पशुपालन के पेशे में पशुधन की प्रजनन क्षमता का बहुत महत्व है। इसीलिए पशुओं की आनुवांशिक क्षमता, उन्नत नस्ल और पोषक आहार पर ख़ूब ज़ोर दिया जाता है, क्योंकि इन सभी पहलुओं का सीधा नाता पशुपालन से होने वाली कमाई से है। लिहाज़ा, यदि पशुपालन का भरपूर लाभ चाहिए तो ऐसे सभी उपाय करने होंगे जिससे दुधारू पशुओं को बाँझपन (infertility) की चपेट में आने से बचाया जा सके।
पशुओं को बाँझपन से बचने के लिए निरोग रखने के अलावा सन्तुलित पोषक आहार देना भी बहुत ज़रूरी है, क्योंकि बाँझपन के शिकार ऐसे पशु भी हो सकते हैं जिन्हें पर्याप्त चारा और आहार तो दिया जाता है लेकिन सन्तुलित पोषक तत्वों का ध्यान नहीं रखा जाता।
मादा पशुओं की प्रजनन क्षमता इनके वयस्क और परिपक्व होने के अलावा उनके शारीरिक वजन पर भी निर्भर करता है। सन्तुलित पोषक आहार में कमी की वजह से कई बार मादा पशु अपनी उम्र के मुक़ाबले वजन तो ज़्यादा प्राप्त कर लेती हैं लेकिन उनमें पहली बार या अगली बार कामातुर होने या गर्म होकर गर्भाधान के लिए तैयार होने की अवधि लम्बी खिंच जाती है।
इस तरह अपने सामान्य जीवन काल में मादाएँ कम बार गर्भवती होती हैं। सन्तुलित पोषक आहार की कमी की वजह से गर्भपात या बछड़ा-बछड़ी के कमज़ोर अथवा अपाहिज पैदा होने की आशंका बढ़ जाती है। दूध उत्पादन और पशुपालक की आमदनी पर इसका सीधा असर पड़ना लाज़िमी है।
बाज़ार में बिकने वाले उत्तम पशु आहार की सबसे बड़ी विशेषता ये होती है कि इसकी कम मात्रा के नियमित सेवन से भी दुधारू पशुओं के बछड़ा-बछड़ी का समुचित विकास होता है और वो जल्दी वयस्क होकर प्रजनन की अवस्था को हासिल करते हैं।
इसलिए यदि कोई मादा पशु कम सन्तुलित आहार ग्रहण करते हुए वयस्क हुआ हो तो कुछ हफ़्तों तक उसे पौष्टिक आहार की ज़्यादा मात्रा देने से उसकी प्रजनन क्षमता को बेहतर बनाया जा सकता है। गर्भाधान के बाद उन मादाओं में गर्भपात की शिकायतें ज़्यादा होती हैं जिन्हें उचित आहार नहीं मिलता।
गर्भावस्था में माँ और बच्चे की बढ़िया सेहत के लिए और ब्याने के बाद ज़्यादा दूध उत्पादन पाने के लिए सन्तुलित पोषक आहार को कभी नज़रअन्दाज़ नहीं करना चाहिए। यदि किसी भी वजह से हरे चारे की उपलब्धता नहीं हो तो भी सूखे चारे की पौष्टिकता को बढ़ाकर पशु आहार को सन्तुलित रखना बहुत ज़रूरी है।
भूसा और सूखा चारा को यूरिया तथा शीरा से उपचारित करके उनमें ऊर्जा तत्वों और प्रोटीन के अनुपात को बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा सस्ता मोटा अनाज और खली की उपयुक्त मात्रा से भी दुधारू पशुओं की ज़रूरतें पूरी की जा सकती है।
बाँझपन और विटामिन की कमी
रोमन्थी या जुगाली करने वाले पशुओं को आहार के ज़रिये प्राप्त होने वाले उनके यकृत या लीवर में जमा हो जाते हैं और वहीं से ज़रूरत के मुताबिक, पशुओं के शरीर से छोड़े जाते हैं। पशुओं की प्रजनन क्षमता और उत्पादकता पर सबसे ज़्यादा प्रभाव आहार में विटामिन की कमियों का पड़ता है। गाय-भैंस में विटामिन ‘बी कॉम्प्लैक्स’ का संश्लेषण आसानी से होता रहता है, इसीलिए इसकी कमी नहीं होती। लेकिन विटामिन ‘ए’ और विटामिन ‘डी’ की कमी से प्रजनन सम्बन्धी समस्याएँ बहुत बढ़ जाती हैं।
विटामिन ‘ए’: इसकी कमी से दुधारू पशुओं की रोग प्रतिरोधी क्षमता भी कमज़ोर पड़ जाती है और वो अनेक बीमारियों तथा संक्रमण की चपेट में आ जाते हैं। विटामिन ‘ए’ की कमी अक्सर हरे चारे के उपलब्धता नहीं होने पर होती है। इससे ‘गुप्त गर्मी’ यानी पशु के गर्मी में आने का पता नहीं लगना, गर्भाधान की कमी, अंडाशय में सिस्ट का बनना, भ्रूण की मौत होना जैसी समस्याएँ पैदा होती हैं। यदि मादा पशु के शरीर में विटामिन ‘ए’ की कमी हो तो वो गर्भधान के लिए देरी से परिपक्व होती हैं।
