। संक्रमण लोगों की आवाजाही, हवा, वाहनों या अन्य माध्यम से एक पशु से दूसरे पशुओं में बहुत ही तेज़ गति से फैलता है। इस बीमारी से ग्रसित पशु में तेज़ बुखार, लार गिरना, जीभ पर अल्सर जैसे लक्षण दिखते हैं। इसके अलावा खुर और मुंह में घाव हो जाता है, जिससे चलने-फिरने और खाने-पीने में दिक्कत होती है। यही वजह है कि दूध का उत्पादन बिल्कुल घट जाता है। 20 लीटर दूध देने वाला पशु मात्र 1 लीटर दूध देता है।
उपचार/बचाव
इससे बचाव के लिए सभी पशुओं को साल में दो बार मुंह व खुर रोग से बचाव का टीका लगाना चाहिए। 4 महीने की उम्र में सभी दुधारू पशुओं को टीका लगाना ज़रूरी है। 5 महीने की उम्र में बूस्टर खुराक दी जानी चाहिए, फिर 6 माह के अंतराल पर टीका लगवाने की सलाह विशेषज्ञ देते हैं। 10 लीटर पानी में आधा किलो मीठा सोडा (सोडियम बाइकार्बोनेट) मिलाकर मुंह और खुर को धोएं।

इन प्रमुख बीमारियों के अलावा दुधारू पशुओं को रिपीट ब्रीडर, थेलेरियोसिस,बेबेसियोसिस, दस्त लगना, चिचड़ी संक्रमण जैसे रोग भी होते हैं। अपने डेयरी उद्योग को नुकसान से बचाने के लिए ज़रूरी है कि आप पशुओं को रोग से बचाएं और बीमार पड़ने पर उनका तुरंत उपचार करवाएं।
स्टोरी साभार: ICAR-Farmer FIRST Programme
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