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Year Ender 2021: देश के इन युवाओं ने साल 2021 में अपनी फ़ील्ड से हटकर खेती से बनाई नई पहचान

कोई इंजीनियर तो किसी ने छोड़ी सरकारी नौकरी, आज खेती में कमाया नाम

लीक से हटकर काम करना आसान नहीं होता। कई सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। फिर भी कई ऐसे युवा हैं, जिन्होंने अपने फ़ील्ड से हटकर कुछ अलग करने की तलाश में खेती-किसानी को अपना व्यवसाय चुना। हम आपके लिए ऐसे ही युवाओं की कहानियां लेकर आये हैं।

आज के दौर में, नौकरी अगर अच्छी हो तो खेती-किसानी करने के बारे में भला कौन सोचता है! पर कुछ लोग होते हैं, जो लीक से हटकर अलग करने की चाह में अपना मुकाम बनाते हैं। साल 2021 में हमें कई युवा ऐसे भी देखने को मिले, जो निकल पड़े अपने फ़ील्ड से हटकर कुछ अलग करने की तलाश में। इस सफ़र में उनकी हमसफ़र बनी खेती। किसान ऑफ़ इंडिया आपके लिए कामयाब युवा किसानों की Exclusive स्टोरीज़ लेकर आया है। हम आपको उन युवाओं के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने नौकरी छोड़ी और खेती को ही अपनी कर्मभूमि चुन लिया।

1. असीम रावत, देसी गाय एक्सपर्ट, गाज़ियाबाद 

hetha dairy farm

15 साल तक बतौर सॉफ़्टवेयर इंजीनियर की नौकरी करने वाले असीम आज देसी गायों के पालन के मामले में एक मिसाल बन गए हैं। बतौर इंजीनियर महीने की चार पांच लाख की सैलरी लेने वाले असीम रावत ने अपने पैशन को चुनते हुए ‘हेता डेयरी फार्म’ की शुरुआत की। उन्होंने अपनी सारी बचत डेयरी को खड़ा करने में लगा दी। 

उनके डेयरी फ़ार्म में गिर, साहीवाल और थारपारकर जैसी देसी नस्ल की 700 से ज़्यादा गायें हैं। इस तरह, पूरी तरह से देसी गायों वाला शायद ये देश का सबसे बड़ा फ़ार्म है। उन्होंने दूध से बने बहुत से अलग उत्पाद भी ऑनलाइन मार्केट में निकाले हैं। उन्होंने देसी गायों का सबसे बड़ा ठिकाना कैसे तैयार किया,  आप यहां जाकर पूरी कहानी पढ़ सकते हैं – सॉफ़्टवेयर इंजीनियर ने बनाई देसी गायों की बड़ी गौशाला

2. अभिषेक दामा, मल्टीलेयर फ़ार्मिंग एक्सपर्ट, दिल्ली 

दिल्ली के पल्ला गांव के अभिषेक दामा पेशे से इंजीनियर हैं, जो अब प्रगतिशील किसान बन चुके हैं। आईटी सेक्टर की जॉब छोड़कर जैविक खेती कर रहे दामा ने किसान ऑफ़ इंडिया से खास बातचीत में अपने अनुभव साझा किए थे। साल 2017 में उन्होंने दो बीघा ज़मीन से खेती की शुरुआत की। वक़्त के साथ इसकी बारीकियां जानने के बाद आज वो  25 एकड़ की ज़मीन पर मल्टीलेयर जैविक खेती कर रहे हैं। आज अभिषेक करीबन 52 तरह की सब्जियां अपने खेत पर उगाते हैं, जिसमें घिया, तोरी, करेला, आलू, शिमला मिर्च, सरसों और मेथी की फसल हैं। 

फसलों को बेचने की मार्केटिंग स्ट्रेटिजी भी वो अच्छे से जानते हैं, जिसमें खरीदार सीधे उनसे फसल खरीदते हैं। अभिषेक की मार्केटिंग स्ट्रैटिजी b2b (Business to Business) और b2c ( Business to Customer) पर आधारित है। आज अभिषेक जैविक खेती से प्रति एकड़ सालाना डेढ़ लाख से लेकर तीन लाख रुपये कमा लेते हैं। अभिषेक के खेती में सफ़र की पूरी कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं – आईटी इंजीनियर ने चुनी ऑर्गेनिक मल्टीलेयर फ़ार्मिंग की राह

3. ध्रुव शर्मा, पॉलीहाउस एक्सपर्ट, मेरठ 

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पेशे से इंजीनियर ध्रुव शर्मा के पास कॉर्पोरेट नौकरी कर लाखों में पैसा कमाने का ऑप्शन था, लेकिन ध्रुव शर्मा को कुछ अलग करना था। तो वो निकल पड़े अपने फ़ील्ड से हटकर कुछ अलग करने की तलाश में जहां पॉलीहाउस की खेती पर उनकी तलाश रुकी। 

