दो दशक पहले सुखजीत सिंह ने पारंपरिक खेती को छोड़कर जैविक खेती (organic farming) की शुरुआत की। उनका कहना है कि परिवार को ज़हरों से बचाने के लिए यह फैसला लिया गया था। समय के साथ मिले लंबे अनुभव ने उन्हें नई सोच वाले किसानों में शामिल कर दिया। वे लुधियाना के दीवाला गांव के निवासी हैं और वहीं वे आलू के बीज का विशेष काम कर रहे हैं तथा अच्छे और भरोसेमंद बीजों के लिए किसान दूर–दूर से उनके पास आ रहे हैं। सुखजीत सिंह मानते हैं कि पारंपरिक खेती छोड़ने से पहले हिम्मत के साथ पहला कदम उठाना ज़रूरी होता है, आगे के रास्ते अपने आप बनते जाते हैं।
जैविक खेती की शुरुआत

साल 2008 में सुखजीत सिंह को स्वास्थ्य संबंधी समस्या आई थी। इसके बाद ही उन्हें एहसास हुआ कि हमारी खुराक सही नहीं है। इस एहसास के बाद उन्होंने 1 एकड़ में जैविक खेती (organic farming) की शुरुआत की। समय के साथ उन्होंने अपनी अधिकतर जमीन जैविक खेती (organic farming) के अंतर्गत ले आई, जो पंजाब एग्रो के पास भी रजिस्टर्ड है। उनका कहना है कि जैविक उत्पाद की अपनी समझ होती है और बेहतर कीमत भी, हमारे पास मित्र जैविक उत्पाद खरीद लेते हैं।

वे बताते हैं कि सिर्फ इंसान की खुराक ही नहीं, पशुओं का चारा भी जैविक होना चाहिए। आखिरकार जैविक चारे का असर दूध पर पड़ता है और दूध स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। बेवजह यूरिया इस्तेमाल करना ठीक नहीं, इससे पशुओं की सेहत प्रभावित होती है। उनका मानना है कि चारा खराब जमीन में क्यों बोया जाए? अच्छी जमीन में बोएंगे तो उत्पादन भी अच्छा मिलेगा।
आलू के सीड का उत्पादन

अपनी नई सोच के साथ आगे बढ़ते हुए सुखजीत सिंह आलू, गेहूं और हाइब्रिड मक्का के बीज तैयार कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने समराला के नाम से एक एफपीओ कंपनी रजिस्टर करवाई है, जिसमें वे किसानों के साथ कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग भी करवाते हैं, जिसका उनका अनुभव सकारात्मक रहा है। वे कहते हैं कि अगर कंपनी भी कमाए और किसान को भी अधिक कमाई हो, तो यह सौदा खराब नहीं। कई बार किसान सोच लेते हैं कि कंपनियां हमारे सिर से कमा रही हैं, लेकिन सही समझौता दोनों पक्षों के लिए लाभदायक हो सकता है।

सुखजीत सिंह के पास आलू के लगभग सभी बीज उपलब्ध हैं, जैसे कि चिप्सोना, एल आर, नीलकंठ, फ्राई सोना, पुखराज, 102 और डायमंड। उनकी पहचान आलू के बीजों में काफ़ी है और पंजाब में कई स्थानों तक उनका बीज पहुंचता है। अपने इलाके में उनके काम से किसानों को भरोसेमंद बीज और मार्केट दोनों हासिल होते हैं।

वे कहते हैं कि किसान को अपने काम की पूरी समझ रखनी चाहिए। किसान मेलों, अपने इलाके की कृषि संस्थाओं जैसे कृषि विज्ञान केंद्र आदि से लगातार संपर्क रखना चाहिए। खेती के बारे में लगातार जागरूक रहना ही बदलते समय में किसान को नुक़सान से बचा सकता है। वैज्ञानिक जानकारी भी मौजूदा समय की मांग है, तकनीक का बदलता स्वरूप भी एक पक्ष है, यदि किसान अपने काम में लगातार सीखता रहेगा और अन्य सफल किसानों से सीखता रहेगा तो खेती अच्छा और लाभदायक धंधा बन सकती है।
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