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कई बार गर्भधारण कर चुकी मादाओं में भी यदि विटामिन ‘ए’ हो जाए तो अक्सर उनके कामातुर होकर नये गर्भ को धारण करने में विलम्ब होता है या गर्भावस्था के शुरुआती दौर में भ्रूण का विकास सामान्य नहीं होता और गर्भपात हो जाता है या इसकी आशंका ज़्यादा होती है। ऐसी मादाओं के बच्चे कमज़ोर, अन्धे या अन्य विसंगति के साथ पैदा होते हैं। मादा की जेर में कड़ापन आ जाता है या जेर के नहीं गिरने की समस्या और बच्चेदानी में संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है। विटामिन ‘ए’ की कमी को दूर करने के लिए इसका घोल को पिलाना चाहिए।
विटामिन ‘डी’: इसकी कमी से भी पशुओं में वयस्कता के आने में देरी होती है और मादा में गर्मी आने के लक्षण साफ़ नहीं दिखायी देते। गर्भावस्था में विटामिन ‘डी’ की कमी से बछड़ा-बछड़ी में जन्मजात सूखा रोग (Rickets) के शिकार हो जाते हैं। विटामिन ‘डी’ की ही बदौलत शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस जैसे पोषक तत्व अवशोषित होते हैं। प्रसव से पहले यदि मादा के शरीर में विटामिन ‘डी’ की कमी होती है तो ब्याने के बाद दुग्ध ज्वर (galactopyretus) की समस्या नज़र आ सकती है। इस दशा में पशु के थन से दूध का रिसाव होता रहता है।
आमतौर पर विटामिन ‘डी’ की आपूर्ति पशुओं में अलग से नहीं करनी पड़ती, क्योंकि इसकी पर्याप्त मात्रा को उनकी त्वचा सूर्य के प्रकाश से सोख लेती है। लेकिन यदि कभी पशुओं को विटामिन ‘डी’ की ख़ुराक़ देने की ज़रूरत हो तो बाज़ार में ये पाउडर, घोल और इंजेक्शन के रूप में आसानी से मिल जाता है। कैल्शियम की भरपाई के लिए पशुओं को नियमित रूप से चारे के साथ खड़िया और नमक भी देना चाहिए।
घरेलू उपचार: पशुपालन विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में जब पशु सही समय पर कामातुर भाव को प्रदर्शित नहीं करते हैं तब पशुपालक किसान कुछेक घरेलू उपचार भी करते हैं। जैसे, 250 ग्राम सेमल की जड़ या 250 ग्राम सांवा या कोदों का आटा (छिलका सहित) या 25 ग्राम कबूतर की बीट या 500 ग्राम बाँस की जड़ या 7-10 हल्दी के फूल को करीब हफ़्ते भर तक पशु को रोज़ाना खिलाया जाता है। इससे पशु नियमित मद (गर्मी) में आ जाते हैं।
प्रोटीन की कमी
पशु आहार में प्रोटीन की कमी से भी पशुओं की परिपक्वता अवधि बढ़ जाती है। मादाओं में मद में आने का लक्षण भी देर से नज़र आता है। दरअसल, शरीर में प्रोटीन की कमी होने से पशुओं की भूख मर जाती है, उनका आहार काफ़ी घट जाता है।
इससे वो सुस्त तथा कमज़ोर हो जाते हैं। गर्भावस्था के आख़िरी दो महीनों और दूध उत्पादन के वक़्त शरीर में प्रोटीन की माँग ज़्यादा बढ़ जाती है। प्रोटीन की कमी से भी बछड़ा-बछड़ी कमज़ोर पैदा होते हैं और दूध उत्पादन भी घट जाता है।
रोमन्थी पशुओं में प्रोटीन के अतिरिक्त यूरिया, वाइयूरेट, नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन आदि को भी प्रोटीन के स्थान पर लेने की क्षमता होती है। लेकिन अक्सर ये देखा गया है कि दूध उत्पादन के शुरुआती दौर में मादा पशुओं में नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन की अपेक्षा प्रोटीन के उपयोग की क्षमता ज़्यादा होती है। जबकि बाद की अवस्था में प्रोटीन और नॉन प्रोटीन नाइट्रोजन दोनों को वो समान रूप में ग्रहण करती हैं।
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