ध्रुव कहते हैं कि किसी और पेशे में एक लिमिट तक ही प्रोफ़ेशनल ग्रोथ है, लेकिन खेती में संभावनाएं बहुत हैं। उन्होंने पॉलीहाउस खेती को कम जगह में पानी की बचत के साथ ज़्यादा उत्पादन करने के मकसद से चुना। पॉलीहाउस में तैयार होने वाली फसल को बाज़ार में अच्छा दाम भी मिलता है। आज वो अपने गो ग्रीन मिशन के साथ लोगों की थाली तक पौष्टिक सब्जियां पहुंचा रहे हैं। ध्रुव शर्मा की पॉलीहाउस की खेती में बारीकियों को विस्तार से समझने के लिए आप यहां पढ़ सकते हैं – पॉलीहाउस तकनीक से खेती क्यों है सबसे बेहतर? जानिए ध्रुव शर्मा से

4. लक्ष्य डबास, ऑर्गैनिक फ़ार्मिंग एक्सपर्ट, दिल्ली 

ऑर्गैनिक एकड़ लक्ष्य डबास

इंजीनियरिंग पास आउट लक्ष्य डबास ने कॉलेज खत्म होने के बाद मन बना लिया था कि वो खेती-किसानी में ही अपना करियर बनाएंगे। शुरुआत में लेकिन उन्होंने पहले एक साल कॉर्पोरेट में नौकरी की, लेकिन उन्हें उसमें कोई दिलचस्पी नहीं हुई। फिर उन्होंने खेती में करियर बनाने का फैसला किया। लक्ष्य डबास ने जब अपने इस फैसले के बारे में घर में बताया तो शुरू में सबने मना किया। खेती का पूरा श्रेय वो अपने पिताजी को देते हैं। उनका परिवार 35 साल से जैविक खेती कर रहा है।

उन्होंने ‘ऑर्गैनिक एकड़’ नाम से फ़ार्म शुरू किया। किसान ऑफ़ इंडिया के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके पिताजी ‘ऑर्गेनिक एकड़’ के मार्गदर्शक हैं। उनके बड़े भाई मृणाल डबास मार्केटिंग से जुड़ी ज़िम्मेदारी संभालते हैं और वो खुद प्रोडक्शन का कामकाज देखते हैं।

ऑर्गैनिक एकड़ जैविक खेती के साथ ही एग्री-टूरिज़्म और एग्रो-एजुकेशन के क्षेत्र में भी कदम रख चुका है यानी खेती-किसानी से जुड़ा पर्यटन और शिक्षा भी अब उनका लक्ष्य है। साथ ही वो अपने फ़ार्म को रेंट पर भी देते हैं। इसमें कोई ग्राहक अपने मन मुताबिक किसी भी सब्जी की खेती करवा सकता है। लक्ष्य से जैविक खेती से जुड़ी अलग-अलग रोचक टिप्स के बारे में आप यहां पढ़ सकते हैं – Organic Acre के फाउंडर लक्ष्य डबास से जानिए देसी जुगाड़ से पॉलीहाउस बनाने का तरीका और कीजिये पूरे साल खेती 

5. नबनीता दास, जैविक खेती एक्सपर्ट, असम 

नबनीता दास
तस्वीर साभार: Department of agriculture and farmers welfare

एक सरकारी अस्पताल में बतौर सहायक नर्स काम करने वाली नबनीता दास जब भी ड्यूटी पर जाती थीं, चारों तरफ़ के खेती-खलियान उन्हें अपनी ओर आकर्षित करते थे। कुछ साल नौकरी करने के बाद उन्होंने खेती करने का मन बना लिया। सबके मना करने के बावजूद वो कर डाला जो भारत में कोई सपने में भी नहीं सोचता।

नबनीता की मेहनत ऐसी रंग लाई कि आज वो अपने क्षेत्र की एक जानी-मानी किसान हैं। उनका खेत एक छोटा कृषि केंद्र बन चुका है जिसको उन्होंने ‘नबनीता ऑर्गेनिक फ़ार्म’ नाम दिया है। यहां वो पारंपरिक फसलों के साथ-साथ फल-फूल, सब्जी, दलहन और तिलहन की फसलों की खेती करती हैं। फ़ार्म में ही उन्होंने अलग-अलग नस्ल की मुर्गियां भी पाली हुई हैं। इसके अलावा, उन्होंने कबूतर और बतख की देसी-विदेशी नस्लों को भी पाला हुआ है।

आज नबनीता के ऑर्गेनिक फ़ार्म को देखने के लिए कई युवा किसान आते हैं। खेती-किसानी से जुड़ी कई जानकारियां वो उनसे लेते हैं। नबनीता की जैविक खेती में सफ़लता की पूरी कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं – क्या आप में सरकारी नौकरी छोड़ने की हिम्मत है? अगर हाँ, तो नबनीता से मिलिए

 2022 में इसी नयेपन की सोच, नई उम्मीदों के साथ किसान ऑफ़ इंडिया आपको आगे भी अपने digital अड्डा के माध्यम से कामयाब युवा किसानों से मिलाता रहेगा।

सम्पर्क सूत्र: किसान साथी यदि खेती-किसानी से जुड़ी जानकारी या अनुभव हमारे साथ साझा करना चाहें तो हमें फ़ोन नम्बर 9599273766 पर कॉल करके या [email protected] पर ईमेल लिखकर या फिर अपनी बात को रिकॉर्ड करके हमें भेज सकते हैं। किसान ऑफ़ इंडिया के ज़रिये हम आपकी बात लोगों तक पहुँचाएँगे, क्योंकि हम मानते हैं कि किसान उन्नत तो देश ख़ुशहाल।
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